Class 10 History Chapter 2 Notes in Hindi | भारत में राष्ट्रवाद

Class 10 History Chapter 2 Notes in Hindi: covered History Chapter 2 easy language with full details & concept  इस अध्याय में हमलोग जानेंगे कि – भारत में राष्ट्रवाद का उदय (Rise of Nationalism in India), राष्ट्रवाद का अर्थ (meaning of nationalism,), राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले कारक (factors leading to nationalism), भारत में राष्ट्रवाद की चेतना का उदय (Rise of Nationalism in India), पहला विश्वयुद्ध, खिलाफत और सहयोग, सत्याग्रह का अर्थ (Meaning of Satyagraha), रॉलट ऐक्ट अन्यायपूर्ण क्यों था (Why was the Rowlatt Act unjust?), रॉलट ऐक्ट के परिणाम, जलियावाला बाग हत्याकांड की घटना, खेड़ा किसान आन्दोलन, महात्मा गांधी ने क्यों खिलाफत का मुद्दा उठाया (Why Mahatma Gandhi raised the issue of Khilafat), असहयोग ही क्यों? (Why non-cooperation?), असहयोग आंदोलन के कारण, चौरी चौरा हत्याकांड की घटना, सविनय अवज्ञा आंदोलन, स्वराज पार्टी (Swaraj Party), साइमन कमीशन, नमक यात्रा और असहयोग आंदोलन (1930){Salt March and Non-Cooperation Movement (1930)}, गाँधी इर्विन समझौते की विशेषताएँ, सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका (Role of women in civil disobedience movement), दाण्डी यात्रा (12 मार्च 1930), राष्ट्रवादी भावना के विस्तार में इतिहास की भूमिका? 

Class 10 History Chapter 2 Notes in Hindi full details

category  Class 10 History Notes in Hindi
subjects  History
Chapter Name Class 10 Nationalism in India (भारत में राष्ट्रवाद) 
content Class 10 History Chapter 2 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 History Chapter 2 notes in Hindi

इतिहास अध्याय 3 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – इतिहास   अध्याय – 3

भारत में राष्ट्रवाद

Nationalism in India 


परिचय (Introduction) -: 

भारत में राष्ट्रवाद:- 

यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद के साथ ही राष्ट्र-राज्यों का भी उदय हुआ। इससे अपने बारे में लोगों की समझ बदलने लगी। वे कौन है? उनकी पहचान किस बात से परिभाषित होती हैं, यह भावना बदल गई। उनमें राष्ट्र के प्रति लगाव का भाव पैदा होने लगा।

नए प्रतीको और चिन्हों ने, नए गीतों और विचारों ने नए संपर्क स्थापित किए और समुदायों की सीमओं को दोबारा परिभाषित कर दिया अधिकांश देशों में इन नयी राष्ट्रीय पहचान का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया में हुआ।

राष्ट्रवाद का अर्थ :-

अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना एकता की भावना तथा एक समान चेतना राष्ट्रवाद कहलाती है । यह लोग समान ऐतिहासिक , राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विरासत साझा करते है । कई बार लोग विभिन्न भाषाई समूह के हो सकते है ( जैसे भारत ) लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रेम उन्हें एक सूत्र में बांधे रखता है ।

राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले कारक :-

यूरोप में :- राष्ट्र राज्यों के उदय से जुड़ा हुआ है । भारत , वियतनाम जैसे उपनिवेशों में :- उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ा है ।

भारत में राष्ट्रवाद की चेतना का उदय:- 

वियतनाम और दूसरे उपनिवेशों की तरह भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई।

औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे। उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था। लेकिन हर वर्ग और समूह पर उपनिवेशवाद का असर एक जैसा नहीं था।

उनके अनुभव भी अलग थे और स्वतंत्रता के मायने भी भिन्न थे। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को इकट्‌ठा करके एक विशाल आंदोलन खड़ा किया। परंतु इस एकता में टकराव के बिंदु भी निहित थे।

प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर प्रभाव तथा युद्ध पश्चात परिस्थितियाँ :-

युद्ध के कारण रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी ।

इसे पूरा करने के लिए कर्जे लिये गए और टैक्स बढ़ाए गए ।

अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स को बढ़ाना पड़ा ।

युद्ध के वर्षों में चीजों की कीमतें बढ़ गईं ।

1913 से 1918 के बीच दाम दोगुने हो गए ।

दाम बढ़ने से आम आदमी को अत्यधिक परेशानी हुई ।

ग्रामीण इलाकों से लोगों को जबरन सेना में भर्ती किए जाने से भी लोगों में बहुत गुस्सा था ।

भारत के कई भागों में उपज खराब होने के कारण भोजन की कमी हो गई ।

फ़्लू की महामारी ने समस्या को और गंभीर कर दिया ।

1921 की जनगणना के अनुसार , अकाल और महामारी के कारण 120 लाख से 130 लाख तक लोग मारे गए  ।

पहला विश्वयुद्ध, खिलाफत और सहयोग:- 

1919 के बाद राष्ट्रीय आंदोलन नए इलाकों तक फैल गया था।

उसमें नए सामाजिक समूह शामिल हो गए थे और संघर्ष की नयी पद्धतियों सामने आ रही थी।

इन बदलावों को हम कैसे समझेंगे? उनके क्या परिणाम हुए?

विश्वयुद्ध ने एक नयी आर्थिक और राजनैतिक स्थिति पैदा कर दी थी। इसके कारण रक्षा व्यय में भारी इजाफ़ा हुआ।

इस खर्चे की भरपाई करने के लिए युद्ध के नाम पर क़र्ज लिए गए और करों में वृद्धि की गई।

सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया।

युद्ध के दौरान कीमतें तेजी से बढ़ रही थी

1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुना हो चुकी थी जिसके कारण आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई थीं।

गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया जाने लगा जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा था।

1918-19 और 1920-21 में देश के बहुत सारे हिस्सों में फसल खराब हो गई। जिसके कारण खाद्य पदार्थों का भारी अभाव पैदा हो गया।
उसी समस फ्लू की महामारी फैल गई। 1921 की जनगणना के मुताबिक दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120-130 लाख लोग मारे गए।
लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध खत्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सत्याग्रह का अर्थ :-

यह सत्य तथा अहिंसा पर आधारित एक नए तरह का जन आंदोलन करने का रास्ता था ।

महात्मा गाँधी का भारत आगमन व सत्याग्रह का विचार

महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे। इससे पहले वे दक्षिण अफ्रीका में थे।

उन्होनें एक नए तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहाँ की नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था।

इस पद्धति को वे सत्याग्रह कहते थे। सत्याग्रह के विचार से सत्य की  शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोद दिया जाता था।

इस संघर्ष में अतत: सत्य की ही जीत होती है।

गांधीजी का विश्वास था की अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।

1917 में खेड़ा गुजरात किसानों को कर में छूट दिलवाने के लिए उनके संघर्ष में समर्थन दिया फसल खराब हो जाने व प्लेग महामारी के कारण किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे । अहमदाबाद ( गुजरात ) 1918 में कपड़ा कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के समर्थन में सत्याग्रह आंदोलन किया ।

महात्मा गांधी के सत्याग्रह का अर्थ :-

सत्याग्रह ने सत्य पर बल दिया। गांधीजी का मानना था कि यदि कोई सही मकसद के लिए लड़ रहा हो तो उसे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले से लड़ने के लिए ताकत की जरूरत नहीं होती है। अहिंसा के माध्यम से एक सत्याग्रही लड़ाई जीत सकता है ।

रॉलट ऐक्ट 1919 :-

राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रखने का प्रावधान ।

रॉलट ऐक्ट का उद्देश्य :-

भारत में राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने के लिए ।

रॉलट ऐक्ट अन्यायपूर्ण क्यों था :-

भारतीयों की नागरिक आजादी पर प्रहार किया ।
भारतीय सदस्यों की सहमति के बगैर पास किया गया ।

रॉलट ऐक्ट के परिणाम :-

6 अप्रैल को महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक अखिल भारतीय हड़ताल का आयोजन ।

विभिन्न शहरों में रैली , जूलूस हुए ।

रेलवे वर्कशॉप्स में कामगारों का हड़ताल हुई ।

दुकाने बंद हो गई ।

स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया ।

बैंकों , डाकखानों और रेलवे स्टेशन पर हमले हुए ।

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जलियावाला बाग हत्याकांड की घटना  :-

10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई । इसके कारण लोगों ने जगह – जगह पर सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया । अमृतसर में मार्शल लॉ लागू हो गया और इसकी कमान जेनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई ।

जलियांवाला बाग का दुखद नरसंहार 13 अप्रैल को उस दिन हुआ जिस दिन पंजाब में बैसाखी मनाई जा रही थी । ग्रामीणों का एक जत्था जलियांवाला बाग में लगे एक मेले में शरीक होने आया था । यह बाग चारों तरफ से बंद था और निकलने के रास्ते संकीर्ण थे ।

नोट :- हिंसा फैलते देख महात्मा गांधी ने रॉलट सत्याग्रह वापस ले लिया ।

आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता :-

रॉलैट सत्याग्रह मुख्यतया शहरों तक ही सीमित था । महात्मा गांधी को लगा कि भारत में आंदोलन का विस्तार होना चाहिए । उनका मानना था कि ऐसा तभी हो सकता है जब हिंदू और मुसलमान एक मंच पर आ जाएँ ।

चम्पारण आन्दोलन
1917 में उन्होनें बिहार के चंपारन इलाके का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
नील की खेती करने वाले किसानों के पक्ष में महात्मा गांधी का भारत में प्रथम सत्याग्रह किया।
चम्पारण आन्दोलन
1917 में उन्होनें बिहार के चंपारन इलाके का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
नील की खेती करने वाले किसानों के पक्ष में महात्मा गांधी का भारत में प्रथम सत्याग्रह किया।

खेड़ा किसान आन्दोलन:- 

1918 में गाँधीजी ने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वे चाहते थे कि लगान वसूली में ढील दी जाए।

महात्मा गांधी ने क्यों खिलाफत का मुद्दा उठाया :-

रॉलट सत्याग्रह की असफलता के बाद से ही महात्मा गांधी पूरे भारत में और भी ज्यादा जनाधार वाला आंदालन खड़ा करना चाहते थे। उन्हे विश्वास था कि बिना हिंदू और मुस्लिम को एक दूसरे के समीप लाए ऐसा कोई अखिल भारतीय आंदोलन खड़ा नही किया जा सकता इसलिए उन्होने खिलाफत का मुद्दा उठाया ।

ख़लीफ़ा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में एक खिलाफत समिति का गठन किया गया था।

मोहम्मद अली और शौकत (अली बंधुओं) के साथ-साथ कई युवा मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जनकार्रवाई की संभावना तलाशने के लिए महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू कर दी थी।

सितंबर 1920 में। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी ने भी दूसरे नेताओं को इस बात पर राजी कर लिया कि ख़िलाफत आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए।

असहयोग ही क्यों?

गांधी जी की प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है।

अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।

असहयोग आंदोलन के कारण :-

प्रथम महायुद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों द्वारा भारतीय जनता का शोषण ।

अंग्रेजों द्वारा स्वराज प्रदान करने से मुकर जाना ।

रॉलेट एक्ट का पारित होना ।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड ।

कलकत्ता अधिवेशन में 1920 में कांग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव बहुमत से पारित ।

► असहयोग खिलाफत आन्दोलन

असहयोग खिलाफत आंदोलन की शुरुआत जनवरी 1921 में हुई थी ।

अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान भी शुरू किया जाए। 1920 की गर्मियों में गांधीजी और शौकत अली आंदोलन के लिए समर्थन जुटाते हुए देश भर में यात्राएँ करते रहे।

प्रत्येक सामाजिक समूह ने आंदोलन में भाग लेते हुए ‘ स्वराज ‘ का मतलब एक ऐसा युग लिया जिसमें उनके सभी कष्ट और सारी मुसीबते खत्म हो जाएंगी ।

1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बिना इजाजत बागान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी और यह इजाज़त उन्हें कभी कभी ही मिलती थी।

असहयोग आंदोल की समाप्ति :-

फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया क्योंकि चौरी चौरा में हिंसक घटना हो गई थी ।

चौरी चौरा हत्याकांड की घटना :-

फरवरी 1922 में , गांधीजी ने नो टैक्स आंदोलन शुरू करने का फैसला किया । बिना किसी उकसावे के प्रदर्शन में भाग ले रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियां चला दीं । लोग अपने गुस्से में हिंसक हो गए और पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और उसमें आग लगा दी । यह घटना उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में हुई थी ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन :-

1921 के अंत आते आते , कई जगहों पर आंदोलन हिंसक होने लगा था । फरवरी 1922 में गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय ले लिया । कांग्रेस के कुछ नेता भी जनांदोलन से थक से गए थे और राज्यों के काउंसिल के चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे । राज्य के काउंसिलों का गठन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 के तहत हुआ था । कई नेताओं का मानना था सिस्टम का भाग बनकर अंग्रेजी नीतियों विरोध करना भी महत्वपूर्ण था ।

स्वराज पार्टी :- 

सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद् राजनीति में वापस लौटने के लिए कांग्रेस के भीतर ही स्वराज पार्टी का गठन कर डाला।

जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा नेता ज़्यादा उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव बनाए हुए थे।
आंतरिक बहस व असहमति के इस माहौल में दो ऐसे तत्व थे जिन्होंने बीस के दशक के आखिरी सालों में भारतीय राजनीति की रूपरेखा एक बार फिर बदल दी।

आर्थिक मन्दी का असर- 

पहला कारक था विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का असर। 1926 से कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगी थीं और 1930 के बाद तो पूरी तरह धराशायी हो गई।

कृषि उत्पादों की माँग गिरी और निर्यात कम होने लगा तो किसानों को अपनी उपज बेचना और लगान चुकाना भी भारी पड़ने लगा।
1930 तक ग्रामीण इलाके भारी उथल-पुथल से गुजरने लगे थे।

साइमन कमीशन:-

1927 में ब्रिटेन में साइमन कमिशन का गठन किया गया, ताकि भारत में सवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन किया जा सके । 1928 में साइमन कमीशन का भारत आना- पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हुआ । कांग्रेस ने इस आयोग का विरोध किया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय शामिल नही था । दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था । इसमें पूर्ण स्वराज के संकल्प को पारित किया गया । 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया और लोगों से आह्वान किया गया कि वे संपूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष करें ।

साइमन आयोग में 7 सदस्य थे उनमें से एक भी भारतीय सदस्य नहीं था सारे अंग्रेज़ थे।  1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ (साइमन कमीशन गो बैक) के नारों से किया गया।

नमक यात्रा और असहयोग आंदोलन (1930) :-

31  जनवरी 1930 में महात्मा गांधी ने लार्ड इरविन के समक्ष अपनी 11 मांगे रखी ।

लार्ड इरविन इनमें से किसी भी माँग को मानने के लिए तैयार नही थे ।

6 अप्रैल 1930 को नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन यह घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत थी ।

महात्मा गांधी का यह पत्र एक अल्टीमेटम (चेतावनी) की तरह था। उन्होंने  लिखा था कि अगर 11 मार्च तक इनकी माँगें नहीं मानी गई तो

कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी।

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी द्वारा नमक यात्रा की शुरूआत ।

गाँधी इर्विन समझौते की विशेषताएँ :-

5 मई 1931 ई . को गाँधी इरविन समझौता ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जाये ।

नमक पर लगाए गए सभी कर हटाए जाएँ ।

कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन व पूर्ण स्वराज की माँग

दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज’ की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया।

तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे। इस उत्सव की ओर बहुत कम ही लोगों ने ध्यान दिया।

अब स्वतंत्रता के इस अमूर्त विचार को रोजमर्रा जिन्दगी के ठोस मुद्दों से जोड़ने के लिए महात्मा गांधी को कोई और रास्ता ढूँढ़ना था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका:-

औरतों ने बहुत बड़ी संख्या में गाँधी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया ।

हजारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए यात्रा के दौरान घरों से बहार आ जाती थीं ।

उन्होंने जलूसों में भाग लिया , नमक बनाया , विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों की पिकेटिंग की ।

कई महिलाएँ जेल भी गईं ।

ग्रामीण क्षेत्रों की औरतों ने राष्ट्र की सेवा को अपना पवित्र दायित्व माना ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन कैसे असहयोग आंदोलन से अलग था :-

असहयोग आंदोलन में लक्ष्य ‘ स्वराज ‘ था लेकिन इस बार ‘ पूर्ण स्वराज की मांग थी ।

असहयोग में कानून का उल्लंघन शामिल नही था जबकि इस आंदोलन में कानून तोड़ना शामिल था ।

1932 की पूना संधि के प्रावधान :-

इससे दमित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति के नाम से जाना गया) को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गई हालाँकि उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था ।

सामूहिक अपनेपन का भाव :-

वे कारक जिन्होने भारतीय लोगों में सामूहिक अपनेपन की भावना को जगाया तथा सभी भारतीय लोगों को एक किया ।

चित्र व प्रतीक :- भारत माता की प्रथम छवि बंकिम चन्द्र द्वारा बनाई गई । इस छवि के माध्यम से राष्ट्र को पहचानने में मदद मिली ।

चिन्ह :- उदाहरण झंडा :- बंगाल में 1905 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान सर्वप्रथम एक तिरंगा (हरा, पीला, लाल) जिसमें 8 कमल थे । 1921 तक आते आते महात्मा गांधी ने भी सफेद , हरा और लाल रंग का तिरंगा तैयार कर लिया था ।

इतिहास की पुर्नव्याख्या :- बहुत से भारतीय महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाना चाहिए ताकि भारतीय गर्व का अनुभव कर सकें ।

गीत जैसे वंदे मातरम :- 1870 के दशक में बंकिम चन्द्र ने यह गीत लिखा मातृभूमि की स्तुति के रूप में यह गीत बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में खूब गाया गया ।

दाण्डी यात्रा (12 मार्च 1930):- 

इरविन झुकने को तैयार नहीं थे। फलस्वरूप, महात्मा गांधी ने अपने 78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी। यह यात्रा साबरमती में गांधीजी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक गुजराती तटीय कस्बे में जाकर खत्म होनी थी। गांधीजी की टोली ने 24 दिन तक हर रोज़ लगभग 10 मील का सफ़र तय किया।

गांधीजी जहाँ भी रुकते हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में गांधीजी ने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और आह्वान किया कि लोग अंग्रेजों की शांतिपूर्वक अवज्ञा करें यानी अंग्रेज़ों का कहना मानें। 6 अप्रैल को वह दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह कानून का उल्लंघन था। यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होता है।

किसानों की आन्दोलन में भूमिका :-

गांवों में संपन्न किसान समुदाय-जैसे गुजरात के पटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट-आंदोलन में सक्रिय थे। व्यावसायिक फसलों की खेती करने के कारण व्यापार में मंदो और गिरती कीमतों से वे बहुत परेशान थे। जब उनकी नकद आय खत्म होने लगी तो उनके लिए सरकारी लगान चुकाना नामुमकिन हो गया। सरकार लगान कम करने को तैयार नहीं थी। चारों तरफ असंतोष था।

संपन्न किसानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का बढ़-चढ़ कर समर्थन किया। उन्होंने अपने समुदायों को एकजुट किया और कई बार अनिच्छुक सदस्यों को बहिष्कार के लिए मजबूर किया। उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी लगान के खिलाफ लड़ाई थी।

लेकिन जब 1931 में लगानों के घटे बिना आंदोलन वापस ले लिया गया तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। फलस्वरूप, जब 1932 में आंदोलन दुबारा शुरू हुआ तो उनमें से बहुतों ने उसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। गरीब किसान केवल लगान में कमी नहीं चाहते थे। उनमें से बहुत सारे किसान जमींदारों से पट्टे पर जमीन लेकर खेती कर रहे थे।

महामंदी लंबी खिंची और नकद आमदनी गिरने लगी तो छोटे पट्टेदारों के लिए जमीन का किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया। वे चाहते थे कि उन्हें ज़मींदारों को जो भाड़ा चुकाना था उसे माफ़ कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने कई रेडिकल आंदोलनों में हिस्सा लिया जिनका नेतृत्व अकसर समाजवादियों और कम्युनिस्टों के हाथों में होता था। अमीर किसानों और ज़मींदारों की नाराजगी के भय से कांग्रेस ‘भाडा विरोधी’ आंदोलनों को समर्थन देने में प्रायः हिचकिचाती थी। इसी कारण गरीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध अनिश्चित बने रहे।

महिलाओं की भूमिका:- 

विदेशी कपड़ो व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गई शहरी इलाकों में ज्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं गांधीजी के आहवान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व दिखाई देने लगा था| लेकिन सार्वजनिक भूमिका में इस इजाफें का मतलब यह नहीं था लेकिन सार्वजनिक भूमिका बदलाव आने वाला था।

गांधीजी का मानना था कि घर चलाना चूल्हा-चौका सँभालना, अच्छी माँ व अच्छी पत्नी की भूमिकाओं का निर्वाह करना ही औरत का असली कर्त्तव्य है। इसीलिए लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में किसी भी महत्वपूर्ण पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही। कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी।

मुस्लिमों की समस्या:- 

असहयोग – खिलाफत आदोलन के शांत पड़ जाने के बाद मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबका कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था
1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के काफी करीब दिखने लगी थी।  जैसे-जैसे हिंदू-मुसलमानों के बीच संबंध खराब होते गए, दोनों समुदाय उग्र धार्मिक जुलूस निकालने लगे। इससे कई शहरों में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक टकराव व दंगे हुए। हर दंगे के साथ दोनों समुदायों के बीच फासला बढ़ता गया।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एक बार फिर गठबंधन का प्रयास किया। 1927 में ऐसा लगा भी कि अब एकता स्थापित हो ही जाएगी। सबसे महत्त्वपूर्ण मतभेद भावी विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व के सवाल पर थे। मुस्लिम लीग नेताओं में से एक मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि अगर मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रातों बगांल और पंजाब में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिक की माँग छोड़ने के लिए तैयार है ।

प्रतिनिधित्व के सवाल पर यह बहस-मुबाहिसा चल ही रहा था कि 1928 में आयोजित किए गए सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर ने इस समझौते के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलेआम निंदा शुरू कर दी जिससे इस मुद्दे के समाधान की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ उस समय समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था कांग्रेस से कटे हुए मुसलमानों का बड़ा तबका किसी संयुक्त संघर्ष के लिए तैयार नहीं था। बहुत सारे मुस्लिम नेता और बुद्धिजीवी भारत में अल्पसंख्यकों के रूप में मुसलमानों की हैसियत को लेकर चिंता जता रहे थे। उनको भय था कि हिंदू बहुसंख्या के वर्चस्व की स्थिति में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएग|

राष्ट्रवादी भावना के विस्तार में इतिहास की भूमिका:- 

इतिहास की पुनर्व्याख्या राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक और साधन थी। उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते बहुत सारे भारतीय यह महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए अंग्रेजों की नज़र में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन खुद नहीं सँभाल सकते।

इसके जवाब में भारत के लोग अपनी महान उपलब्धियों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे उन्होंने उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखना शुरू कर दिया।

जब कला और वास्तुशिल्प, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, कानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे। उनका कहना था की इस महान युग के बाद पतन का समय आया और भारत को गुलाम बना लिया गया।

इस राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्धियों पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाने का आह्वान किया जाता था।

लोगों को एकजुट करने की इन कोशिशों की अपनी समस्याएँ थीं।

जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था। वह हिंदुओं का अतीत था।

छवियों का सहारा गौरवगान किया जा रहा था वह हिंदुओं का अतीत था।

जिन छवियों का सहारा लिया जा रहा था वे हिंदू प्रतीक थे।

इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग-अलग महसूस करने लगे थे।

भारत में राष्ट्रवाद (समय के अनुसार एक नजर में) :-

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ ।

1870 बंकिमचंद्र द्वारा वंदेमातरम की रचना हुई ।

1885 में कांग्रेस की स्थापना बम्बई ( मुम्बई ) में हुई । व्योमेश चंद्र बनर्जी कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष बने ।

लार्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव किया ।

1905 में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता का चित्र बनाया ।

1906 में आगा खां एवं नवाब सलीमुल्ला ने मुस्लिम लीग की स्थापना की ।

1907 में कांग्रेस का विभाजन नरम दल एवं गरम दल में हुआ ।

1911 में दिल्ली दरबार का आयोजन । दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन को रद्द किया गया । दिल्ली दरबार में राजधानी कोलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की गई ।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ ।

1915 में महात्मा गाँधी की स्वदेश वापसी ।

1917 में महात्मा गाँधी ने नील कृषि के विरोध में चंपारण में आंदोलन किया ।

1917 में महात्मा गाँधी ने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के लिए सत्याग्रह किया ।

1918 में महात्मा गाँधी ने गुजरात के अहमदाबाद में सूती कपड़ा मिल के कारीगरों के लिए सत्याग्रह किया ।

1918 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति हुई ।

ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की स्वशासन की माँग को ठुकरा दिया ।

1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों पर रॉलट एक्ट जैसा काला कानून दिया ।

13 अप्रैल 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ ।

1919 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत मुहम्मद अली व शौकत अली ने की ।

महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत की ।

1922 में चौरी – चौरा में हुई । हिंसक घटना के बाद महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया ।

9 अगस्त 1925 को काकोरी में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूट लिया ।

1928 में साइमन कमीशन भारत आया जिसका विरोध करते हुए लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई ।

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली पर बम फेंका

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती से दाण्ड़ी यात्रा आरम्भ की ।

6 अप्रैल 1930 को दाण्डी पहुँच कर महात्मा गाँधी नमक कानून तोड़ा व सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत की ।

1930 में डॉ . अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों को दमित वर्ग एसोसिएशन में संगठित किया ।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह , सुखदेव एवं राजगुरू को फांसी दे दी गई ।

1931 गांधी इरविन समझौता व सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस ले लिया ।

1931 में महात्मा गाँधी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया । परंतु उन्हें वहाँ अपेक्षित सफलता हाथ नहीं लगी ।

1932 मे महात्मा गांधी एवं अम्बेडकर के मध्य पूना पैक्ट हुआ ।

1933 में चौधरी रहमत अली सर्वप्रथम पाकिस्तान का विचार सामने रखा ।

1935 में भारत शासन अधिनियम पारित हुआ व प्रांतीय सरकार का गठन ।

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध का आरंभ ।

1940 के मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवशेन में पाकिस्तान की मांग का संकल्प पास किया गया ।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत व गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया ।

1945 में अमेरीका ने जापान पर परमाणु हमला किया व द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया ।

1946 में कैबिनेट मिशन संविधान सभा के प्रस्ताव के साथ भारत आया ।

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ।


Class 10 History Chapter 2  Important Question Answer

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01. सत्याग्रह के विचार का क्या अर्थ है?

अथवा, 

गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह के विचार की व्याख्या कीजिए। [BSEB 2014]

उत्तर ⇒ सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है। सत्य ही आत्मा का सार है। इसलिए इस बल को सत्याग्रह कहा जाता है।

आत्मा को ज्ञान से सूचित किया जाता है। यह प्रेम की लौ जलाता है। अहिंसा परम धर्म है। सत्याग्रह के विचार ने सत्य की शक्ति और सत्य की खोज की आवश्यकता पर बल दिया। इसने सुझाव दिया कि यदि कारण सही था, यदि संघर्ष अन्याय के खिलाफ था, तो अत्याचारी से लड़ने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं थी।

प्रतिशोध या आक्रामक हुए बिना, एक सत्याग्रही अहिंसा के माध्यम से युद्ध जीत सकता था। सत्याग्रह में, उत्पीड़कों सहित लोगों को – हिंसा के माध्यम से सत्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के बजाय, सत्य को देखने के लिए राजी करना पड़ा। इस प्रकार इस संघर्ष से अंतत: सत्य की विजय निश्चित थी। महात्मा गांधी का मानना ​​था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकजुट करेगा।

02. भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का परीक्षण करें।

उत्तर ⇒  19वीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में अनेक कारणों का योगदान था। इनमें निम्नलिखित कारण प्रमुख थे-

(i) अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध असंतोष – भारतीय राष्ट्रीयता के विकास का सबसे प्रमुख कारण अंग्रेजी नीतियों के प्रति बढ़ता असंतोष था। अंग्रेजी सरकार की नीतियों के शोषण के शिकार देशी रजवाड़े, ताल्लुकेदार, महाजन, कृषक, मजदूर, मध्यम वर्ग सभी बने। सभी अंग्रेजी शासन को अभिशाप मानकर इसका खात्मा करने का मन बनाने लगे।

(ii) आर्थिक कारण – भारतीय राष्ट्रवाद का उदयं का एक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक था। सरकारी आर्थिक नीतियों के कारण कृषि और कुटीर-उद्योग धंधे नष्ट हो गए। किसानों पर लगान एवं कर्ज का बोझ चढ़ गया। किसानों को नगदी फसल नील, गन्ना, कपास उपजाने को बाध्य कर उसका भी मुनाफा सरकार ने उठाया। अंग्रेजी आर्थिक नीति से भारत से धन का निष्कासन हुआ, जिससे भारत की गरीबी बढ़ी। इससे भारतीयों में प्रतिक्रिया हुई एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

(iii) अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार-  19वीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार ने भारतीयों की मानसिक जड़ता समाप्त कर दी। वे भी अब अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, फ्रांस एवं यूरोप की अन्य महान क्रांतियों से परिचित हुए। रूसो, वाल्टेयर, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे दार्शनिकों एवं क्रांतिकारियों के विचारों का प्रभाव उनपरपरा पड़ा ।

(iv) सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलन का प्रभाव –  19वीं शताब्दी के सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भी राष्ट्रीयता की भावना विकसित की। ब्रह्मसमाज, आर्य-समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन ने एकता, समानता एवं स्वतंत्रता की भावना जागृत की तथा भारतीयों में आत्म-सम्मान, गौरव एवं राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने में योगदान किया।

(v) राजनीतिक एकीकरण- भारत में अंग्रेजों ने उग्र साम्राज्यवादी नीति अपनाई। वारेन हेस्टिंग्स से लेकर लॉर्ड डलहौजी ने येन-केन-प्रकारेण देशी रियासतों को अपना अधीनस्थ बना लिया। 1857 के विद्रोह के बाद महारानी विक्टोरिया ने सभी देशी राज्यों की अंग्रेजी अधिसत्ता में ले लिया। इससे एक प्रकार से भारत का । राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकीकरण हुआ। लॉर्ड डलहौजी द्वारा रेल, डाक-तार की व्यवस्था से आवागमन और संचार की सुविधा बढ़ गई। इससे संपूर्ण भारत में। स्थानीयता की भावना के स्थान पर राष्ट्रीयता की भावना बढ़ी।

03. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधीजी के योगदान की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में 1919-1947 का काल गाँधी युग के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय आंदोलन को गाँधीजी ने एक नई दिशा दिया। सत्य अहिंसा, सत्याग्रह का प्रयोग कर गाँधीजी भारतीय राजनीति में छा गए। इन्हीं अस्ता का सहारा लेकर वे औपनिवेशिक सरकार के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों क जन-आंदोलन में परिवर्तित कर दिया। 1917-18 में उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया। 1920 ई० में गाँधीजी ने अहसयोग आंदोलन आरंभ किया। जिसम बहिष्कार, स्वदेशी तथा रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल दिया गया। 1930 में गाँधी जी ने सरकारी नीतियों के विरुद्ध दूसरा व्यापक आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन आरभ किया। इसका आरंभ उन्होंने 12 मार्च, 1930 को दांडी यात्रा से किया।

गाँधीजी का 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन था जिसमें उन्होंने लोगों को प्रेरित करते हुए ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया। गाँधीजी के सतत् प्रयत्नों के परिणामस्वरूप ही 15 अगस्त, 1947 को भारत का आजादी प्राप्त हुई। वे एक राजनीतिक नेता के साथ-साथ प्रबुद्ध चिंतन समाजसुधारक एवं हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे।

04. खिलाफत आंदोलन क्यों हुआ ? गाँधीजी ने इसका समर्थन क्यों किया?

उत्तर ⇒ तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य की राजधानी) का खलीफा जो ऑटोमन साम्राज्य का सुलतान भी था, संपूर्ण इस्लामी जगत का धर्मगुरु था। पैगंबर के बाद सबसे अधिक प्रतिष्ठा उसी की थी। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी के साथ तुर्की भी पराजित हुआ। पराजित तुर्की पर विजयी मिस्र-राष्ट्रों ने कठोर संधि थोप दी (सेव्र की संधि)। ऑटोमन साम्राज्य को विखंडित कर दिया गया।

खलीफा और ऑटोमन साम्राज्य के साथ किए गए व्यवहार से भारतीय मुसलमानों में आक्रोश व्याप्त हो गया। वे तुर्की के सुल्तान एवं खलीफा की शक्ति और प्रतिष्ठा की पुनः स्थापना के लिए संघर्ष करने को तैयार हो गए। इसके लिए खिलाफत आंदोलन आरंभ किया गया। 1919 में अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) ने बंबई में खिलाफत समिति का गठन किया। आंदोलन चलाने के लिए जगह-जगह खिलाफत कमिटियाँ बनाकर तुर्की के साथ किए गए अन्याय के विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास किया गया। ‘ गाँधीजी ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देकर हिंदू-मुसलमान एकता स्थापित करने और एक बड़ा सशक्त राजविरोधी आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया।

05. अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कैसे हुई ? इसके प्रारंभिक उद्देश्य क्या थे?

उत्तर ⇒  भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत 19 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से माना जाता है। 1883 ई० में इंडियन एसोसिएशन के सचिव आनंद मोहन बोस ने कलकत्ता में ‘नेशनल काँफ्रंस’ नामक अखिल भारतीय संगठन का सम्मेलन बुलाया जिसका उद्देश्य बिखरे हुए राष्ट्रवादा शक्तियों को एकजुट करना था। परंतु, दूसरी तरफ एक अंग्रेज अधिकारी एलेन ऑक्टोवियन ह्यूम ने इस दिशा में अपने प्रयास शुरू किए और 1884 में ”भारतीय राष्ट्रीय संघ’ की स्थापना की। भारतीयों को संवैधानिक मार्ग अपनाने और सरकार के लिए सुरक्षा कवच बनाने के उद्देश्य से ए०ओ०ह्यूम ने 28 दिसम्बर, 1885 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। इसके प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित थे

(i) भारत के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय हित के नाम से जुड़े लोगों के , संगठनों के बीच एकता की स्थापना का प्रयास।

(ii) देशवासियों के बीच मित्रता और सद्भावना का संबंध स्थापित कर धर्म, वंश, जाति या प्रांतीय विद्वेष को समाप्त करना।

(iii) राष्ट्रीय एकता के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के लिए हर संभव प्रयास करना।

(iv) राजनीतिक तथा सामाजिक प्रश्नों पर भारत के प्रमुख नागरिकों से चर्चा करना एवं उनके संबंध में प्रमाणों का लेखा तैयार करना।

(v) प्रार्थना पत्रों तथा स्मार पत्रों द्वारा वायसराय एवं उनकी काउन्सिल से सुधारों हेतु प्रयास करना। इस प्रकार कांग्रेस का प्रारंभिक उद्देश्य शासन में सिर्फ सुधार करना था।

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06. असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्वरूप में क्या अंतर था ? महिलाओं की सविनय अवज्ञा आंदोलन में क्या भूमिका थी ?

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्वरूप में काफी विभिन्नता थी। असहयोग आंदोलन में जहाँ सरकार के साथ असहयोग करने की बात थी, वहीं सविनय अवज्ञा आंदोलन में न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का भी उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा। असहयोग आंदोलन की तुलना में सविनय अवज्ञा आंदोलन काफी व्यापक जनाधार वाला आंदोलन साबित हुआ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में पहली बार महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। वे घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर गांधीजी की सभाओं में भाग लिया। अनेक स्थानों पर स्त्रियों ने नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। स्त्रियों ने विदेशी वस्त्र एवं शराब के दुकानों की पिकेटिंग की। स्त्रियों ने चरखा चलाकर सूत काते और स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया। शहरी क्षेत्रों में ऊँची जाति की महिलाएं आंदोलन में सक्रिय थीं तो ग्रामीण इलाकों में संपन्न परिवार की किसान स्त्रिया।

07. सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधीजी के नेतृत्व में 1930 ई० में शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित थे –

(i) साइमन कमीशन-  सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में बनाया गया यह 7 सदस्यीय आयोग था जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। भारत में साइमन कमीशन के विरोध का मुख्य कारण कमीशन में एक भी भारतीय को नहीं रखा जाना तथा भारत के स्वशासन के संबंध में निर्णय विदेशियों द्वारा किया जाना था।

(ii) नेहरू रिपोर्ट-   कांग्रेस ने फरवरी, 1928 में दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया। समिति ने ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेट’ की दर्जा देने की माँग की। यद्यपि नेहरू रिपोर्ट स्वीकृत नहीं हो सका, लेकिन संप्रदायिकता की भावना उभरकर सामने आई। अतः गाँधीजी ने इससे निपटने के लिए सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम पेश किया।

(iii) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी-  1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा पड़ा। भारत का निर्यात कम हो गया लेकिन अंग्रेजों ने भारत से धन का निष्कासन बंद नहीं किया। पूरे देश का वातावरण सरकार के खिलाफ था। इस प्रकार सविनय अवज्ञा आंदोलन हेतु एक उपयुक्त अवसर दिखाई पड़ा।

(iv) समाजवाद का बढ़ता प्रभाव-  इस समय कांग्रेस के युवा वर्गों के बीच मार्क्सवाद एवं समाजवादी विचार तेजी से फैल रहे थे, इसकी अभिव्यक्ति कांग्रेस के अंदर वामपंथ के उदय के रूप में हुई। वामपंथी दबाव को संतुलित करने के आंदोलन के नए कार्यक्रम की आवश्यकता थी।

(v) क्रांतिकारी आंदोलनों का उभार-  इस समय भारत की स्थिति विस्फोटक थी। ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ और ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ ने सरकार विरोधी विचारधारा को उग्र बना दिया था। बंगाल में भी क्रांतिकारी गतिविधियाँ एक बार फिर उभरी।

(vi) पूर्णस्वराज्य की माँग-  दिसंबर, 1929 के कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पर्ण स्वराज्य की माँग की गयी। 26 जनवरी, 1930 को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा के साथ ही पूरे देश में उत्साह की एक नई लहर जागृत हुई।

(vii) गाँधी का समझौतावादी रुख – आंदोलन प्रारंभ करने से पूर्व गाँधी ने वायसराय लार्ड इरावन के समक्ष अपनी 11 सूत्रीय माँग को रखा। परन्तु इरविन ने मांग मानना तो दूर गाँधी से मिलने से भी इनकार कर दिया। सरकार का दमन चक्र तेजी से चल रहा था। अतः बाध्य होकर गाँधीजी ने अपना आंदोलन डांडी मार्च आरम्भ करने का निश्चय किया।

08. जालियाँवाला बाग हत्याकांड क्यों हुआ ? इसने राष्ट्रीय आंदोलन को कैसे बढ़ावा दिया ?

उत्तर ⇒  भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों पर अकुंश लगाने के उद्देश्य से सरकार ने 1919 में रॉलेट कानून (क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम) बनाया। इस कानून के अनुसार सरकार किसी को भी संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए उसको दंडित कर सकती थी तथा इसके खिलाफ कोई अपील भी नहीं की जा सकती थी। भारतीयों ने इस कानून का कड़ा विरोध किया। इसे ‘काला कानून’ की संज्ञा दी गई। अमृतसर में एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ० सत्यपाल और डॉ० सैफुद्दीन किचलू कर रहे थे। सरकार ने दोनों को गिरफ्तार कर अमृतसर से निष्कासित कर दिया।

जनरल डायर ने पंजाब में फौजी शासन लागू कर आतंक का राज स्थापित कर दिया। पंजाब के लोग अपने प्रिय नेता की गिरफ्तारी तथा सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ 13 अप्रैल, 1919 को वैसाखी मेले के अवसर पर अमृतसर के जालियांवाला बाग में एक विराट सम्मेलन कर विरोध प्रकट कर रहे थे, जिसके कारण ही जनरल डायर ने निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलवा दी। यह घटना जालियाँवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना गया।

जालियाँवाला बाग की घटना ने पूरे भारत को आक्रोशित कर दिया। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन और हडताल हुए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस घटना के विरोध में अपना ‘सर’ का खिताब वापस लौटाने की घोषणा की। वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य शंकरन नायर ने इस्तीफा दे दिया। गाँधीजी ने कैसर-ए-हिन्द की उपाधि त्याग दी। जालियाँवाला बाग हत्याकांड ने राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई जान फूंक दी।

09. प्रथम विश्वयद्ध के भारतीय राष्टीय आंदोलन के साथ अन्तसबमा की विवेचना करें।

उत्तर ⇒  प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत में होनेवाली तमाम घटनाएँ से उत्प परिस्थितियों की ही देन थी। इसने भारत में नई आर्थिक और राजनैतिक स्थिति उत्प की जिससे भारतीय राष्ट्रवाद ज्यादा परिपक्व हुआ। महायुद्ध के बाद भारत आर्थिक स्थिति बिगडी। पहले तो कीमतें बढी और फिर आर्थिक गतिविधिया होने लगी जिससे बेरोजगारी बढी। महँगाई अपने चरम बिन्दु पर पहुँच गयी | मजदूर, किसान दस्तकारों का सबसे अधिक प्रभावित किया। इसी परिस्थिति :

धागपतियों का एक वर्ग का उदय हुआ। युद्ध के बाद भारत में विदेशा पूंजी का प्रभाव बढ़ा। भारतीय उद्योगपतियों ने सरकार से विदेशी वस्तुओं के आयात में भारी आयात शुल्क लगाने की माँग की जिससे उनका घरेलू उद्योग बढ़े लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को इनकार कर दिया। अंततः प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत सहित पूरे एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रबल बनाया।

10. भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में जनजातीय लोगों की क्या भूमिका थी ?

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में जनजातियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 19 वीं एवं 20 वीं शताब्दियों में उनके अनेक आंदोलन हुए। 19 वा शताब्दी में हो, कोल, संथाल एवं बिरसा मुंडा आंदोलन हुए। 1916 में दक्षिण भारत की गोदावरी पहाड़ियों के पुराने रंपा प्रदेश में विद्रोह हुआ। 1920 के दशक में आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में अल्लूरी सीताराम राजू का विद्रोह हुआ।

छोटानागपुर में उराँव जनजातियों के बीच जतरा भगत के नेतृत्व में ताना भगत आंदोलन चला। इन प्रमुख आंदोलनों के अतिरिक्त देश के अन्य भागों में भी अनेक जनजातीय विद्रोह हुए, जैसे – उड़ीसा में 1914 का खोंड विद्रोह, 1917 में मयूरभंज में संथालों एवं मणिपुर में थोडोई कुकियों का विद्रोह, बस्तर में 1910 में गुंदा धुर का विद्रोह इत्यादि। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत की जनजातियों एवं भारत छोडो आंदोलन के समय झारखंड के आदिवासियों ने भी विद्रोह किए। ये सभी जनजातीय विद्रोह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे।


Class 10 History chapter 2 Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. यूरोप में राष्ट्रवाद के साथ किन का उदय हुआ ?

    1. राष्ट्र राज्यों
    2. राष्ट्र चेतना
    3. राष्ट्र प्रेम
    4. राष्ट्र शक्ति

Ans –  A 

2. यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद ने किससे सम्पर्क स्थापित किए ?

    1. नए चिह्नों
    2. प्रतीकों ने
    3. नए विचारों व् गीतों ने
    4. उपरोक्त सभी

Ans – D 

3. किसके नेत्रत्व में कांग्रेस ने एक विशाल आन्दोलन खड़ा किया ?

    1. महात्मा गांधी
    2. जवाहर लाला नेहरु
    3. राजीव गाँधी
    4. राजेन्द्र प्रसाद

Ans – 

4. प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में कैसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी ?

    1. एक नई राजनितिक
    2. आर्थिक स्थिति
    3. 1 और 2 दोनों
    4. इनमें से कोई नहीं

Ans – C

5. किससे किस वर्ष तक देश के बहुत सारे भागों में फसल नष्ट हो गई थी ?

    1. 1918-21
    2. 1917-22
    3. 1918-22
    4. 1919-23

Ans – A 

6. किस वर्ष तक देश के बहुत सरे भागों में महामारी फैल गई ?

    1. 1919
    2. 1920
    3. 1921
    4. 1922

Ans – C 

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7. महामारी और दुर्भिख के कारण कितने लोग मारे गए ?

    1. 121-131 लाख
    2. 120-130 लाख
    3. 110-120 लाख
    4. 120-140 लाख

Ans – B  

8. किस वर्ष महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे ?

    1. 1913
    2. 1915
    3. 1914
    4. 1912

Ans – B 

9. सत्य की शक्ति व खोज किस विचार पर बल देता है ?

    1. सत्याग्रह
    2. आग्रह
    3. आंदोलन
    4. विद्रोह

Ans – A  

10. भारत में सत्याग्रह आंदोलन किसने चलाया ?

    1. नेहरु जी ने
    2. गाँधी जी ने
    3. लाला लाजपतराय जी ने
    4. राजीव गाँधी जी ने

Ans – B  

11. गुजरात के खेड़ा ज़िले के किसानों की सहायता के लिए सत्याग्रह का आयोजन कब किया गया ?

    1. 1916
    2. 1915
    3. 1917
    4. 1918

Ans – C 

12. गाँधी जी अहमदाबाद कब गए ?

    1. 1916
    2. 1917
    3. 1918
    4. 1919

Ans – C 

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13. रोलेट एक्ट कब पारित हुआ था ?

    1. 1917
    2. 1918
    3. 1919
    4. 1920

Ans – C 

14. जलियाँवाला बाग हत्याकांड कब हुआ ?

    1. 12 अप्रैल
    2. 13 अप्रैल
    3. 14 अप्रैल
    4. 11 अप्रैल

Ans – B 

15. अमृतसर में पुलिस ने एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली कब चलाई ?

    1. 12 अप्रैल
    2. 13 अप्रैल
    3. 11 अप्रैल
    4. 10 अप्रैल

Ans – 

16. गांधीजी ने साबरमती आश्रम की स्थापना किस वर्ष की?

    • (A) 1995 ईस्वी में
    • (B) 1900 ईस्वी में
    • (C) 1915 ईस्वी में
    • (D) 1916 ईस्वी में

Ans – (C)  

17. सिपाही विद्रोह कब हुआ था?

    • (A) 1855 ईस्वी में
    • (B) 1857 ईस्वी में
    • (C) 1885 ईस्वी में
    • (D) 1887 ईस्वी में

Ans – (B) 

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18. वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि किस किसान आंदोलन के दौरान दी गई?

    • (A) बारदोली
    • (B) अहमदाबाद
    • (C) खेड़ा
    • (D) चंपारण

Ans – (A)  

19. पूर्व स्वराज की मांग का प्रस्ताव कांग्रेस के किस वार्षिक अधिवेशन में पारित हुआ?

    • (A) 1929, लाहौर
    • (B) 1931, कराची
    • (C) 1933, कोलकाता
    • (D) 1937, बेलगांव

Ans – (A)  

20. भारत में खिलाफत आंदोलन कब और किस देश के शासन के समर्थन में शुरू हुआ?

    • (A) 1920 ईस्वी तुर्की
    • (B) 1920 ईस्वी अरब
    • (C) 1920 ईस्वी फ्रांस
    • (D) 1920 ईस्वी नागपुर

Ans – (A) 

21 . गदर पार्टी की स्थापना किसने और कब की?

    • (A) गुरुदयाल सिंह 1916 ईस्वी में
    • (B) चंद्रशेखर आजाद 1920 ईस्वी में
    • (C) लाला हरदयाल 1913 ईस्वी में
    • (D) सोहन सिंह भाखना 1918 ईस्वी में

Ans – (C)  

22. असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव कांग्रेस के किस अधिवेशन में पारित हुआ?

    • (A) सितंबर 1920 ईस्वी, कोलकाता
    • (B) अक्टूबर 1920 ईस्वी, अहमदाबाद
    • (C) नवंबर 1920 ईस्वी, फैजपुर
    • (D) दिसंबर 1920ईस्वी, नागपुर

Ans – (A) 

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Class 10 History Chapter 3 Notes in Hindi | भूमंडलीकृत विश्व का बनना

Class 10 History Chapter 3 Notes in Hindi: covered History Chapter 3 easy language with full details & concept  इस अध्याय में हमलोग जानेंगे कि – वैश्वीकरण किसे कहते हैं(what is globalization), भूमंडलीकरण से आप क्या समझते हैं?(What do you understand by Globalization), आधुनिक युग से पहले की यात्राएँ किस प्रकार की होती थी?, भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रक्रिया(process of becoming a globalized world), भोजन के यात्रा  शुरुआत कैसे हुई(स्पैघेत्ती और आलू), बिमारी से विजय प्राप्त करना किस प्रकार समस्याएं थी?, अमेरिका में बाहरी लोगों का आगमन कैसे हुआ(How did outsiders come to America)?, 19वीं शताब्दी का विश्व(1815 -1914), अठारहवीं सदी तक भारत और चीन की दिशाएँ(Directions of India and China till the 18th century), विश्व अर्थव्यवस्था का उदय(rise of the world economy), विदेशों में भारतीय  उघमी, भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था, वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का भारत में प्रभाव, भारत और महामंदी(India and the Great Depression) , विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण : युद्धोत्तर काल(Rebuilding the World Economy: The Post-War Period)? सांस्कृतिक समागम से वैश्विक दुनिया का उदय, अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ का उद्भव? 

Class 10 History Chapter 3 Notes in Hindi full details

category  Class 10 History Notes in Hindi
subjects  History
Chapter Name Class 10 Becoming a globalized world (भूमंडलीकृत विश्व का बनना) 
content Class 10 History Chapter 3 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 History Chapter 3 notes in Hindi

इतिहास अध्याय 3 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – इतिहास   अध्याय – 3

भूमंडलीकृत विश्व का बनना

Becoming a globalized world


परिचय (Introduction) -: 

वैश्वीकरण (Globalization):-

वैश्वीकरण एक आर्थिक प्रणाली है और व्यक्तियों सामानों और नौकरियों का एक देश से दूसरे देश तक के स्थानांतरण को वैश्वीकरण कहते हैं ।

वैश्विक दुनिया के निर्माण को समझने के लिए हमें व्यापार के इतिहास, प्रवासन और लोगों को काम की तलाश और राजधानियों की आवाजाही को समझना होगा ।

भूमंडलीकरण:-

दुनिया भर में आर्थिक , सांस्कृतिक , राजनीतिक , धार्मिक और सामाजिक प्रणालियों का एकीकरण । इसका मतलब यह है कि वस्तुओं और सेवाओं , पूंजी और श्रम का व्यापार दुनिया भर में किया जाता है , देशों के बीच सूचना और शोध के परिणाम आसानी से प्रवाहित होते हैं ।

❖ आधुनिक युग से पहले की यात्राएँ:- 

3000 ईसा पूर्व , एक सक्रिय तटीय व्यापार ने सिंधु घाटी की सभ्यताओं को वर्तमान पश्चिम एशिया के साथ जोड़ा ।

जब हम ‘वैश्वीकरण’ की बात करते हैं तो आमतौर पर हम एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था की बात करते हैं जो मोटे तौर पर पिछले लगभग पचास सालों में ही हमारे सामने आई है।

❒ भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रक्रिया –

➤ व्यापार का काम की तलाश में एक जगह से दुसरी जगह जाते लोगों का, पूँजी व बहुत सारी चीजों की वैश्विक आवाजाही का एक लंबा इतिहास रहा है।

➤ वर्तमान के वैश्विक संबंधों को देखकर सोचना पड़ता है कि यह दुनिया के संबंध किस प्रकार बने। इतिहास के हर दौर में मानव समाज एक दूसरे के ज्यादा नजदीक आते गए हैं।

➤ प्राचीन काल से ही यात्री, व्यापारी, एक पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसरों और आध्यात्मिक शांति के लिए या उत्पीड़न  (यातनापूर्ण) जीवन से बचने के लिए दूर-दूर की यात्राओं पर जाते रहे हैं।

➤ अपनी यात्राओं में ये लोग तरह तरह की चीजें, पैसा, मूल्य-मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार और यहाँ तक कि कीटाणु और बीमारियाँ भी साथ लेकर चलते रहे हैं।

➤ 3000 ईसा पूर्व में समुद्री तटों पर होने वाले व्यापार के माध्यम से सिंधु घाटी की सभ्यता उस इलाके से भी जुड़ी हुई थी जिसे आज हम पश्चिमी एशिया के नाम से जानते हैं।

➤ हज़ार साल से भी ज्यादा समय से मालदीव के समुद्र में पाई जाने वाली कौड़ियाँ (जिन्हें पैसे या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था) चीन और पूर्वी अफ्रीका तक पहुँचती रही हैं।

➤ बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं का दूर-दूर तक पहुँचने का इतिहास भी सातवीं सदी तक ढूँढ़ा जा सकता है। तेरहवीं सदी के बाद तो इनके प्रसार को निश्चय ही साफ देखा जा सकता है।

रेशम मार्ग (सिल्क रूट):-

सिल्क रूट ( रेशम मार्ग ) एक ऐतिहासिक व्यापार मार्ग था जो कि दूसरी शताब्दी ई० पू० से 14 वीं शताब्दी तक , यह चीन , भारत , फारस , अरब , ग्रीस और इटली को पीछे छोड़ते हुए एशिया से भूमध्यसागरीय तक फैला था । उस दौरान हुए भारी रेशम व्यापार के कारण इसे सिल्क रूट करार दिया गया था ।

➤ ‘सिल्क मार्ग’ नाम से पता चलता है कि इस मार्ग से पश्चिम को भेजे जाने वाले चीनी रेशम (सिल्क) का कितना महत्त्व था।

➤ जमीन या समुद्र से होकर गुजरने वाले ये रास्ते न केवल एशिया के विशाल क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करते थे बल्कि एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से भी जोड़ते थे।

➤ ऐसे मार्ग ईसा पूर्व के समय में ही सामने आ चुके थे और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक अस्तित्व में थे।

➤ रेशम मार्ग से चीनी पॉटरी जाती थी और इसी रास्ते से भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे।

सिल्क मार्ग :- ये मार्ग एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के साथ – साथ विश्व को जमीन और समुद्र मार्ग से जोड़ते थे। सिल्क रूट के रास्ते ही ईसाई , इस्लाम और बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न भागों में पहुँच पाए थे। रेशम मार्गों को दुनिया के सबसे दूर के हिस्सों को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता था ।

भोजन की यात्रा (स्पैघेत्ती और आलू) :-

स्पैघेत्ती :-

नूडल चीन की देन है जो वहाँ से दुनिया के दूसरे भागों तक पहुँचा । भारत में हम इसके देशी संस्करण सेवियों को वर्षों से इस्तेमाल करते हैं । इसी नूडल का इटैलियन रूप है स्पैघेत्ती ।

➤ नूडल्स चीन से पश्चिम में पहुँचे और वहाँ उन्हीं से स्पैघेत्ती (पास्ता) का जन्म हुआ।

आज के कई आम खाद्य पदार्थ ; जैसे आलू , मिर्च टमाटर , मक्का , सोया , मूंगफली और शकरकंद यूरोप में तब आए जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिकी महाद्वीपों को खोज निकाला ।

ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब पहुँचे जब क्रिस्टोफर कोलंबस गलती से 1492 में उन अज्ञात महाद्वीपों में पहुँच गया था जिन्हें बाद में अमेरिका के नाम से जाना जाने लगा।

आलू :-

आलू के आने से यूरोप के लोगों की जिंदगी में भारी बदलाव आए । आलू के आने के बाद ही यूरोप के लोग इस स्थिति में आ पाए कि बेहतर खाना खा सकें और अधिक दिन तक जी सकें ।

आयरलैंड के किसान आलू पर इतने निर्भर हो चुके थे कि 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी से आलू की फसल तबाह हो गई तो कई लाख लोग भूख से मर गए । उस अकाल को आइरिस अकाल के नाम से जाना जाता है ।

❖ बिमारी से विजय प्राप्त करना –

➤ सोलहवीं सदी के मध्य तक आते आते पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।

➤ यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीतती थीं।

➤ स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत किस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफसरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे।

➤ लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी। फलस्वरूप, इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई।

➤ एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई ।

➤ जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे।

➤ चेचक की बीमारी ने पूरे के पूरे समुदायों को खत्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया। बंदूकों को तो खरीद कर या छीन कर हमलावरों के ख़िलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता था।

➤ चेचक जैसी बीमारियों के मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास उससे बचाव का तरीका भी था और उनके शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित हो चुकी थी।

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❖ अमेरिका में बाहरी लोगों का आगमन:- 

➤ उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में गरीबी और भूख का ही साम्राज्य था। शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था। धार्मिक टकराव आम थे। धार्मिक असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था। इस वजह से हजारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका जाने लगे।

➤ अठारहवीं सदी तक अमेरिका में अफ्रीका से पकड़ कर लाए गए गुलामों को काम में झोंक कर यूरोपीय बाजारों के लिए कपास और चीनी का उत्पादन किया जाने लगा था।

➤ अठारहवीं शताब्दी का काफी समय बीत जाने के बाद भी चीन और भारत को दुनिया के सबसे धनी देशों में गिना जाता था। एशियाई व्यापार में भी उन्हीं का दबदबा था।

➤ विशेषज्ञों का मानना है कि पंद्रहवीं सदी से चीन ने दूसरे देशों के साथ अपने संबंध कम करना शुरू कर दिए और वह दुनिया से अलग-थलग पड़ने लगा।

➤ चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्त्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसकने लगा। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

❖ 19वीं शताब्दी का विश्व (1815 -1914):- 

➤ उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदलने लगी। आर्थिक, राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारकों ने पूरे के पूरे समाजों की कायापलट कर दी और विदेश संबंधों को नए ढर्रे में ढाल दिया।

➤ अर्थशास्त्रिायों ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की गतियों या ‘प्रवाहों’ का उल्लेख किया है।

➤ व्यापार प्रवाह – व्यापार प्रवाह जो उन्नीसवीं सदी में मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा या गेहूँ आदि) के व्यापार तक ही सीमित था।

➤ श्रम का प्रवाह – इसमें लोग काम या रोजगार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।

➤ प्रवाह पूँजी – जिसे अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज के इलाकों में निवेश कर दिया जाता है।

➤ ये तीनों तरह के प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे।

➤ कभी – कभी इन कारकों के बीच मौजूद संबंध टूट भी जाते थे।

➤ उदाहरण के लिए, वस्तुओं या पूँजी की आवाजाही के मुकाबले श्रमिकों की आवाजाही पर प्रायः ज्यादा शर्तें और बंदिशें लगाई जाती थीं।

➤ 1885 में यूरोप की बड़ी शक्तियाँ बर्लिन में मिलीं और अफ्रिकी महादेश को आपस में बाँट लिया । इस तरह से अफ्रिका के ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बन गईं ।

यूरोप में समस्याएँ :-

उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में कई समस्याएँ थीं ; जैसे गरीबी , बीमारी और धार्मिक टकराव । धर्म के खिलाफ बोलने वाले कई लोग सजा के डर से अमेरिका भाग गए थे । उन्होंने अमेरिका में मिलने वाले अवसरों का भरपूर इस्तेमाल किया और इससे उनकी काफी तरक्की हुई ।

अठारहवीं सदी तक भारत और चीन:-

अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश हुआ करते थे । लेकिन पंद्रहवीं सदी से ही चीन ने बाहरी संपर्क पर अंकुश लगाना शुरु किया था और दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग थलग हो गया था । चीन के घटते प्रभाव और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व के व्यापार का केंद्रबिंदु यूरोप की तरफ शिफ्ट कर रहा था ।

विश्व अर्थव्यवस्था का उदय :-

➤ आइए इन तीनों को समझने के लिए ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर नजर डालें ।

➤ 18 वीं सदी के आखिरी दशक तक ब्रिटेन में “ कॉर्न लॉ ” था ।

➤ कॉर्न लॉ :- कार्न ला वह कानून जिसके सहारे सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी थी ।

➤ कुछ दिन बाद ब्रिटेन में जनसंख्या का बहुत ज्यादा बढ़ गई , जैसे ही जनसंख्या बढ़ी भोजन की मांग में वृद्धि हो गई ।

➤ भोजन की मांग बढ़ी तो कृषि आधारित सामानों में भी वृद्धि हो गई।

➤ इससे पहले की ब्रिटेन में भुखमरी आती , सरकार ने कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया ।

➤ जिस से अलग अलग देश के व्यापारियों ने ब्रिटेन में भोजन का निर्यात किया ।

➤ भोजन की कमी में बदलाव आया और विकास होने लगा ।

कॉर्न लॉ के समय :-

➤ भोजन की मांग बढ़ी

➤ जनसंख्या बढ़ी

➤ भोजन के दाम बढ़े

कॉर्न लॉ हटाने के बाद :-

➤ व्यापार में वृद्धि

➤ विकास का तेज होना

➤ भोजन का अधिक भंडार

रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग :-

रिंडरपेस्ट :- रिंडरपेस्ट प्लेग की भाँति फैलने वाली मवेशियों की बीमारी थी । वह बीमारी 1890 ई० के दशक में अफ्रीका में बड़ी तेजी से फैली ।

रिंडरपेस्ट का प्रकोप :-

रिंडरपेस्ट का अफ्रिका में आगमन 1880 के दशक के आखिर में हुआ था । यह बीमारी उन घोड़ों के साथ आई थी जो ब्रिटिश एशिया से लाए गए थे । ऐसा उन इटैलियन सैनिकों की मदद के लिए किया गया था जो पूर्वी अफ्रिका में एरिट्रिया पर आक्रमण कर रहे थे ।

रिंडरपेस्ट पूरे अफ्रिका में किसी जंगल की आग की तरह फैल गई । 1892 आते आते यह बीमारी अफ्रिका के पश्चिमी तट तक पहुँच चुकी थी । इस दौरान रिंडरपेस्ट ने अफ्रिका के मवेशियों की आबादी का 90 % हिस्सा साफ कर दिया ।

अफ्रिकियों के लिए मवेशियों का नुकसान होने का मतलब था रोजी रोटी पर खतरा । अब उनके पास खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था । इस तरह से मवेशियों की एक बीमारी ने यूरोपियन को अफ्रिका में अपना उपनिवेश फैलाने में मदद की| 

1900 के दशक से भारत के राष्ट्रवादी लोग बंधुआ मजदूर के सिस्टम का विरोध करने लगे थे । इस सिस्टम को 1921 में समाप्त कर दिया गया| 

विदेशों में भारतीय  उघमी :-

भारत के नामी बैंकर और व्यवसायियों में शिकारीपुरी श्रौफ और नटुकोट्टई चेट्टियार का नाम आता है । वे दक्षिणी और केंद्रीय एशिया में कृषि निर्यात में पूँजी लगाते थे । भारत में और विश्व के विभिन्न भागों में पैसा भेजने के लिए उनका अपना ही एक परिष्कृत सिस्टम हुआ करता था ।

भारत के व्यवसायी और महाजन उपनिवेशी शासकों के साथ अफ्रिका भी पहुंच चुके थे । हैदराबाद के सिंधी व्यवसायी तो यूरोपियन उपनिवेशों से भी आगे निकल गये थे । 1860 के दशक तक उन्होंने पूरी दुनिया के महत्वपूर्ण बंदरगाहों फलते फूलते इंपोरियम भी बना लिये थे ।

भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था :-

भारत से उम्दा कॉटन के कपड़े वर्षों से यूरोप निर्यात होता रहे थे । लेकिन इंडस्ट्रियलाइजेशन के बाद स्थानीय उत्पादकों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कॉटन के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बाध्य किया ।

इससे ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में भारी मात्रा में आने लगे । 1800 में भारत के निर्यात में 30 % हिस्सा कॉटन के कपड़ों का था । 1815 में यह गिरकर 15 % हो गया और 1870 आते आते यह 3 % ही रह गया । लेकिन 1812 से 1871 तक कच्चे कॉटन का निर्यात 5 % से बढ़कर 35 % हो गया । इस दौरान निर्यात किए गए सामानों में नील ( इंडिगो ) में तेजी से बढ़ोतरी हुई । भारत से सबसे ज्यादा निर्यात होने वाला सामान था अफीम जो मुख्य रूप से चीन जाता था ।

❖ वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का भारत में प्रभाव

➤ बहुत छोटे पैमाने पर ही सही लेकिन इसी तरह के नाटकीय बदलाव हम पंजाब मे  देख सकते हैं।

➤ यहाँ ब्रिटिश भारतीय सरकार ने अर्द्ध-रेगिस्तानी परती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास की खेती की जा सके।

❒ केनाल कॉलोनी – केनाल कॉलोनी नयी नहरों की सिंचाई वाले इलाकों में पंजाब के अन्य स्थानों के लोगों को लाकर बसाया गया। उनकी बस्तियों को केनाल कॉलोनी (नहर बस्ती) कहा जाता था।

➤ कपास की भी दुनिया भर में बड़े पैमाने पर खेती की जाने लगी थी ताकि ब्रिटिश कपड़ा मिलों की माँग को पूरा किया जा सके।

➤ रबड़ की कहानी भी इससे अलग नहीं है।

➤ विभिन्न चीजों के उत्पादन में विभिन्न इलाकों ने इतनी महारत हासिल कर ली थी कि 1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि हो चुकी थी।

➤ इस व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ‘प्राथमिक उत्पादों’ यानी गेहूँ और कपास जैसे कृषि उत्पादों तथा कोयले जैसे खनिज पदार्थों का था।

युद्धकालीन रूपांतरण :-

पहले विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को कई मायनों में झकझोर कर रख दिया था । लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ लोग घायल हो गये ।

मरने वाले या अपाहिज होने वालों में ज्यादातर लोग उस उम्र के थे जब आदमी आर्थिक उत्पादन करता है । इससे यूरोप में सक्षम शरीर वाले कामगारों की भारी कमी हो गई । परिवारों में कमाने वालों की संख्या कम हो जाने के कारण पूरे यूरोप में लोगों की आमदनी घट गई ।

ज्यादातर पुरुषों को युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ा लिहाजा कारखानों में महिलाएं काम करने लगीं । जो काम पारंपरिक रूप से पुरुषों के काम माने जाते थे उन्हें अब महिलाएँ कर रहीं थीं ।

इस युद्ध के बाद दुनिया की कई बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच के संबंध टूट गये । ब्रिटेन को युद्ध के खर्चे उठाने के लिए अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा । इस युद्ध ने अमेरिका को एक अंतर्राष्ट्रीय कर्जदार से अंतर्राष्ट्रीय साहूकार बना दिया । अब विदेशी सरकारों और लोगों की अमेरिका में संपत्ति की तुलना मंअ अमेरिकी सरकार और उसके नागरिकों की विदेशों में ज्यादा संपत्ति थी ।

महामंदी :-

➤ महामंदी की शुरूआत 1929 से हुई और यह संकट 30 के दशक के मध्य तक बना रहा । इस दौरान विश्व के ज्यादातर हिस्सों में उत्पादन , रोजगार , आय और व्यापार में बहुत बड़ी गिरावट दर्ज की गई ।

➤ युद्धोतर अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर हो गई थी । कीमतें गिरीं तो किसानों की आय घटने लगी और आमदनी बढ़ाने के लिए किसान अधिक मात्रा में उत्पादन करने लगे ।

➤ बहुत सारे देशों ने अमेरिका से कर्ज लिया। अमेरिकी उद्योगपतियों ने मंदी की आशंका को देखते हुए यूरोपीय देशों को कर्ज देना बन्द कर दिया। हजारों बैंक दिवालिया हो गये ।

भारत और महामंदी :-

➤ 1928 से 1934 के बीच देश का आयात निर्यात घट कर आधा रह गया ।

➤ अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने से भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत तक गिर गई ।

➤ किसानों और काश्तकारों को ज्यादा नुकसान हुआ ।

➤ महामंदी शहरी जनता एवं अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक ।

➤ 1931 में मंदी चरम सीमा पर थी जिसके कारण ग्रामीण भारत असंतोष व उथल – पुथल के दौर से गुजर रहा था ।

विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण : युद्धोत्तर काल

युद्ध के बाद के समझौते :-

दूसरा विश्व युद्ध पहले के युद्धों की तुलना में बिलकुल अलग था । इस युद्ध में आम नागरिक अधिक संख्या में मारे गये थे और कई महत्वपूर्ण शहर बुरी तरह बरबाद हो चुके थे । दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति में सुधार मुख्य रूप से दो बातों से प्रभावित हुए थे ।

पश्चिम में अमेरिका का एक प्रबल आर्थिक , राजनैतिक और सामरिक शक्ति के रूप में उदय ।
सोवियत यूनियन का एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तन ।

विश्व के नेताओं की मीटिंग हुई जिसमें युद्ध के बाद के संभावित सुधारों पर चर्चा की गई । उन्होंने दो बातों पर ज्यादा ध्यान दिया जिन्हें नीचे दिया गया है । औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन को बरकरार रखना और पूर्ण रोजगार दिलवाना। पूँजी , सामान और कामगारों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना ।

ब्रेटन – वुड्स समझौता :-

1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी ।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की स्थापना हुई। ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों पर आधारित होती थी ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां :-

बहुराष्ट्रीय निगम बड़ी कंपनियां हैं जो एक ही समय में कई देशों में काम करती हैं । एमएनसी का विश्व व्यापी प्रसार 1950 और 1960 के दशक में एक उल्लेखनीय विशेषता थी क्योंकि दुनिया भर में अमेरिकी व्यापार का विस्तार हुआ था। विभिन्न सरकारों द्वारा लगाए गए उच्च आयात शुल्क ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी विनिर्माण इकाइयों का पता लगाने के लिए मजबूर किया ।

वीटो :-

➤ एक कानून या निकाय द्वारा किए गए प्रस्ताव को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार ।

❖ सांस्कृतिक समागम से वैश्विक दुनिया का उदय

➤ सांस्कृतिक समागम के ये स्वरूप एक नयी वैश्विक दुनिया के उदय की प्रक्रिया का अंग थे। यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें अलग-अलग स्थानों की चीजें आपस में घुल-मिल जाती थी, उनकी मूल पहचान और विशिष्टताएँ गुम हो जाती थीं और बिलकुल नया रूप सामने आता था।

➤ ज्यादातर अनुबंधित श्रमिक अनुबंध समाप्त हो जाने के बाद भी वापस नहीं लौटे। जो वापस लौटे उनमें से भी अधिकांश केवल कुछ समय यहाँ बिता कर फिर अपने नए ठिकानों पर वापस चले गए।

➤ इसी कारण इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा पाई जाती है। जैसे आपने नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वी. एस. नायपॉल का नाम सुना होगा।

➤ वेस्ट इंडीज के क्रिकेट खिलाड़ी शिवनरैन चंद्रपॉल और रामनरेश सरवन का नाम भी हम भारतीयों जैसें है इस बात का भी यही कारण है कि वे भारत से गए अनुबंधित मजदूरों के ही वंशज हैं।

➤ बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से ही हमारे देश के राष्ट्रवादी नेता इस दास (गिरमिटिया मजदुर) प्रथा का विरोध करने लगे थे।

➤ उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी। इसी दबाव के कारण 1921 में इसे खत्म कर दिया गया लेकिन इसके बाद भी कई दशक तक भारतीय अनुबंधित मजदूरों के वंशज कैरीबियाई द्वीप समूह में बेचैन अल्पसंख्यकों का जीवन जीते रहे।

➤ वहाँ के लोग उन्हें ‘कुली’ मानते थे और उनके साथ कुलियों जैसा बर्ताव करते थे। नायपॉल के कुछ प्रारंभिक उपन्यासों में विद्रोह और परायेपन के इस अहसास को खूब देखा जा सकता है।

❖ भारत से सोने चाँदी का निर्यात:- 

➤ भारत से सोने चाँदी का निर्यात ने ब्रिटेन की आर्थिक दशा सुधारने में तो निश्चय की मदद दी लेकिन भारतीय किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ।

➤ 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। उसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा (सिविल नाफरमानी) आंदोलन शुरू किया।

➤ यह मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाई नहीं रही।

➤ कीमतें गिर जाने के बावजूद शहरों मे रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी। जैसे, शहर में रहने वाले जमींदार जिन्हें अपनी जमीन पर बँधा-बँधाया भाड़ा मिलता था, या मध्यवर्गीय वेतनभोगी कर्मचारी।

➤ राष्ट्रवादी खेमे के दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ा दिए गए थे जिससे औद्योगिक क्षेत्र में भी निवेश में तेजी आई।

❖ अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता:- 

➤ दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के अधीन था। अगले दो दशकों में एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र, स्वाधीन राष्ट्र बन चुके थे।

➤ ये सभी देश गरीबी व संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। उनकी अर्थव्यवस्थाएँ और समाज लंबे समय तक चले औपनिवेशिक शासन के कारण अस्त-व्यस्त हो चुके थे।

➤ आई.एम.एफ. और विश्व बैंक का गठन तो औद्योगिक देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही किया गया था। ये संस्थान भूतपूर्व उपनिवेशों में गरीबी की समस्या और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे। लेकिन जिस प्रकार यूरोप और जापान ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्गठन किया था उसके कारण ये देश आई.एम.एफ. और विश्व बैंक पर बहुत निर्भर भी नहीं थे।

➤ इसी कारण पचास के दशक के आखिरी सालों में आकर ब्रेटन वुड्स संस्थान विकासशील देशों पर भी पहले से ज्यादा ध्यान देने लगे।

➤ दुनिया के अल्पविकसित भाग उपनिवेशों के रूप में पश्चिमी साम्राज्यों के अधीन रहे थे। विडंबना यह थी कि नवस्वाधीन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही नियंत्रण बना हुआ था।

➤ जो देश ब्रिटेन और फ्रांस के उपनिवेश रह चुके थे या जहाँ कभी उनका राजनीतिक प्रभुत्व रह चुका वहाँ के महत्वपूर्ण संसाधनों, जैसे खनिज संपदा और जमीन पर अभी भी ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों का ही नियंत्रण था और वे इस नियंत्रण को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थीं।

➤ कई बार अमेरिका जैसे अन्य शक्तिशाली देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत कम कीमत पर दोहन करने लगती थीं।

➤ G-77 देशों का समुह – ज्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए विकासशील देशों ने  एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणली (एन.आई.ई.ओ) प्रणाली के लिए आवाज उठाई और समूह 77 (जी -77) के रूप में संगठित हो गए।

➤ एन.आई.ई.ओ. से उनका आशय एक ऐसी व्यवस्था से था जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिल सके, जिसमें उन्हें विकास के लिए अधिक सहायता मिले, कच्चे माल क सही दाम मिलें, और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले।

❖ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ का उद्भव:- 

➤ सत्तर के दशक के मध्य से बेरोजगारी बढ़ने लगी। नब्बे के दशक के प्रांरभिक वर्षों तक वहाँ काफी बेरोजगारी रही। सत्तर के दशक के आखिर सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगी जहाँ वेतन कम थे।

➤ चीन 1949 की क्रांति के बाद विश्व अर्थव्यवस्था से अलग-थलग ही था। परंतु चीन में नयी आर्थिक नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव तथा पूर्वी यूरोप में सोवियत शैली की व्यवस्था समाप्त हो जाने के पश्चात बहुत सारे देश दोबारा विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बन गए।

➤ चीन जैसे देशों में वेतन तुलनात्मक रूप से कम थे। फलस्वरूप विश्व बाजारों पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ जमकर निवेश करना शुरू कर दिया।

➤ हमारे ज्यादातर टेलीविजन, मोबाईल फोन और खिलौने चीन में बने होते है या वहाँ के जैसे ही लगते हैं।

➤ यह चीनी अर्थव्यवस्था की अल्प लागत अर्थव्यवस्था और खास तौर से वहाँ के कम वेतनों का नतीजा है।

➤ उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्विक व्यपार और पूँजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा।

➤ पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।


Class 10 History Chapter 3  Important Question Answer

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01 . ब्रेटन वुड्स समझौते का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक दुनिया में आर्थिक स्थिरता और पूर्ण रोजगार को बनाए रखना था। संयुक्त राष्ट्र के न्यू हैम्पशायर में ब्रेटन वुड्स में जुलाई 1944 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन ने इसके ढांचे पर सहमति व्यक्त की। ब्रेटन वुड्स सम्मेलन ने निम्नलिखित संस्थाओं की स्थापना की:

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष: इसका उद्देश्य अपने सदस्य देशों के बाहरी अधिशेषों और घाटे से निपटना था। पनर्निर्माण और विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैंक या विश्व बैंक की स्थापना “युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण के वित्तपोषण के लिए” की गई थी। उपरोक्त संस्थानों को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स जुड़वाँ के रूप में जाना जाता है। युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली को अक्सर ब्रेटन वुड्स प्रणाली के रूप में भी वर्णित किया जाता है। यह निश्चित विनिमय दरों पर आधारित था। राष्ट्रीय मुद्राओं को एक निश्चित विनिमय दर पर डॉलर से आंका गया था। 

02. डॉलर प्रति औंस सोने की निश्चित कीमत पर डॉलर ही सोने पर टिका हुआ था।

उत्तर ⇒ इन संस्थानों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को पश्चिमी औद्योगिक शक्तियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। आईएमएफ और विश्व बैंक के प्रमुख फैसलों पर अमेरिका के पास वीटो का प्रभावी अधिकार है।

 03. भोजन की उपलब्धता पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर ⇒ (i) विभिन्न बाजारों में सस्ते भोजन की उपलब्धता: परिवहन में सुधार; तेज़ रेलवे, हल्के वैगन और बड़े जहाजों ने भोजन को अधिक सस्ते में और तेज़ी से दूर के खेतों से अंतिम बाजारों तक पहुँचाने में मदद की।

(ii) मांस पर प्रभाव: 1870 के दशक तक, अमेरिका से मांस को जीवित पशुओं के रूप में यूरोप भेजा जाता था और फिर यूरोप में उनका वध कर दिया जाता था। लेकिन जीवित जानवरों ने जहाज़ में काफी जगह घेर ली। लेकिन प्रशीतित जहाजों के आविष्कार ने मांस को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में ले जाना संभव बना दिया। अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड में जानवरों का वध किया जाता था और फिर जमे हुए मांस के रूप में यूरोप भेजा जाता था। प्रशीतित जहाज के आविष्कार के निम्नलिखित लाभ थे:

इससे शिपिंग लागत कम हो गई और यूरोप में मांस की कीमतें कम हो गईं।
यूरोप में गरीब अब अधिक विविध आहार का उपभोग कर सकते थे।
पहले, रोटी और आलू की एकरसता के लिए कई, सभी नहीं, मांस, मक्खन और अंडे जोड़ सकते थे।
बेहतर रहने की स्थिति ने देश के भीतर सामाजिक शांति को बढ़ावा दिया और विदेशों में साम्राज्यवाद को समर्थन दिया।

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 04. महामंदी के कारणों की व्याख्या करें।

अथवा,

1929 की आर्थिक मन्दी के परिणामों की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ 1929 में विश्व आर्थिक मंदी की लपेट में आ गया। इस मंदी का आरंभ संयुक्त राज्य अमेरिका से हुआ। महामंदी के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

( क ) अति उत्पादनः  कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन की समस्या बनी हुई थी। कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों के कारण स्थिति और खराब हो गई थी। कीमतें गिरने से किसानों की आय घटने लगी। अतः वे आय बढ़ाने के लिए पहले से अधिक उत्पादन करने लगे। वे सोचते थे कि भले ही उन्हें अपना उत्पादन कम कीमत पर बेचना पड़े, अधिक माल बेचकर वे अपना आय स्तर बनाए रख सकेंगे। फलस्वरूप बाज़ार में कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गई तथा कीमतें और भी कम हो गईं। खरीददारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी पड़ी सड़ने लगी।

(ख) शेयरों के मूल्य में गिरावट:  शेयरों के भाव एकदम गिर गए। कुछ कंपनियों के शेयरों का मूल्य तो बिल्कुल समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप जिन लोगों का शेयरों में धन लगा था, उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ी।

(ग) बैंकों का बंद होना:  देश के हज़ारों बैंक बंद हो गए और कारखानेदारों को कारखानों में लगाने के लिए पूँजी न मिल सकी। परिणाम यह हुआ कि कारखाने एकाएक बंद होने लगे और लोगों में बेरोजगारी बढ़ने लगी।

(घ) बेरोज़गारी:  बेरोज़गारी के कारण लोगों की क्रय-शक्ति और भी कम हो गई जिसका पूरा प्रभाव तैयार माल की बिक्री पर पड़ा। धीरे-धीरे विश्व के अन्य पूँजीवादी देशों में भी यही दुश्चक्र चल पड़ा। इस प्रकार आर्थिक मंदी ने गंभीर रूप धारण कर लिया।

05. संक्षेप में बताएँ कि दो महायुद्धों के बीच जो आर्थिक परिस्थितियाँ पैदा हुईं उनसे अर्थशास्त्रियों तथा राजनेताओं ने क्या सबक सीखे ?

उत्तर ⇒ दो महायुद्धों के बीच संसार को भीषण आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा जिससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी फैल गई। अनेक कारखाने तथा बैंक बंद हो गए और शेयर बाज़ार धराशायी हो गया। इससे अर्थशास्त्रियों तथा राजनेताओं ने यह सबक सीखा कि अति उत्पादन बहुत ही खतरनाक है।

06. जब हम कहते हैं कि सोलहवीं सदी में दुनिया ‘सिकुड़ने लगी थी तो इस क्या मतलब है ?

उत्तर ⇒ इसका मतलब यह है कि सोलहवीं सदी में संसार के देश एक-दूसरे के निकट आने लगे थे। उनके बीच आपसी आदान-प्रदान बढ़ गया था। इस प्रकार वे एक-दूसरे पर निर्भर हो गए थे।

07. खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दें।

उत्तर ⇒ (क) मांस का निर्यातः खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव को देखने के लिए मांस व्यापार सबसे अच्छा उदाहरण है। तकनीक के अभाव में जीवित जानवरों का निर्यात किया जाता था। यह एक जटिल प्रक्रिया थी तथा इसमें अनेक समस्याएँ थीं, जैसे- जानवरों का वज़न कम हो जाना, मार्ग में उनका बीमार पड़ जाना अथवा मर जाना इत्यादि । परंतु तकनीक के विकास ने जहाजों को ठंडा (रेफ्रिजरेशन) रखना आसान बना दिया। फलस्वरूप जीवित जानवरों के स्थान पर अब उनका खाने योग्य मांस ही यूरोप में भेजा जाने लगा। इससे परिवहन खर्च में कमी आ गई और विदेशों में मांस सस्ता मिलने लगा।

(ख) विभिन्न खाद्य-पदार्थों का आदान-प्रदानः तकनीकी विकास से पूर्व विश्व के लगभग सभी राष्ट्र आत्मनिर्भर थे। परंतु तकनीकी विकास से परिवहन के संसाधनों का तेजी

से विकास हुआ। इसके कारण लोग विभिन्न देशों में आने-जाने लगे। वे अपने साथ विभिन्न प्रकार की फसलें ले जाते थे। उदाहरण के लिए आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर आदि यूरोप और एशिया में अमेरिका महाद्वीप से आए।


Class 10 History Chapter 3 Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. चीनी को किस स्थान से निर्यात किया जाता था ?

    1. पॉटरी
    2. चीनी
    3. भारत
    4. भूटान

Ans –  A 

2. सोने चांदी जैसी कीमती धातुएँ कहाँ से कहाँ तक पहुँचाती थी ?

    1. अमेरिका से औस्ट्रेलिया
    2. यूरोप से एशिया
    3. एशिया से यूरोप
    4. इनमेंं से कोई नहीं

Ans –  B

3.  नुडल्स किस देश का व्यंजन है,जो बाद में और देशों में फैला ?

    1. चीन
    2. भारत
    3. अमेरिका
    4. बांग्लादेश

Ans –   A

4. अमेरिका की खोज किसने की ?

 

    1. क्रिसटोफर कोलम्बस
    2. मार्को पोलो
    3. सिकंदर
    4. जॉन पाल

Ans –   A

5. किस सब्जी का इस्तेमाल करने से यूरोप के गरीब लोगों की जिन्दगी बेहतर हो गई ?

    1. भिन्डी
    2. आलू
    3. गोभी
    4. मटर

Ans –  B

6. 1840 में किस फसल के खराब होने से लाखों भुखमरी का शिकार हो गए ?

    1. बादाम
    2. काजू
    3. आलू
    4. कोई भी नहीं

Ans –   C

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7. आलू किस देश के लोंगों के लिए वरदान साबित हुआ ?

    1. आयरलैंड
    2. भूटान
    3. श्रीलंका
    4. अमेरिका

Ans –  A

8. यूरोप की सम्पदा को कीमती धातुओं जैसे सोना चांदी से किसने बढ़ाया ?

    1. भारत
    2. चीन
    3. मेक्सिको और पेरू
    4. अमेरिका

Ans –   C

9. सोने का शहर किस जगह को माना जाने लगा ?

    1. एल डोराडो
    2. ब्राजील
    3. हांगकांग
    4. दिल्ली

Ans –   A

10. स्पेनिश और पुर्तगाली सेनाओं ने किस देश को अपना उपनिवेश बनाना आरम्भ कर दिया ?

    1. न्यूजीलैंड
    2. ऑस्ट्रेलिया
    3. अमेरिका
    4. चीन

Ans –   C

11. स्पेनिश विजेताओं की विजय में कौन-सा हथियार मददगार रहा ?

    1. बंदूक
    2. हथगोले
    3. चेचक जैसी बीमारी
    4. रणनीति

Ans –   C

12. 18 वीं शताब्दी के बाद भी कौन-से देश बहुुत धनी थे ?

    1. भारत
    2. चीन
    3. (क) और (ख) दोनों
    4. कोई भी नही

Ans –   C

13. 19वीं सदी में दुनिया के तेजी से बदलने के क्या-क्या कारण रहे ?

    1. आर्थिक व सामाजिक
    2. राजनितिक व सांस्कृतिक
    3. तकनीकी
    4. उपरोक्त सभी

Ans –   D

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14. आर्थिक विनिमय के प्रवाह या गतियों के नाम बताओ ?

    1. व्यापार
    2. श्रम
    3. पूंजी
    4. उपरोक्त सभी

Ans –  D

15. ब्रिटेन का पेट भरने के लिए किन देशों ने जमीनों को साफ़ करके खेती करना आरम्भ कर दिया ?

    1. अमेरिका
    2. रूस
    3. आस्ट्रेलिया
    4. उपरोक्त सभी

Ans –  D

16. 18 वीं शताब्दी के मध्य तकनीकी आविष्कार कौन-सा था ?

    1. भाप का इंजन
    2. रेलवे
    3. टेलीग्राफ
    4. उपरोक्त सभी

Ans –  D

17. किन जगहों से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा ?

    1. अमेरिका
    2. न्यूजीलैंड
    3. ऑस्ट्रेलिया
    4. उपरोक्त सभी

Ans –  D

18. 1890 के दशक में अफ्रीका में कौन-सी बीमारी तेजी से फैली ?

    1. चेचक
    2. रिडरपेस्ट
    3. तपेदिक
    4. केंसर

Ans –   D

19. किस देश के लोग तनख्वाह पर काम करना पसंद नही करते थे ?

    1. अमेरिका
    2. रूस
    3. अफ्रीका
    4. यूरोप

Ans –   D

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20. रिंडरपेस्ट ने कितने प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया ?

    1. 50%
    2. 70%
    3. 80%
    4. 90%

Ans –   D

21. भारत के मजदूर दूसरे देश में कौन-से क्षेत्रों में अधिक जाते थे ?

    1. पूर्वी उतर प्रदेश
    2. बिहार
    3. तमिलनाडु
    4. उपरोक्त सभी

Ans –    D

22. इनमें से कौन अनुबंधित मजदूरों के वंशज हैं ?

    1. वी. एस. नायपाॅॅल
    2. रामनरेश सरवन
    3. शिवनरैैन चन्द्रपाल
    4. उपरोक्त सभी

Ans –    D

23. हैदराबादी सिन्धी व्यापारियों में बंदरगाहों पर बड़े-बड़े एम्पोरियम कब खोले ?

    1. 1850
    2. 1860
    3. 1870
    4. 1880

Ans –   B

24. तकनीकी प्रगति के कौन-से कारक हैं ?

    1. सामाजिक
    2. आर्थिक
    3. राजनितिक
    4. उपरोक्त सभी

Ans –

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Class 10 History Chapter 4 Notes in Hindi | औद्योगीकरण का युग

Class 10 History Chapter 4 Notes in Hindi : covered History Chapter 4 easy language with full details & concept  इस अध्याय में हमलोग जानेंगे कि – औद्योगीकरण का युग की शुरुआत कैसे हुई(How did the era of industrialization begin?), औद्योगिक क्रांति का अर्थ क्या है(what is the meaning of industrial revolution)?, इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के क्या कारण हैं(what are the causes of industrial revolution in England)?, कारखाने की शुरुआत कैसे हुईं(how the factory started)?, नये यांत्रिक अविष्कार की नींव कैसे पड़ी, औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार(pace of industrial change), सूती वस्त्र उद्योग, स्पिनिंग जैनी की खोज कैसे हुई(How the Spinning Jeannie was Invented)?, लोगों ने स्पिनिंग जेनी मशीन का विरोध क्यों किया(Why did people oppose the spinning jenny machine), इंगलैंड में श्रमिकों की आजीविका एवं उनके जीवन का वर्णन करें, उपनिवेशो में औद्योगीकरण की शुरुआत कैसे हुई(How did industrialization begin in the colonies?), मशीन उद्योग से पहले का युग कैसा था,  ईस्ट इंडिया कंपनी आने के बाद बुनकरों की स्थिति स्थिति कैसी थी, भारत में औद्योगीकरण की शुरुआत कैसे हुई(How did industrialization begin in India), भारत में औद्योगिकीकरण का प्रभाव, श्रमिक वर्ग एवं श्रमिक आंदोलन, फैक्ट्रियों का आना(coming of factories), लघु उद्योगों की बहुतायत? 

Class 10 History Chapter 4 Notes in Hindi full details

category  Class 10 History Notes in Hindi
subjects  History
Chapter Name Class 10 Era of Industrialization (औद्योगीकरण का युग) 
content Class 10 History Chapter 4 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 History Chapter 4 notes in Hindi

इतिहास अध्याय 4 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – इतिहास   अध्याय – 4 

औद्योगीकरण का युग

Era of Industrialization


परिचय (Introduction) -: 

औद्योगीकरण का युग :-

जिस युग में हस्तनिर्मित वस्तुएं बनाना कम हुई और फैक्ट्री , मशीन एवं तकनीक का विकास हुआ उसे औद्योगीकरण का युग कहते हैं । इसमें खेतिहर समाज औद्योगिक समाज में बदल गई । 1760 से 1840 तक के युग को औद्योगीकरण युग कहा जाता है जो मनुष्य के लिए खेल परिवर्तन नियम जैसा हुआ ।

पूर्व औद्योगीकरण :-

यूरोप में औद्योगीकरण के पहले के काल को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहते हैं । दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यूरोप में सबसे पहले कारखाने लगने के पहले के काल को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहते हैं । इस अवधि में गाँवों में सामान बनते थे जिसे शहर के व्यापारी खरीदते थे ।

औद्योगिक क्रांति का अर्थ:- 

औद्योगिक क्रांति का शाब्दिक अर्थ है – उद्योग उत्पादन में होने वाला परिवर्तन | यानी औद्योगिक क्रांति का तात्पर्य उत्पादन प्रणाली में हुए उन परिवर्तनों से है जिनके फलस्वरूप जनसाधारण की अपनी कृषि व्यवस्था एवं घरेलू उद्योग-धंधों को छोड़कर नये प्रकार के बड़े उद्योगों में काम करने तथा यातायात के नवीन साधनों का उपयोग करने को मिला | अत: औद्योगिक क्रांति के कारण तीन वस्तुओं का जन्म हुआ – पहला कारखाना, दूसरा बड़े-बड़े औद्योगिक नगर तथा तीसरा पूँजीपति वर्ग |

औद्योगिक क्रांति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांस के समाजवादी चिंतक लूई ब्लाॅ ने 1837 ई० में किया | यह क्रांति सबसे पहले इंगलैंड में हुई |

आदि-औद्योगीकरण का युग – इंगलैंड और यूरोप में कारखाना की स्थापना से पहले भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगे थे | यह उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं होता था | किसी चीज की प्रारंभिक अवस्था को आदि कहते हैं | अत: औद्योगिकीकरण के प्रारंभिक चरण को इतिहासकारों ने आदि-औद्योगिकीकरण का नाम दिया है | इसमें चीजों का उत्पादन कारखानों के बजाय घरों में होता था |

गाँव और शहरों का संबंध – इस व्यवस्था में गाँवों में तथा शहरों में एक संबंध स्थापित हुआ | व्यापारी शहरों में रहकर अपना काम गाँव में चलाते थे | गाँव में अपने सामान का उत्पादन करवाकर उन्हें शहर ले जाकर बेचते थे | चीजों का उत्पादन कारखानों में न होकर घरों में होता था |

इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के कारण –

औद्योगिक क्रांति यूरोप के दूसरे देशों को छोड़कर इंगलैंड में ही सर्वप्रथम हुई | इसके कुछ विशिष्ट कारण थे |

इंगलैंड की भौगोलिक स्थिति – द्वीप होने के कारण इंगलैंड बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित था | कच्चे माल को आयात तथा उत्पादित वस्तुओं वस्तुओं के निर्यात करने की सुविधा भी इंगलैंड में थी |

प्राकृतिक साधनों (खनिज) की उपलब्धता – इंगलैंड में खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे | इससे इंगलैंड के औद्योगिक विकास में काफी सुविधा हुई |

कृषि क्रांति – औद्योगिक क्रांति के पूर्व इंगलैंड में कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए थे | कृषि तथा पशुपालन की समुन्नत व्यवस्थाओं से भूमिपतियों की आमदनी काफी बढ़ गई |

कुशल कारीगर – कुशल कारीगरों के संपर्क में आने से इंगलैंड के मजदूरों के ज्ञान में वृद्धि हुई और उसके साथ ही खेतीबारी के तरीकों और उद्योग-धंधों में विकास हुआ |

जनसंख्या में वृद्धि – चिकित्सा एवं गरीबों की सहायता की व्यवस्था होने के कारण लोग रोगमुक्त हो गये तथा भुखमरी के शिकार होने से बच गये | इससे मृत्यु दर में कमी आई तथा इंगलैंड की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई |

पर्याप्त पूँजी की उपलब्धता – इस समय इंगलैंड में काफी मात्रा में पूँजी उपलब्ध थी | इस समय ब्रिटेन में विदेशों से काफी धन लाया गया | दास व्यापार तथा भारत से लूटकर लाये गये धन का निवेश इंगलैंड में हुआ |

वैज्ञानिक प्रगति – इस युग में जितने भी वैज्ञानिक आविष्कार हुए उनमें से अधिकांश इंगलैंड में ही हुए |

यातायात की सुविधा – 18वीं शताब्दी में परिवहन क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए | यातायात की सुविधा के लिए सभी प्रमुख शहरों को नहरों द्वारा जोड़ा गया | पुरानी नहरों को चौड़ा किया गया ताकि कई जहाज एक साथ आ-जा सके |

कारखानों की शुरुआत :-

सबसे पहले इंगलैंड में कारखाने 1730 के दशक में बनना शुरु हुए । अठारहवीं सदी के आखिर तक पूरे इंगलैड में जगह जगह कारखाने दिखने लगे ।

इस नए युग का पहला प्रतीक कपास था । उन्नीसवीं सदी के आखिर में कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई ।

1760 में ब्रिटेन में 2.5 मिलियन पाउंड का कपास आयातित होता था ।

1787 तक यह मात्रा बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गई थी ।

नये यांत्रिक अविष्कार:- 

जाॅन के-फ्लाइंग शटल-1733 ई०

जेम्स हारग्रिब्ज-स्पिनिंग जेनी-1765ई०

रिचर्ड आर्काराइट-वाटरफ्रेम-1769 ई० (स्पिनिंग फ्रेम)

क्राम्पटन-स्पिनिंग म्यूल-1779 ई०

एडमंड कार्टराइट-पावरलूम-1785 ई०

इली व्हिटनी-कपास ओटने की मशीन-1793ई०

टॉमस न्यूकॉम-पहला वाष्प इंजन

अब्राह्म डर्बी-लोहा पिघलाने की विधि

हम्फ्री डेवी-सेफ्टी लैम्प-1815 ई०

जार्ज स्तिफेंशन-वाष्पचलित रेल इंजन -1814 ई०

राबर्ट फुल्टन-वाष्पचलित पानी का जहाज

औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार:-

औद्योगीरण का मतलब सिर्फ फैक्ट्री उद्योग का विकास नहीं था । कपास तथा सूती वस्त्र उद्योग एवं लोहा व स्टील उद्योग में बदलाव काफी तेजी से हुए और ये ब्रिटेन के सबसे फलते फूलते उद्योग थे ।

औद्योगीकरण के पहले दौर में (1840 के दशक तक) सूती कपड़ा उद्योग अग्रणी क्षेत्रक था। रेलवे के प्रसार के बाद लोहा इस्पात उद्योग में तेजी से वृद्धि हुई । रेल का प्रसार इंगलैंड में 1840 के दशक में हुआ और उपनिवेशों में यह 1860 के दशक में हुआ ।

1873 आते आते ब्रिटेन से लोहा और इस्पात के निर्यात की कीमत 77 मिलियन पाउंड हो गई । यह सूती कपड़े के निर्यात का दोगुना था ।

लेकिन औद्योगीकरण का रोजगार पर खास असर नहीं पड़ा था । उन्नीसवीं सदी के अंत तक पूरे कामगारों का 20% से भी कम तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्रक में नियोजित था । इससे यह पता चलता है कि नये उद्योग पारंपरिक उद्योगों को विस्थापित नहीं कर पाये थे ।

सूती वस्त्र उद्योग:- 

सूती वस्त्र उद्योग इंगलैंड का सबसे अधिक उत्पादन वाला उद्योग बना | 19वीं सदी में ब्रिटेन कपड़ा का सबसे बड़ा उत्पादक बने गया था | 19वीं सदी में कपड़ा उद्योग में विकास होने के बावजूद सारा उत्पादन कारखाना में न होकर कुछ उत्पादन घरेलू तरीकों से भी होता था |

हाथ का श्रम– औद्योगिकीकरण में ब्रिटेन में सस्ते मानव श्रम की भूमिका भी अग्रणी रही | श्रमिकों की संख्या बढ़ने से उनको कम वेतन पर नौकरी करनी पड़ी | मिल मालिकों को मशीन पर लगाने वाले खर्च से कम खर्च पर श्रमिक उपलब्ध हो जाते थे | उन्हें मशीनें लगाने पर अधिक दिलचस्पी नहीं थी | मशीन लगवाने में अधिक पूँजी की जरुरत होती थी तथा उनके खराब होने पर मरम्मत करवाने में भी अधिक खर्च आता था | अत: उद्योगपति मशीन की बजाय हाथ के श्रम को अधिक महत्त्व देते थे इससे उन्हें ज्यादा फायदा होता था | श्रमिकों की संख्या आवश्यकतानुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता था |

स्पिनिंग जैनी:-

एक सूत काटने की मशीन जो जेम्स हर गीवजलीवर्स द्वारा 1764 में बनाई गई थी ।

स्पिनिंग जेनी मशीन का विरोध :-

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अच्छे दौर में भी शहरों की आबादी का लगभग 10% अत्यधिक गरीब हुआ करता था । आर्थिक मंदी के दौर में बेरोजगारी बढ़कर 35 से 75% के बीच हो जाती थी ।

बेरोजगारी की आशंका की वजह से मजदूर नई प्रौद्योगिकी से चिढ़ने लगे । जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया तो मशीनों पर हमला करने लगे ।

1840 के दशक के बाद रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई क्योंकि सड़कों को चौड़ा किया गया , नए रेलवे स्टेशन बनें , रेलवे लाइनों का विस्तार किया गया ।

इंगलैंड में श्रमिकों की आजीविका एवं उनका जीवन: 

शहरों में बहुतायत नौकरी की खरब सुनकर गाँव के मजदूर जो बेकारी की समस्या से जूझ रहे थे शहर की ओर रुख करने लगे | नौकरी ढूँढ़ने के क्रम में उन्हें पुलों के नीचे सडकों के किनारे अथवा सरकारी या निजी रैन बसेरों में समय गुजरने पड़ते थे |

बेरोजगारी की आशंका से मजदूर मशीन तथा नई प्रौद्योगिकी का विरोध करने लगे | जेम्स हारग्रीव्ज ने ने 1764 में स्पिनिंग जेनी का अविष्कार किया था | इस मशीन के आने से मजदूरों की माँग घटने लगी |

अत: इसका प्रभाव महिलाओं पर अधिक पड़ा और ब्रिटेन की महिलाओं ने स्पिनिंग जेनी मशीन पर हमला कर उसे तोड़ना शुरू कर दिया क्योंकि इस मशीन ने उनका रोजगार छीन लिया था |

श्रमिक आंदोलन – इंगलैंड में श्रमिक संघ की स्थापना हुई | मजदूर वोट देने के अधिकार भी माँग रहे थे | इसके लिए श्रमिक संघ के कहने पर सन् 1838 में उन्होंने चार्टिस्ट आंदोलन किये |

उपनिवेशो में औद्योगीकरण:- 

आइए अब भारत पर नजर डाले और देखे की उपनिवेश में औद्योगीकरण कैसे होता है ।

मशीन उद्योग से पहले का युग :-

अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का दबदबा था। उच्च किस्म का कपड़ा भारत से आर्मीनियन और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान , पूर्वी फारस और मध्य एशिया लेकर जाते थे।

सूरत , हुगली और मसूली पट्नम प्रमुख बंदरगाह थे। विभिन्न प्रकार के भारतीय व्यापारी तथा बैंकर इस व्यापार नेटवर्क में शामिल थे। दो प्रकार के व्यापारी थे आपूर्ति सौदागर तथा निर्यात सौदागर। बंदरगाहों पर बड़े जहाज मालिक तथा निर्यात व्यापारी दलाल के साथ कीमत पर मोल भाव करते थे और आपूर्ति सौदागर से माल खरीद लेते थे। 

मशीन उद्योग के बाद का युग (1780 के बाद ):- 

1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला नेटवर्क टूटने लगा। यूरोपीय कंपनियों की ताकत बढ़ने लगी। सूरत तथा हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमजोर पड़ गए । बंबई ( मुंबई ) तथा कलकता कलकत्ता एक नए बंदरगाह के रूप में उभरे ।

व्यापार यूरोपीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित होता था तथा यूरोपीय जहाजों के जरिए होता था। शुरूआत में भारत के कपड़ा व्यापार में कोई कमी नहीं। 18 वीं सदी यूरोप में भी भारतीय कपड़े की भारी मांग हुई ।

ईस्ट इंडिया कंपनी आने के बाद बुनकरों की स्थिति:-

ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद बुनकरों की स्थिति (1760 के बाद ):-

भारतीय व्यापार पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का एकाधिकार हो गया । कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों तथा दलालों को खत्म करके बुनकरो पर प्रत्यक्ष नियंत्रण । बुनकरों को अन्य खरीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी ।

बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्ता नाम के वेतनभोगी कर्मचारी की नियुक्ति की गई। बुनकरो व गुमाश्ता के बीच अक्सर टकराव होते हैं| बुनकरों को कंपनी से मिलने वाली कीमत बहुत ही कम होती।

भारत में औद्योगीकरण:- 

औद्योगिक उत्पादन से भारत के कुटीर उद्योग बंद हो गये लेकिन वस्त्र उद्योगों के लिए बड़ी-बड़ी कारखाने स्थापित हुई | भारत में 1895 तक कपड़ा मीलों की संख्या उनचालीस हो गई , ब्रिटिश सरकार ने वहाँ से आयात शुल्क समाप्त कर दिया जिससे भारत में वहाँ के सामान कम मूल्य में बिकने लगे |

भारतीय उद्योगपति – भारतीय व्यापारियों पर सरकार का नियंत्रण कठोर होते थे, तथा उन्हें अपना तैयार माल यूरोप में बेचने में कठिनाई होती थी | भारत से तैयार माल निर्यात नहीं होते थे, सिर्फ कच्चे माल जैसे- कपास, नील, अफीम गेहुँ ही निर्यात किये जाने लगे | भारतीय उद्योगपति जहाजरानी का भी व्यापार नहीं कर सकते थे |

सन् 1907 ई० में जमशेद जी टाटा ने बिहार के साकची नामक स्थान पर टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (Tisco) की स्थापना की | जमशेदजी टाटा ने 1901 में टाटा हाईड्रो-इलेक्ट्रीक पावर स्टेशन की स्थापना की |

मजदूरों की उपलब्धता – कारखानों के विस्तार होने से मजदूरों की माँग बढ़ी | जहाँ भी कारखाने खुले आप-पास के इलाकों से ही मजदूर आते थे | धीरे-धीरे दूर-दूर से भी लोग काम की तलाश में आने लगे | मीलों की संख्या बढ़ने से मजदूरों की माँग भी बढ़ने लगी परंतु मजदूरों की संख्या मिल में रोजगार से अधिक रहती थी इसलिए कई मजदूरों की संख्या मिल में रोजगार से अधिक रहती थी इसलिए कई मजदूर बेरोजगार ही रह जाते थे | मिल मालिक नये मजदूरों की भर्ती करने के लिए एक जॉबर रखते थे | मालिक का विश्वसनीय कर्मचारी होता था | जॉबर अपने गाँव से लोगों को लाता था |

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिकीकरण में तेजी – प्रथम विश्वयुद्ध तक भारत के औद्योगिक विकास की प्रगति धीमी रही परंतु युद्ध की दौरान इसमें तेजी आई क्योंकि ब्रिटिश कारखाने युद्ध से जुडी सामग्री बनाने में व्यस्त थे | इसलिए भारत में मैनचेस्टर से आयात कम हो गया जिससे भारत को देशी बाजार मिल गया | अधिक दिनों तक युद्ध चलने से भारत के कारखानों में भी युद्ध के लिए जूट की बोरियाँ, फौजियों की वर्दी, कपड़े, टेंट, चमड़े के जूते आदि बनने लगे | इन सब के लिए नये कारखाने भी लगाये गये |

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिकीकरण – प्रथम विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद मैनचेस्टर के निर्मित समान भारत में पहले जैसा स्थान नहीं पा सका | मैनचेस्टर के बने सामान की माँग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि और भी जगहों में घट गई |

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिकीकरण में लगातार इजाफा हुआ | कई नये कारखाने लगाये गये | यद्यपि भारत में कोयला उद्योग का प्रारंभ सन् 1814 में ही हो चूका था जब रानीगंज, पश्चिम बंगाल में कोयले की खुदाई का काम आरंभ हुआ था |

सन् 1929-33 के विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने भारतीय उद्योग-धंधों को प्रभावित किया | भारत कच्चा माल में आत्मनिर्भर था जिसका मूल्य घट गया | निर्यात किये जाने वाले सामान का भी मूल्य घट गया |

भारत में औद्योगिकीकरण का प्रभाव:- 

औद्योगिकीकरण के कारण स्लम पद्धति का जन्म हुआ | मजदूर शहर में छोटे-छोटे घरों में रहने को बाध्य थे जहाँ किसी प्रकार की सुविधा नहीं थी | कारखानों के इर्द-गिर्द मजदूरों की बस्तियाँ बस गई | यहाँ ये छोटे-छोटे घर या झोपड़पट्टी बनाकर रहने लगे | ये बस्तियाँ गंदी तथा अस्वास्थ्यकर होती थीं | मजदूर इसमें नारकीय जीवन बिताते थे |

श्रमिक वर्ग एवं श्रमिक आंदोलन–

1881 में उनकी माँगों के आधार पर पहला “फैक्ट्री एक्ट” पारित हुआ | जिसमें 7 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाना में काम करने पर रोक लगाया गया| 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे काम कर सकते थे पर उनके काम का घटा तय की गयी |

31 अक्टूबर, 1920 ई० को अखिल भारतीय ट्रेड युनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई | लाला लाजपत राय को उसका प्रधान बनाया गया | 1920 में ही अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ (ILO) राष्ट्रसंघ के तत्त्वाधान में गठित हुआ |

मैनचेस्टर के आगमन से भारतीय बुनकरों के सामने आई समस्याएं :-

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही भारत से कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी । 1811 – 12 में भारत से होने वाले निर्यात में सूती कपड़े की हिस्सेदारी 33% थी जो 1850 – 51 आते आते मात्र 3% रह गई ।

अठारहवीं सदी के अंत तक भारत में सूती कपड़ों का आयात न के बराबर था । लेकिन 1850 आते-आते कुल आयात में 31% हिस्सा सूती कपड़े का था । 1870 के दशक तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 50% से ऊपर चली गई ।

19 वीं सदी के आते आते बुनकरों के सामने नई समस्याओं का जन्म हुआ ।

भारतीय बुनकरों की समस्याएँ :-

नियति बाजार का ढह जाना ,
स्थानीय बाजार का संकुचित हो जाना ,
अच्छी कपास का ना मिल पाना ,
ऊँची कीमत पर कपास खरीदने के लिए मजबूर होना ।
19 वीं सदी के अंत तक भारत में फैक्ट्रियों द्वारा उत्पादन शुरू तथा भारतीय बाजार में मशीनी उत्पाद की बाढ़ आई ।

फैक्ट्रियों का आना: 

भारत में कारखानों की शुरुआत :-

बम्बई में पहला सूती कपड़ा मिल 1854 में बना और उसमें उत्पादन दो वर्षों के बाद शुरु हो गया । 1862 तक चार मिल चालू हो गये थे ।

उसी दौरान बंगाल में जूट मिल भी खुल गये ।
कानपुर में 1860 के दशक में एल्गिन मिल की शुरुआत हुई ।
अहमदाबाद में भी इसी अवधि में पहला सूती मिल चालू हुआ ।
मद्रास के पहले सूती मिल में 1874 में उत्पादन शुरु हो चुका था ।

19 वीं सदी में भारतीय मजदूरों की दशा :-

1901 में भारतीय फैक्ट्रियों में 5,84,000 मजदूर काम करते थे ।
1946 क यह संख्या बढ़कर 24,36,000 हो चुकी थी ।
ज्यादातर मजदूर अस्थायी तौर पर रखे जाते थे ।
फसलों की कटाई के समय गाँव लोट जाते थे ।
नौकरी मिलना कठिन था ।
जॉबर मजदूरों की जिंदगी को पूरी तरह से नियंत्रित करते थे ।

औद्योगिक विकास का अनूठापन :-

भारत में औद्योगिक उत्पादन पर वर्चस्व रखने वाले यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की कुछ खास तरह के उत्पादन में ही दिलचस्पी थी खासतौर पर उन चीजों में जो निर्यात की जा सकें , भारत में बेचने के लिए जैसे- चाय , कॉफी , नील , जूट , खनन उत्पाद ।

भारतीय व्यवसायियों ने वे उद्योग लगाए ( 19 वीं सदी के आखिर में ) जो मेनचेस्टर उत्पाद से प्रतिस्पर्धा नहीं करते थे । उदाहरण के लिए धागा – जो कि आयात नहीं किया जाता था तो कपड़े की बजाय धागे का उत्पादन किया गया ।

20 वीं सदी के पहले दशक में भारत में औद्योगिकरण का ढर्रा बदल गया । स्वदेशी आंदोलन लोगों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया । इस वजह से भारत में कपड़ा उत्पादन शुरू हुआ । आगे चलकर चीन को धागे का निर्यात घट गया इस वजह से भी धागा उत्पादक कपड़ा बनाने लगे । 1900 – 1912 के बीच सूती कपड़े का उत्पादन दुगुना हो गया।

लघु उद्योगों की बहुतायत :-

उद्योग में वृद्धि के बावजूद अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का शेअर बहुत कम था । लगभग 67% बड़े उद्योग बंगाल और बम्बई में थे ।

देश के बाकी हिस्सों में लघु उद्योग का बोलबाला था । कामगारों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही रजिस्टर्ड कम्पनियों में काम करता था । 1911 में यह शेअर 5% था और 1931 में 10%।

1941 आते आते भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लग चुका था । त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचिन और बंगाल जैसे मुख्य क्षेत्रों में तो 70 से 80% हथकरघों में फ्लाई शटल लगे हुए थे

वस्तुओं के लिए बाज़ार :-

ग्राहकों को रिझाने के लिए उत्पादक कई तरीके अपनाते थे । ग्राहक को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन एक जाना माना तरीका है ।

मैनचेस्टर के उत्पादक अपने लेबल पर उत्पादन का स्थान जरूर दिखाते थे । ‘मेड इन मैनचेस्टर’ का लबेल क्वालिटी का प्रतीक माना जाता था । इन लेबल पर सुंदर चित्र भी होते थे । इन चित्रों में अक्सर भारतीय देवी देवताओं की तस्वीर होती थी । स्थानीय लोगों से तारतम्य बनाने का यह एक अच्छा तरीका था ।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक उत्पादकों ने अपने उत्पादों को मशहूर बनाने के लिए कैलेंडर बाँटने भी शुरु कर दिये थे । किसी अखबार या पत्रिका की तुलना में एक कैलेंडर की शेल्फ लाइफ लंबी होती है । यह पूरे साल तक ब्रांड रिमाइंडर का काम करता था ।


Class 10 History Chapter 4  Important Question Answer

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01. ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी वस्त्रों की नियमित आपूर्ति कैसे प्राप्त की?

उत्तर ⇒ (i) एकाधिकार अधिकार: एक बार ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजनीतिक शक्ति स्थापित कर ली, उसने व्यापार पर एकाधिकार अधिकार का दावा किया। लागत, और कपास और रेशम के सामानों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना। यह इसने चरणों की एक श्रृंखला के माध्यम से किया।

(iii) गुमाश्तों की नियुक्ति: कंपनी ने मौजूदा व्यापारियों और दलालों को खत्म करने की कोशिश की, जो व्यापार से जुड़े थे, और बुनकरों पर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया। इसने बुनकरों की निगरानी करने, आपूर्ति एकत्र करने और कपड़े की गुणवत्ता की जांच करने के लिए गोमोस्ता नामक एक वेतनभोगी नियुक्त किया।

(iv) पेशगी की व्यवस्था : बुनकरों पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए कम्पनी ने पेशगी की व्यवस्था शुरू की। एक बार आदेश दिए जाने के बाद, बुनकरों को उनके उत्पादन के लिए कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण दिया गया। जिन लोगों ने ऋण लिया था, उन्हें अपने द्वारा उत्पादित डोथ को गुमास्ता को सौंपना पड़ता था। वे इसे किसी अन्य व्यापारी के पास नहीं ले जा सकते थे।

(v) शक्ति का प्रयोग : जिन स्थानों पर जुलाहे ने सहयोग करने से मना कर दिया वहाँ कम्पनी ने अपनी पुलिस का प्रयोग किया। आपूर्ति में देरी के लिए कई जगहों पर बुनकरों को अक्सर पीटा जाता था और कोड़े मारे जाते थे।

02. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? [CBSE 2011]

उत्तर ⇒ (i) मैनचेस्टर का पतन: ब्रिटिश मिलें सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध उत्पादन में व्यस्त थीं। भारत में मैनचेस्टर के आयात में गिरावट आई।

(ii) मांग में वृद्धि : आयात में अचानक कमी आने से। भारतीय मिलों के पास आपूर्ति करने के लिए एक विशाल घरेलू बाजार था।

(iii) सेना की माँग : जैसे-जैसे युद्ध लम्बा होता गया। युद्ध की जरूरत की आपूर्ति के लिए भारतीय कारखानों को बुलाया गया; यानी। जूट के बैग, सेना की वर्दी, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े और खच्चर की काठी, और अन्य वस्तुओं के लिए काम करते हैं।

(iv) नए कारखाने : नए कारखाने स्थापित किए गए। और पुराने वाले कई पारियों में चलते थे। कई नए श्रमिकों को नियुक्त किया गया था, और सभी को लंबे समय तक काम करने के लिए मजबूर किया गया था। युद्ध के वर्षों में, औद्योगिक उत्पादन में उछाल आया।

(v) ब्रिटिश उद्योग का पतन और घरेलू उद्योग के लिए वरदान: युद्ध के बाद मैनचेस्टर भारतीय बाजार में अपनी पुरानी स्थिति को फिर से प्राप्त नहीं कर सका। अमेरिका के साथ आधुनिकीकरण और प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ। जर्मनी और जापान, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था युद्ध के बाद चरमरा गई। कपास का उत्पादन गिर गया और ब्रिटेन से सूती कपड़े का निर्यात नाटकीय रूप से गिर गया। उपनिवेशों के भीतर, स्थानीय उद्योगपतियों ने धीरे-धीरे अपनी स्थिति को मजबूत किया, विदेशी निर्माणों को प्रतिस्थापित किया और घरेलू बाजार पर कब्जा कर लिया।

03. प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा ?

अथवा,

स्पष्ट करें कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि क्यों हुई?

उत्तर ⇒ पहले विश्व युद्ध के दौरान एक नई स्थिति पैदा हो गई थी।

(क) ब्रिटिश कारखाने सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए युद्ध सामग्री का उत्पादन करने लगे थे। इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया और भारतीय उद्योगों को रातों-रात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया।

(ख) युद्ध लंबा खिंच जाने के कारण भारतीय कारखानों में भी सेना के लिए जूट की बोरियाँ, वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े तथा खच्चर की जीन आदि सामान बनने लगे। इसके लिए नए कारखाने भी लगाए गए।

(ग) पुराने कारखाने कई-कई शिफ्टों में चलने लगे। अनेक मज़दूरों को काम पर रखा गया। प्रत्येक मज़दूर को अब पहले से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता था। फलस्वरूप युद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ा।

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04. विश्व बाजार की क्या उपयोगिता है ? इससे क्या हानियाँ हुई है ?

उत्तर ⇒ आर्थिक गतिविधियों के कार्यान्वयन में विश्व बाजार की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता है। विश्व बाजार व्यापारियों, पूँजीपतियों, किसानों, श्रमिकों, मध्यम वर्ग तथा सामान्य उपभोक्ता वर्ग के हितों की सरक्षा करता है। विश्व बाजार का विकास होने से किसान अपने उत्पाद दूर-दूर के स्थानों और देशों में व्यापारियों के माध्यम से बेचकर अधिक धन प्राप्त करते हैं। कुशल श्रमिकों को विश्वस्तर पर पहचान और आर्थिक लाभ इसी बाजार से मिलता है। वैश्विक बाजार में नएं रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

विश्व बाजार से हानियाँ – विश्व बाजार से जहाँ अनेक लाभ हुए, वहीं इससे अनेक नुकसानदेह परिणाम भी हुए। विश्व बाजार ने यूरोप में संपन्नता ला दी, लेकिन इसके साथ-साथ एशिया और अफ्रीका में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का नया युग आरंभ हुआ। औपनिवेशिक शक्तियों ने उपनिवेशों का आर्थिक शोषण बढ़ा दिया। भारत भी उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का शिकार बना। सरकार ने ऐसी नीति बनायी जिससे यहाँ के कुटीर उद्योग नष्ट हो गए।

वैश्विक बाजार का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि औपनिवेशिक देशों में रोजगार छिनने और खाद्यान्न के उत्पादन में कमी आने से गरीबी, अकाल और भूखमरी बढ़ गयी। विश्व बाजार के विकास से यूरोपीय राष्ट्रों में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी। इससे उग्र राष्ट्रवादी भावना का विकास हुआ।

05. आधुनिक ग में विश्व अर्थव्यवस्था तथा विश्व बाजार के प्रभावों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ आधुनिक युग में अर्थव्यवस्था के अंतर्गत विश्व अर्थतंत्र और विश्व बाजार ने आर्थिक के साथ-साथ राजनैतिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया है। 1919 के बाद विश्वव्यापी अर्थतंत्र में यूरोप के स्थान पर संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस का प्रभाव बढ़ा जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व व्यापार और राजनैतिक व्यवस्था में निर्णायक हो गया। 1991 के बाद विश्व बाजार के अंतर्गत एक नवीन आर्थिक प्रवृत्ति भूमंडलीकरण का उत्कर्ष हुआ जो निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण से प्रत्यक्षतः जुड़ा था।

भूमंडलीकरण ने संपूर्ण विश्व के अर्थतंत्र का केंद्र बिंदु संयुक्त राज्य अमेरिका को बना दिया। उसकी मुद्रा डॉलर पूरे विश्व की मानक मुद्रा बन गई। उसकी कंपनियों को पूरी दुनिया में कार्य करने की अनमति मिल गई अर्थात् भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण ने अमेरिका केंद्रित अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। आज विश्व एकध्रुवीय स्वरूप में बदलकर प्रभावशाली देश संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक नीतियों के हिसाब से चल रहा है। आर्थिक क्षेत्र में भूमंडलीकरण ने अमेरिका के नवीन आर्थिक साम्राज्यवाद को जन्म दिया। इसका असर आज संपूर्ण विश्व में महसूस किया जा रहा है।

 06. उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की अपेक्षा हाथ से किए जाने वाले श्रम को क्यों तरजीह देते थे? [CBSE 2010, 2011]

उत्तर ⇒ (i) महंगी नई तकनीकः नई तकनीकें और मशीनें महंगी थीं, इसलिए निर्माता और उद्योगपति उनका उपयोग करने में सतर्क थे।

(ii) महंगा मरम्मत: मशीनें अक्सर खराब हो जाती हैं और मरम्मत महंगी होती है।

(iii) कम प्रभावी: वे उतने प्रभावी नहीं थे जितना कि उनके आविष्कारक और निर्माता दावा करते थे।

(iv) सस्ते श्रमिकों की उपलब्धताः गरीब किसान और प्रवासी रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों की ओर चले गए। इसलिए श्रमिकों की आपूर्ति मांग से अधिक थी। इसलिए, श्रमिक कम मजदूरी पर उपलब्ध थे।

(v) एकसमान मशीन-निर्मित वस्तुएँ: केवल हाथ के श्रम से ही अनेक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। मशीनें बड़े पैमाने पर बाजार के लिए वर्दी, मानकीकृत सामान बनाने के लिए उन्मुख थीं। लेकिन बाजार में अक्सर जटिल डिजाइन और विशिष्ट आकार वाले सामानों की मांग रहती थी।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन। हथौड़ों की 500 किस्मों और 15 प्रकार की कुल्हाड़ियों का उत्पादन किया गया। इसके लिए मानव कौशल की आवश्यकता थी, यांत्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं।

07. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? [CBSE 2011]

उत्तर ⇒ (i) मैनचेस्टर का पतन: ब्रिटिश मिलें सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध उत्पादन में व्यस्त थीं। भारत में मैनचेस्टर के आयात में गिरावट आई।

(ii) मांग में वृद्धि : आयात में अचानक कमी आने से। भारतीय मिलों के पास आपूर्ति करने के लिए एक विशाल घरेलू बाजार था।

(iii) सेना की माँग : जैसे-जैसे युद्ध लम्बा होता गया। युद्ध की जरूरत की आपूर्ति के लिए भारतीय कारखानों को बुलाया गया; यानी। जूट के बैग, सेना की वर्दी, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े और खच्चर की काठी, और अन्य वस्तुओं के लिए काम करते हैं।

(iv) नए कारखाने : नए कारखाने स्थापित किए गए। और पुराने वाले कई पारियों में चलते थे। कई नए श्रमिकों को नियुक्त किया गया था, और सभी को लंबे समय तक काम करने के लिए मजबूर किया गया था। युद्ध के वर्षों में, औद्योगिक उत्पादन में उछाल आया।

(v) ब्रिटिश उद्योग का पतन और घरेलू उद्योग के लिए वरदान: युद्ध के बाद मैनचेस्टर भारतीय बाजार में अपनी पुरानी स्थिति को फिर से प्राप्त नहीं कर सका। अमेरिका के साथ आधुनिकीकरण और प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ। जर्मनी और जापान, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था युद्ध के बाद चरमरा गई। कपास का उत्पादन गिर गया और ब्रिटेन से सूती कपड़े का निर्यात नाटकीय रूप से गिर गया। उपनिवेशों के भीतर, स्थानीय उद्योगपतियों ने धीरे-धीरे अपनी स्थिति को मजबूत किया, विदेशी निर्माणों को प्रतिस्थापित किया और घरेलू बाजार पर कब्जा कर लिया।


Class 10 History Chapter 4 Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. आधुनिक विश्व द्वारा तकनीकी परिवर्तन क्या है ?

    1. नया अधिकार
    2. कारखाने
    3. मशीने
    4. उपरोक्त सभी

Ans-  D

2. महामंदी के कौन-कौन से कारण है ?

    1. कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन
    2. गिरती कीमतें
    3. कम आय
    4. उपरोक्त सभी

Ans-  D

3. देश में तैयार माल को विकसित देश के बाजारों में पहुँचाने में किस प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है ?

    1. आर्थिक विकास
    2. कच्चा माल
    3. क और ख दोनों
    4. अनुचित दाम

Ans-  C

4. औद्योगिकीकरण से लोगों की जिन्दगी पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

    1. फैक्ट्रियों की स्थापना
    2. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार
    3. राष्ट्रीय उपकरण
    4. क और ख दोनों

Ans-  D

5. औद्योगीकीकरण से क्या दुष्प्रभाव पड़े ?

    1. पर्यावरण
    2. बिमारियों
    3. आणविक हथियार में वृद्धि
    4. उपरोक्त सभी

Ans-  D

6. कारखानों का उदय कौन-से सन् में हुआ ?

    1. 1830
    2. 1850
    3. 1730
    4. 1750

Ans-  C

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7. ऊन के उद्योग के लिए किस मशीन का इस्तेमाल किया जाने लगा ?

    1. स्पिनिंग जेनी मशीन
    2. हाथ की मशीन
    3. क और ख दोनों
    4. इनमे से कोई नही

Ans-  A

8. निम्नलिखित में से कौन-सी एक यूरोपीय प्रबंध एजेंसी थी?

    1.  टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी
    2.  एंड्रयू यूल
    3.  एल्गिन मिल
    4.  बिड़ला उद्योग

Ans- B

9. आढ़तियों का मुख्य कार्य था

    1.  उद्योगपतियों के लिए रोजगार सृजित करना।
    2.  उद्योगपतियों के लिए नई भर्ती प्राप्त करें।
    3.  बिचौलिए को कंपनी के लिए कारीगर लाने में मदद करना।
    4.  बुनकरों से संबंधित मुद्दों पर कंपनी को सलाह देना।

Ans- B

10. निम्नलिखित में से किस नवाचार ने बुनकरों को उत्पादकता बढ़ाने और मिल क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद की?

    1.  स्पिनिंग जेनी
    2.  फ्लाइंग शटल
    3.  कॉटन जिन
    4.  रोलर

Ans- B

11. ओद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार की प्रक्रिया किस प्रकार तेजी से बढ़ रही थी ?

    1. कपास उद्योग द्वारा
    2. स्टील उद्योग द्वारा
    3. लौहा उद्योग द्वारा
    4. उपरोक्त सभी

Ans-  D

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12. 1873 तक ब्रिटेन में स्टील और लौहे निर्यात का मूल्य कितना बढ़ गया था ?

    1. 8.8 करोड़ पौंड
    2. 9.9 करोड़ पौंड
    3. 7.7 करोड़ पौंड
    4. 10.09 करोड़ पौंड

Ans-  C

13. 1830 के दशक में सूती कपड़े की फक्ट्रियों में किस प्रकार कार्य किया जाता था ?

    1. भाप की ताकत से
    2. विशालकाए पहिय द्वारा
    3. क और ख दोनों
    4. इनमेंं से कोई नही

Ans-  C

14. भाप इंजन में किसके द्वारा सुधार किए गए थे ?

    1. जेम्स वॉट
    2. फैट्रिक
    3. फुलर्ज
    4. जेम्स मिल

Ans-  A

15. इंजन को पेटेंट किस सन् में किया गया था ?

    1. 1831
    2. 1840
    3. 1860
    4. 1871

Ans-  D

16. प्रथम भारतीय जूट मिल कहाँ स्थापित की गई थी? [CBSE 2011]

    1.  बंगाल
    2.  बॉम्बे
    3.  मद्रास
    4.  बिहार

Ans-  A

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17.  1911 में, भारत में निम्नलिखित में से किस स्थान पर 67 प्रतिशत बड़े उद्योग स्थित थे? [CBSE 2011]

    1.  बंगाल और बॉम्बे
    2.  सूरत और अहमदाबाद
    3.  दिल्ली और बॉम्बे
    4.  पटना और लखनऊ

Ans-  A

18. ब्रिटिश सरकार ने बुनकरों की आपूर्ति की निगरानी और कपड़े की गुणवत्ता की जांच करने के लिए किसे नियुक्त किया था?[CBSE 2011]

    1.  जॉबर
    2.  सिपाही
    3.  पुलिसकर्मी
    4.  गुमास्ता

Ans-  D

19. निम्नलिखित विकल्पों में से विषम को काट दें। यूरोपीय प्रबंध कंपनियां निवेश करने में रुचि रखती थीं

    1.  खनन
    2.  चावल उत्पादन
    3.  जूट
    4.  इंडिगो

Ans-  B

20. निम्नलिखित में से किस व्यापार से शुरुआती उद्यमियों ने भाग्य बनाया?

    1.  कपड़ा व्यापार
    2.  चीन व्यापार
    3.  चाय में व्यापार
    4.  उद्योग

Ans-  B 

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Class 10 History Chapter 5 Notes in Hindi | मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया 

Class 10 History Chapter 5 Notes in Hindi : covered History Chapter 5 easy language with full details & concept  इस अध्याय में हमलोग जानेंगे कि – विश्व में प्रेस की शुरुआत कब और कहाँ, कैसे हुई?(When and where, how did the press start in the world), यूरोप में प्रिंट का आना(advent of print in Europe), गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस, प्रिंट क्राँति और उसके प्रभाव(print revolution and its effects), धार्मिक विवाद एवं प्रिंट का डर, लोगों में पढ़ने का जुनून(passion for reading), मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति(Print Culture and the French Revolution), प्रिंट तकनीक में अन्य सुधार, किताबें बेचने के नये तरीके, भारत का मुद्रण संसार(printing world of India), पाण्डुलिपियाँ(manuscripts), भारत में प्रिंटिंग की दुनिया(world of printing in india), मुस्लिमों ने मुद्रण संस्कृति को कैसे लिया(How Muslims took print culture), प्रकाशन के नये रूप(new forms of publication), प्रिंट और महिलाएँ(print and women), प्रिंट और प्रतिबंध, शुरुआती छपी किताबें किस प्रकार होती थी(what were the early printed books like)? 

Class 10 History Chapter 5 Notes in Hindi full details

category  Class 10 History Notes in Hindi
subjects  History
Chapter Name Class 10 Printing Culture and the Modern World (मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया) 
content Class 10 History Chapter 5 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 History Chapter 5 notes in Hindi

इतिहास अध्याय 5 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – इतिहास   अध्याय – 5

मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

Printing Culture and the Modern World


परिचय (Introduction) -: 

शुरुआती छपी किताबें :-

प्रिंट टेक्नॉलोजी का विकास सबसे पहले चीन , जापान और कोरिया में हुआ। चीन में 594 इसवी के बाद से ही लकड़ी के ब्लॉक पर स्याही लगाकर उससे कागज पर प्रिंटिंग की जाती थी । उस जमाने में कागज पतले और झिरीदार होते थे । ऐसे कागज पर दोनों तरफ छपाई करना संभव नहीं था । कागज के दोनों सिरों को टाँके लगाकर फिर बाकी कागज को मोड़कर एकॉर्डियन बुक बनाई जाती थी ।

चीन के प्रशासनिक तंत्र में सिविल सर्विस परीक्षा द्वारा लोगों की बहाली की जाती थी। इस परीक्षा के लिये चीन का राजतंत्र बड़े पैमाने पर पाठ्यपुस्तकें छपवाता था। सोलहवीं सदी में इस परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या बहुत बढ़ गई। इसलिये किताबें छपने की रफ्तार भी बढ़ गई। अब छपाई केवल बुद्धिजीवियों या अधिकारियों तक ही सीमित नहीं था।

अब व्यापारी भी रोजमर्रा के दैनिक जीवन में छ्पाई का इस्तेमाल करने लगे। इससे व्यापार से जुड़े हुए आँकड़े रखना आसान हो जाये। कहानी, कविताएँ, जीवनी, आत्मकथा, नाटक आदि भी छपकर आने लगे। इससे पढ़ने के शौकीन लोगों के शौक पूरे हो सकें। खाली समय में पढ़ना एक फैशन जैसा बन गया था। रईस महिलाओं में भी पढ़ने का शौक बढ़ने लगा और उनमें से कईयों ने तो अपनी कविताएँ और कहानियाँ भी छपवाईं।

जापान में छापाई कैसे आया :- 

प्रिंट टेक्नॉलोजी को बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने 768 से 770 इसवी के आस पास जापान लाया । बौद्ध धर्म की किताब डायमंड सूत्र ; जो 868 इसवी में छपी थी ; को जापानी भाषा की सबसे पुरानी किताब माना जाता है ।

उस समय पुस्तकालयों और किताब की दुकानों में हाथ से छपी किताबें और अन्य सामग्रियाँ भरी होती थीं। किताबें कई विषयों पर उपलब्ध थीं ; जैसे महिलाओं , संगीत के साज़ों , हिसाब – किताब , चाय अनुष्ठान , फूलसाज़ी , शिष्टाचार और रसोई पर लिखी , आदि ।

यूरोप में प्रिंट का आना :-

सिल्क रूट के माध्यम से ग्याहरवीं शताब्दी में चीनी कागज़ यूरोप पहुँचा। 1925 में मार्को पोलो चीन से मुद्रण का ज्ञान लेकर इटली गया। मार्को पोलो जब 1295 में चीन से लौटा तो अपने साथ ब्लॉक प्रिंटिंग की जानकारी लेकर आया। इस तरह इटली में प्रिंटिंग की शुरुआत हुई। उसके बाद प्रिंट टेक्नॉलोजी यूरोप के अन्य भागों में भी फैल गई। उस जमाने में कागज पर छपी हुई किताबों को सस्ती चीज समझा जाता था और हेय दृष्टि से देखा जाता था।

इसलिए कुलीन और रईस लोगों के लिए किताब छापने के लिए वेलम का इस्तेमाल होता था। वेलम चमड़े से बनाया जाता है और पतली शीट की तरह होता है। वेलम पर छपी किताब को रईसी की निशानी माना जाता था। पंद्रह सदी के शुरुआत तक यूरोप में तरह तरह के सामानों पर छपाई करने के लिए लकड़ी के ब्लॉक का जमकर इस्तेमाल होने लगा। इससे हाथ से लिखी हुई किताबें लगभग गायब ही हो गईं।

गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस :-

योहान गुटेन्बर्ग के पिता व्यापारी थे और वह खेती की एक बड़ी रियासत में पल बढ़कर बड़ा हुआ । वह बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें देखता आया था । बाद में उसने पत्थर पर पॉलिश करने की कला सीखी , फिर सुनारी और अंत उसने शीशे की इच्छित आकृतियों में गढ़ने में महारत हासिल कर ली ।

अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल उसने अपने नए अविष्कार में किया । जैतून प्रेस ही प्रिंटिंग प्रेस का आदर्श बनी और साँचे का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया गया ।

गुटेनबर्ग ने 1448 तक अपना यह यंत्र मुकम्मल कर लिया और इससे सबसे पहली जो पुस्तक छपी वह थी बाइबिल । शुरू में छपी किताबें अपने रंग रूप में और साज – सज्जा में हस्तलिखित जैसी ही थी । 1440 -1550 के मध्य यूरोप के ज्यादातर देशों में छापेखाने लग गए थे ।

प्रिंट उद्योग में इतनी अच्छी वृद्धि हुई कि पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध्र में यूरोप के बाजारों में लगभग 2 करोड़ किताबें छापी गईं। सत्रहवीं सदी में यह संख्या बढ़कर 20 करोड़ हो गई।

प्रिंट क्राँति और उसके प्रभाव :-

प्रिंट टेक्नॉलोजी के आने से पाठकों का एक नया वर्ग उदित हुआ। अब आसानी से किसी भी किताब की अनेक कॉपी बनाई जा सकती थी, इसलिये किताबें सस्ती हो गईं। इससे पाठकों की बढ़ती संख्या को संतुष्ट करने में काफी मदद मिली। अब किताबें सामान्य लोगों की पहुँच में आ गईं। इससे पढ़ने की एक नई संस्कृति का विकास हुआ।

बारहवीं सदी के यूरोप में साक्षरता का स्तर काफी नीचे था। प्रकाशक ऐसी किताबें छापते थे जो अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सकें।
लोकप्रिय गीत, लोक कथाएँ और अन्य कहानियों को इसलिए छापा जाता था ताकि अनपढ़ लोग भी उन्हें सुनकर ही समझ लें। पढ़े लिखे लोग इन कहानियों को उन लोगों को पढ़कर सुनाते थे जिन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता था।

धार्मिक विवाद एवं प्रिंट का डर :-

अधिकांश लोगों को यह भय था कि अगर मुद्रण पर नियंत्रण नही किया गया तो विद्रोही एवं अधार्मिक विचार पनपने लगेंगें । धर्म सुधारक मार्टिन लूथर किंग ने अपने लेखों के माध्यम से कैथोलिक चर्च की कुरीतियों का वर्णन किया । टेस्टामेंट के लूथर के तर्जुमें के कारण चर्च का विभाजन हो गया एवं और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरूआत हुई ।

धर्म – विरोधियों को सुधारने हेतु रोमन चर्च ने इंकविजिशन आरंभ किया । 1558 में रोमन चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची प्रकाशित की।

पढ़ने का जुनून :-

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में यूरोप में साक्षरता के स्तर में काफी सुधार हुआ। अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ भागों में साक्षरता का स्तर तो 60 से 80 प्रतिशत तक पहुँच चुका था। साक्षरता बढ़ने के साथ ही लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया।

किताब की दुकान वाले अकसर फेरीवालों को बहाल करते थे। ऐसे फेरीवाले गाँवों में घूम घूम कर किताबें बेचा करते थे। पत्रिकाएँ, उपन्यास, पंचांग, आदि सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबें थीं।

छपाई के कारण वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों के नये विचार और नई खोज सामान्य लोगों तक आसानी से पहुँच पाते थे। किसी भी नये आइडिया को अब अधिक से अधिक लोगों के साथ बाँटा जा सकता था और उसपर बेहतर बहस भी हो सकती थी।

मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति :-

कई इतिहासकारों का मानना है कि प्रिंट संस्कृति ने ऐसा माहौल बनाया जिसके कारण फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत हुई । इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित हैं :-

छपाई के चलते विचारों का प्रसार , उनके लेखन ने परंपरा , अविश्वास और निरकुंशवाद की आलोचना की ।
रीति – रिवाजों की जगह विवेक के शासन पर बल दिया ।
चर्च की धार्मिक और राज्य की निरकुंश सत्ता पर हमला ।
छपाई ने वाद विवाद की नई संस्कृति को जन्म दिया ।

1780 के दशक आने तक ऐसे साहित्य की बाढ़ आ गई जिसमें राजशाही का मखौल उड़ाया जाने लगा और उनकी नैतिकता की आलोचना होने लगी। प्रिंट के कारण राजशाही की ऐसी छवि बनी जिसमें यह दिखाया गया कि आम जनता की कीमत पर राजशाही के लोग विलासिता करते थे।इन विचारकों ने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की कड़ी आलोचना की।

वॉल्तेअर और रूसो को ज्ञानोदय का अग्रणी विचारक माना जाता है।

प्रिंट तकनीक में अन्य सुधार :- 

न्यू यॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शक्ति से चलने वाला बेलनाकार प्रेस बना लिया था । इस प्रेस से एक घंटे में 8,000 पेज छापे जा सकते थे ।

उन्नीसवीं सदी के अंत में ऑफसेट प्रिंटिंग विकसित हो चुका था । ऑफसेट प्रिंटिंग से एक ही बार में छ : रंगों में छपाई की जा सकी थी। बीसवीं सदी के आते ही बिजली से चलने वाले प्रेस भी इस्तेमाल में आने लगे । इससे छपाई के काम में तेजी आ गई ।

इसके अलावा प्रिंट की टेक्नॉलोजी में कई अन्य सुधार भी हुए । सभी सुधारों का सामूहिक सार हुआ जिससे छपी हुई सामग्री का रूप ही बदल गया ।

किताबें बेचने के नये तरीके :-

उन्नीसवीं सदी में कई पत्रिकाओं में उपन्यासों को धारावाहिक की शक्ल में छापा जाता था । इससे पाठकों को उस पत्रिका का अगला अंक खरीदने के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता था ।

1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय साहित्य को शिलिंग सीरीज के नाम से सस्ते दर पर बेचा जाता था । किताब के ऊपर लगने वाली जिल्द का प्रचलन बीसवीं सदी में शुरु हुआ ।

1930 के दशक की महा मंदी के प्रभाव से पार पाने के लिए पेपरबैक संस्करण निकाला गया जो कि सस्ता हुआ करता था। 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय साहित्य को शिलिंग सीरीज के नाम से सस्ते दर पर बेचा जाता था।

भारत का मुद्रण संसार :-

भारत में संस्कृत , अरबी , फारसी और विभिन्न श्रेत्रीय भाषाओं में हस्त लिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी ।

पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर नकल कर बनाई जाती थी उनकी उम्र बढाने के विचार से उन्हें जिल्द या तख्तियों में बाँध दिया जाता था ।

पूर्व औपनिवेशक काल में बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं का बड़ा जाल था , लेकिन विद्यार्थी आमतौर पर किताबे नहीं पढते थे । गुरू अपनी याद्दाश्त से किताबें सुनाते थे , और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे । इस तरह कई सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।

पाण्डुलिपियाँ :-

हाथों से लिखी पुस्तकों को पांडुलिपियाँ कहते हैं ।

भारत में प्रिंटिंग की दुनिया :-

भारत में प्रिंटिंग प्रेस सबसे पहले सोलहवीं सदी के मध्य में पुर्तगाली धर्मप्रचारकों द्वारा लाया गया। भारत में छपने वाली पहली किताबें कोंकणी भाषा में थी। 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। 1780 से बंगाल गैजेट को जेम्स ऑगस्टस हिकी ने संपादित करना शुरु किया। यह एक साप्ताहिक पत्रिका थी।

हिकी ने कम्पनी के बड़े अधिकारियों के बारे में गॉशिप भी छापे। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने हिकी को इसके लिये सजा भी दी। उसके बाद वारेन हेस्टिंग्स ने सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अखबारों को प्रोत्साहन दिया ताकि सरकार की छवि ठीक की जा सके। बंगाल गैजेट ही पहला भारतीय अखबार था; जिसे गंगाधर भट्टाचार्य ने प्रकाशित करना शुरु किया था। 1821 से राममोहन राय ने संबाद कौमुदी प्रकाशित करना शुरु किया। इस पत्रिका में हिंदू धर्म के रूढ़िवादी विचारों की आलोचना होती थी।

देवबंद सेमिनरी की स्थापना 1867 में हुई। इस सेमिनरी ने एक मुसलमान के जीवन में सही आचार विचार को लेकर हजारों हजार फतवे छापने शुरु किये।

1810 में कलकत्ता में तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस को छापा गया। 1880 के दशक से लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बम्बई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस ने आम बोलचाल की भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों को छापना शुरु किया।

इस तरह से प्रिंट के कारण धार्मिक ग्रंथ आम लोगों की पहुँच में आ गये। इससे नई राजनैतिक बहस की रूपरेखा निर्धारित होने लगी।
प्रिंट के कारण भारत के एक हिस्से का समाचार दूसरे हिस्से के लोगों तक भी पहुँचने लगा। इससे लोग एक दूसरे के करीब भी आने लगे।

मुस्लिमों ने मुद्रण संस्कृति को कैसे लिया :-

1822 में फारसी में दो अखबार शुरु हुए जिनके नाम थे जाम – ए – जहाँ – नामा और शम्सुल अखबार । उसी साल एक गुजराती अखबार भी शुरु हुआ जिसका नाम था बम्बई समाचार । उत्तरी भारत के उलेमाओं ने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथों के उर्दू और फारसी अनुवाद छापने शुरु किये ।

देवबंद सेमिनरी की स्थापना 1867 में हुई । इस सेमिनरी ने एक मुसलमान के जीवन में सही आचार विचार को लेकर हजार फतवे छापने शुरु किये ।

प्रकाशन के नये रूप :-

शुरु शुरु में भारत के लोगों को यूरोप के लेखकों के उपन्यास ही पढ़ने को मिलते थे । वे उपन्यास यूरोप के परिवेश में लिखे होते थे । इसलिए यहाँ के लोग उन उपन्यासों से तारतम्य नहीं बिठा पाते थे ।

बाद में भारतीय परिवेश पर लिखने वाले लेखक भी उदित हुए । ऐसे उपन्यासों के चरित्र और भाव से पाठक बेहतर ढंग से अपने आप को जोड़ सकते थे । लेखन की नई नई विधाएँ भी सामने आने लगीं ; जैसे कि गीत , लघु कहानियाँ , राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर निबंध , आदि ।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक एक नई तरह की दृश्य संस्कृति भी रूप ले रही थी । कई प्रिंटिंग प्रेस चित्रों की नकलें भी भारी संख्या में छापने लगे । राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों की कलाकृतियों को अब जन समुदाय के लिये प्रिंट किया जाने लगा। 1870 आते आते पत्रिकाओं और अखबारों में कार्टून भी छपने लगे । ऐसे कार्टून तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर कटाक्ष करते थे ।

प्रिंट और महिलाएँ :-

कई लेखकों ने महिलाओं के जीवन और संवेदनाओं पर लिखना शुरू किया। इससे मध्यम वर्ग की महिलाओं में पढ़ने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। कई ऐसे पुरुष आगे आये जो स्त्री शिक्षा पर जोर देते थे। कुछ महिलाओं ने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की, जबकि कुछ अन्य महिलाओं ने स्कूल जाना भी शुरु किया। लेकिन पुरातनपंथी हिंदू और मुसलमान अभी भी स्त्री शिक्षा के खिलाफ थे। उनका मानना था कि शिक्षा से लड़कियों के दिमाग पर बुरे प्रभाव पड़ेंगे।

लोग चाहते थे कि उनकी बेटियाँ धार्मिक ग्रंथ पढ़ें लेकिन उसके अलावा और कुछ न पढ़ें। उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी में प्रिंट संस्कृति का विकास पहले ही हो चुका था, लेकिन हिंदी में ठीक तरीके से प्रिंटिंग की शुरुआत 1870 के दशक में ही हो पाई थी।

1871 ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक गुलामगिरी में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा। 1876 में रशसुन्दरी देवी की आत्मकथा आमार जीबन प्रकाशित हुई ।

प्रिंट और प्रतिबंध :-

1798 के पहले तक उपनिवेशी शासक सेंसर को लेकर बहुत गंभीर नहीं थे । शुरु में जो भी थोड़े बहुत नियंत्रण लगाये जाते थे वे भारत में रहने वाले ऐसे अंग्रेजों पर लगायें जाते थे जो कम्पनी के कुशासन की आलोचना करते थे ।

1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्रत के प्रति अंग्रेजी हुकूमत का रवैया बदलने लगा । वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को 1878 में पारित किया गया। इस कानून ने सरकार को वर्नाकुलर प्रेस में समाचार और संपादकीय पर सेंसर लगाने के लिए अकूत शक्ति प्रदान की ।

राजद्रोही रिपोर्ट छपने पर अखबार को चेतावनी दी जाती थी । यदि उस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था तो फिर ऐसी भी संभावना होती थी कि प्रेस को बंद कर दिया जाये और प्रिंटिंग मशीनों को जब्त कर लिया जाये ।

वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को 1878 में पारित किया गया। इस कानून ने सरकार को वर्नाकुलर प्रेस में समाचार और संपादकीय पर सेंसर लगाने के लिए अकूत शक्ति प्रदान की।


Class 10 History chapter 5  Important Question Answer

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01. मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की ?

उत्तर ⇒ मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। (क) अंग्रेज़ी काल में भारतीय लेखकों ने अनेक ऐसी पुस्तकों की रचना की जो

राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत थीं। (ख) बंकिंमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ‘ ने लोगों में देश-प्रेम की भावना का संचार किया। ‘वंदे-मातरम्‘ गीत भारत के कोने-कोने में गूँजने लगा। (ग) भारतीय समाचार पत्रों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए उचित वातावरण तैयार किया। (घ) ‘अमृत बाज़ार पत्रिका‘, ‘केसरी‘, ‘मराठा‘, ‘हिंदू‘ तथा ‘बाँबे समाचार‘ आदि समाचार पत्रों में छपने वाले लेख राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत होते थे। इन लेखों ने भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता की ज्योति जलायी। (ङ) इसके अतिरिक्त भारतीय समाचार पत्र अंग्रेज़ी सरकार की ग़लत नीतियों को जनता के सामने रखते थे और उनकी खुल कर आलोचना करते थे।

समाचार पत्रों के माध्यम से ही लोगों को पता चला कि अंग्रेजी सरकार किस प्रकार बाँटो तथा राज करो की नीति का अनुसरण कर रही है। उन्हें भारत से होने वाले धन की निकासी की जानकारी भी समाचार पत्रों ने ही दी। इस प्रकार समाचार पत्रों ने उनके मन में राष्ट्रीयता के बीज बोये। सच तो यह है कि मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद को बहुत ही मजबूत आधार प्रदान किया।

02. औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित करने के लिए क्या किया ?

उत्तर ⇒ औपनिवेशिक काल में प्रकाशन के विकास के साथ-साथ इसे नियंत्रित करने का भी प्रयास किया। ऐसा करने के पीछे दो कारण थे—पहला, सरकार वैसी कोई पत्र-पत्रिका अथवा समाचार पत्र मुक्त रूप से प्रकाशित नहीं होने देना चाहती थी जिसमें सरकारी व्यवस्था और नीतियों की आलोचना हो तथा दूसरा, जब अंगरेजी राज की स्थापना हुई उसी समय से भारतीय राष्ट्रवाद का विकास भी होने लगा। राष्ट्रवादी संदेश के प्रसार को रोकने के लिए प्रकाशन पर नियंत्रण लगाना सरकार के लिए आवश्यक था। भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित करने के लिए औपनिवेशिक सरकार के द्वारा पारित विभिन्न अधिनियम उल्लेखनीय हैं –

(i) 1799 का अधिनियम- गवर्नर जनरल वेलेस्ली ने 1799 में एक अधिनियम पारित किया। इसके अनुसार समाचार-पत्रों पर सेंशरशिप लगा दिया गया।

(ii) 1823 का लाइसेंस अधिनियम- इस अधिनियम द्वारा प्रेस स्थापित करने से पहले सरकारी अनुमति लेना आवश्यक बना दिया गया।

(iii) 1867 का पंजीकरण अधिनियम – इस अधिनियम द्वारा यह आवश्यक बना दिया गया कि प्रत्येक पुस्तक, समाचार पत्र एवं पत्र-पत्रिका पर मुद्रक, प्रकाशक तथा मुद्रण के स्थान का नाम अनिवार्य रूप से दिया जाए। साथ ही प्रकाशित पुस्तक की एक प्रति सरकार के पास जमा करना आवश्यक बना दिया गया।

(iv) वाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) – लार्ड लिटन के शासनकाल में पारित प्रेस को प्रतिबंधित करने वाला सबसे विवादास्पद अधिनियम यही था। इसका उद्देश्य देशी भाषा के समाचार पत्रों पर कठोर अंकुश लगाना था। अधिनियम के अनुसार भारतीय समाचार पत्र ऐसा कोई समाचार प्रकाशित नहीं कर सकती थी जो अंगरेजी सरकार के प्रति दुर्भावना प्रकट करता हो। भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस अधिनियम का बड़ा विरोध किया।

03. छपाई से विरोधी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था ? संक्षेप में लिखें।

उत्तर ⇒ मुद्रण तकनीक से किताबों की पहुँच दिन-प्रतिदिन सुलभ होती गई। इसमें ज्ञान का प्रसार हुआ और तर्क को बढ़ावा मिला। परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जो किताबों के सुलभ हो जाने से चिंतित थे। जिन लोगों ने छपी हुई किताबों का स्वागत भी किया, उनके मन में कई प्रकार की शंकाएं थीं। चिंतित लोगों में मुख्य रूप से धर्मगुरु, सम्राट् तथा कुछ लेखक शामिल वे समझ नहीं पा रहे थे कि छपे हुए शब्दों का लोगों के दिलो-दिमाग़ पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका मानना था कि यदि पुस्तकों पर कोई नियंत्रण नहीं होगा तो लोग अधर्मी और विद्रोही बन जाएंगे। ऐसे में ‘मूल्यवान‘ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। थे।

04. उन्नीसवीं सदी में भारत में ग़रीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ ?

उत्तर ⇒ मुद्रण संस्कृति से देश की ग़रीब जनता अथवा मज़दूर वर्ग को बहुत लाभ पहुँचा। पुस्तकें इतनी सस्ती हो गई थीं कि चौक-चौराहों पर बिकने लगी थीं। ग़रीब मज़दूर इन्हें आसानी से खरीद सकते थे। बीसवीं शताब्दी में सार्वजनिक पुस्तकालय भी खुलने लगे जिससे पुस्तकों की पहुँच और भी व्यापक हो गई। बंगलौर के सूती मिल मज़दूरों ने स्वयं को शिक्षित करने के उद्देश्य से अपने पुस्तकालय स्थापित किए। इसकी प्रेरणा उन्हें बंबई के मिल-मज़दूरों से मिली थी। कुछ सुधारवादी लेखकों की पुस्तकों ने मज़दूरों को जातीय भेदभाव के विरुद्ध संगठित किया। इन लेखकों ने मजदूरों के बीच साक्षरता लाने, नशाखोरी को कम करने तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के भरसक प्रयास किए। इसके अतिरिक्त उन्होंने मज़दूरों तक राष्ट्रवाद का संदेश भी पहुँचाया। मज़दूरों का हित साधने वाले लेखकों में ज्योतिबा फुले, भीमराव अंबेडकर, ई० वी० रामास्वामी नायकर तथा काशीबाबा के नाम लिये जा सकते हैं। काशीबाबा कानपुर के एक मिल मजदूर थे। उन्होंने 1938 में छोटे और बड़े सवाल छापकर छपवा कर जातीय तथा वर्गीय शोशण के बीच का रिश्ता समझाने का प्रयास किया। बंगलौर के सूती मिल मजदूरों ने स्वयं को शिक्षित तथा जागरूक करने के लिए पुस्तकालय बनाए। अनेक समाज सुधारकों ने भी कोशिश की कि मज़दूरों के बीच नाशाखोरी कम हो तथा साक्षरता दर बढ़े।

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05. मद्रण क्रांति ने आधुनिक विश्व को कैसे प्रभावित किया।

उत्तर ⇒ मुद्रण क्रांति ने आम लोगों को जिन्दगी ही बदल दी मुद्रण क्रांति के करण छापाखानों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। जिसके परिणामस्वरूप पर निर्माण में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।
मुद्रण क्रांति के फलस्वरूप किताबें समाज के हर तबकों के बीच पहुँच पायी। किताबों की पहुंच आसान होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई। एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ तथा पढ़ने के कारण उनके अंदर तार्किक क्षमता का विकास हुआ। पठन-पाठन से विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ तथा तर्कवाद और मानवतावाद का द्वार खुला। धर्म सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ लिखी। फलस्वरूप चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंटवाद की स्थापना हुई। इस तरह छपाई से नए बौद्धिक माहौल का निर्माण हुआ एवं धर्म सुधार आंदोलन के नए विचारों का फैलाव बड़ी तेजी से आम लोगों तक हुआ। वैज्ञानिक एवं दार्शनिक बातें भी आम जनता की पहुँच से बाहर नहीं रही। न्यूटन, टामसपेन, वाल्तेयर और रूसो की पुस्तकें भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगी।
मुद्रण क्रांति के फलस्वरूप प्रगति और ज्ञानोदय का प्रकाश यूरोप में फैल चुका था। लोगों में निरंकुश सत्ता से लड़ने हेतु नैतिक साहस का संचार होने लगा था। फलस्वरूप मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण किया।

06. मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा को रेखांकित करें। यह आधुनिक स्वरूप में कैसे पहुँचा?

उत्तर ⇒ मुद्रण कला के आविष्कार और विकास का श्रेय चीन को जाता है। 1041 ई० में एक चीनी व्यक्ति पि-शेंग ने मिट्टी के मुद्रा बनाए। इन अक्षर मुद्रों को साजन कर छाप लिया जा सकता था। इस पद्धति ने ब्लॉक प्रिंटिंग का स्थान ले लिया। धातु के मुवेबल टाइप द्वारा प्रथम पुस्तक 13वीं सदी के पूर्वार्द्ध में मध्य

कोरिया में छापी गई। यद्यपि मवेबल टाइपों द्वारा मुद्रण कला का आविष्कार ता पूरख में ही हुआ, परंतु इस कला का विकास यूरोप में अधिक हुआ। 13वीं सदी के आतम में रोमन मिशनरी एवं मार्कोपोलो द्वारा ब्लॉक प्रिंटिंग के नमनं यरोप पहुँचे। रोमन लिपि में अक्षरों की संख्या कम होने के कारण लकड़ी तथा धातु के बने मूर्वबल टाइम का प्रसार तेजी से हुआ। इसी काल में शिक्षा के प्रसार, व्यापार एवं मिशनारया का बढ़ती गतिविधियों से सस्ती मुद्रित सामग्रियों की माँग तेजी से बढ़ी। इस मांग की पति के लिए तेज और सस्ती मद्रण तकनीकी की आवश्यकता थी, जिसे (14304 दशक में) स्ट्रेसवर्ग के योहान गुटेन्वर्ग ने पूरा कर दिखाया।

18वीं सदी के अंतिम चरण तक धातु के बने छापाखानं काम करने लगे। 19वीं-20वीं सदी में छापाखाना में और अधिक तकनीकी सुधार किए गए। 19वा शताब्दी में न्यूयार्क निवासी एम० ए० हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस का निर्माण किया। इसके द्वारा प्रतिघंटा आठ हजार ताव छापे जाने लगे। इससे मुद्रण में तेजी आई। 20वीं सदी के आरंभ से बिजली संचालित प्रेस व्यवहार में आया। इसने छपाई को और गति प्रदान की। प्रेस में अन्य तकनीकी बदलाव भी लाए गए।

07. फ्रांसीसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में मुद्रण की भूमिका की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ फ्रांस की क्रांति में बौद्धिक कारणों का भी काफी महत्त्वपूर्ण योगदान था। फ्रांस के लेखकों और दार्शनिकों ने अपने लेखों और पुस्तकों द्वारा लोगों में नई चेतना जगाकर क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। मुद्रण ने निम्नलिखित प्रकारों से फ्रांसीसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में अपनी भूमिका निभाई।

(i) ज्ञानोदय के दार्शनिकों के विचारों का प्रसार— फ्रांसीसी दार्शनिकों ने रूढ़िगत सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था की कटु आलोचना की। इन लोगों ने इस बात पर बल दिया कि अंधविश्वास और निरंकुशवाद के स्थान पर तर्क और विवेक पर आधारित व्यवस्था की स्थापना हो। चर्च और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार किया गया। वाल्टेयर और रूसो ऐसे महान दार्शनिक थे जिनके लेखन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा।

(ii) वाद-विवाद की संस्कृति— पुस्तकों और लेखों ने वाद-विवाद की संस्कृति को जन्म दिया। अब लोग पुरानी मान्यताओं की समीक्षा कर उन पर अपने विचार प्रकट करने लगे। इससे नई सोच उभरी। राजशाही, चर्च और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। फलतः क्रांतिकारी विचारधारा का उदय हुआ।

(iii) राजशाही के विरुद्ध असंतोष- 1789 की क्रांति के पूर्व फ्रांस में बड़ी संख्या में ऐसा साहित्य प्रकाशित हो चुका था जिसमें तानाशाही, राजव्यवस्था और इसके नैतिक पतन की कट आलोचना की गयी थी। अनेक व्यंग्यात्मक चित्रा वारा यह दिखाया गया कि किस प्रकार आम जनता का जीवन कष्टों और अभावों से ग्रस्त था, जबकि राजा और उसके दरबारी विलासिता में लीन हैं। इससे जनता में राजतंत्र के विरुद्ध असंतोष बढ़ गया।


Class 10 History chapter 5 Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. जापान की सबसे पुरानी पुस्तक डायमंड सूत्र कब छपी ?

    1. 868 ई० में
    2. 866 ई० में
    3. 867 ई० में
    4. 865 ई० में

Ans :- A

2. गुन्टेंबर्ग के पिता क्या थे ?

    1. पत्रकार
    2. चित्रकार
    3. लेखक
    4. व्यापारी

Ans :- D

3. किस सदी में यूरोप के अधिकतर हिस्सों में साक्षरता दर बढ़ी ?

    1. सत्रहवीं
    2. अठारवीं
    3. सत्रहवीं व अठारवीं
    4. इनमेंं से कोई नही

Ans :- C

4. मुद्रण संस्कृति में लेखन ने किसकी आलोचना प्रस्तुत की ?

    1. परम्परा
    2. निरकुंश्वाद
    3. अंधविश्वास
    4. उपरोक्त सभी

Ans :- D

5. उन्नीसवीं सदी में किसने जन साक्षरता की दिशा में लम्बी छलाँग लगाई ?

    1. एशिया
    2. यूरोप
    3. अफ्रीका
    4. इटली

Ans :- B

6. फ्रांस में 1857 में बाल-पुस्तकें छापने के लिए क्या स्थापित किया गया ?

    1. मुद्रणालय
    2. प्रैस
    3. क और ख दोनों
    4. इनमेंं से कोई नही

Ans :- C

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7. उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में पुस्तकालयों का इस्तेमाल किसके लिए किया गया ?

    1. सफेद कालर मजदूरों के लिए
    2. निम्न वर्गीय लोगों के लिए
    3. दस्तकारों के लिए
    4. उपरोक्त सभी

Ans :- D

8. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शक्ति चालक बेलनाकार प्रैस की किसने कारगर बनाया था ?

    1. न्यूयार्क के लेखक
    2. रिचर्ड म.हो.
    3. क और ख दोनों
    4. कोई नही

Ans :- C

9. बेलनाकार प्रैस से कितनी शीट छप जाती थी ?

    1. 6000
    2. 7000
    3. 8000
    4. 9000

Ans :- C

10. किस दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय किताबें एक शिलिंग श्रृंखला में छपने लगीं ?

    1. 1919
    2. 1920
    3. 1921
    4. 1930

Ans :- B

11. पांडुलिपियों किस पर बनाई जाती थी ?

    1. ताड़ के पत्तों पर
    2. हाथ से बने कागज
    3. नकल कर
    4. उपरोक्त सभी

Ans :- D

12. भारत के गांवों में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ क्या आया ?

    1. अखबार
    2. पत्राचार
    3. प्रिटिंग प्रैस
    4. पत्र-लेखन

Ans :- C

13. जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन कब किया ?

    1. 1770
    2. 1780
    3. 1790
    4. 1778

Ans :- B

Class 10 History Chapter 5 VVI objective question answer 

14. राजा राम मोहन राय ने संवाद कौमुदी कब प्रकाशित की ?

    1. 1820
    2. 1821
    3. 1822
    4. 1823

Ans :- B

15. 1882 में कौन-से फारसी अखबार प्रकाशित हुए ?

    1. शन्सुल
    2. जाम-ए-जहाँ
    3. क और ख दोनों
    4. कोई नही

Ans :- C

16. तुलसीदास की किताब रामचरितमानस का प्रथम मुद्रित संस्करण कब और कहाँ प्रकाशित हुआ ?

    1. 1810 कोलकत्ता में
    2. 1808 लखनऊ में
    3. 1811 में उत्तर भारत
    4. 1809 में जयपुर

Ans :- A

17. निम्न में से साहित्यक विधाएँ कौन-सी है ?

    1. गीत
    2. कहानियाँ
    3. सामाजिक व राजनितिक लेख
    4. उपरोक्त सभी

Ans :- D

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18. 1880 के दशक में किसने उच्च जाति की नारियों की दयनीय स्थिति के बारे में रोष व जोश से लिखा ?

    1. पंडिता रमाबाई
    2. ताराबाई शिंदे
    3. क और ख दोनों
    4. कोई नही

Ans :- C

19. कलकत्ता का एक सम्पूर्ण क्षेत्र बतला कहाँ पर पुस्तकों के प्रकाशन को समर्पित है ?

    1. उड़ीसा
    2. बंगाल
    3. मध्य प्रदेश
    4. मद्रास

Ans :- B

20. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट कब लागू किया गया ?

    1. 1877
    2. 1878
    3. 1876
    4. 1875

Ans :- B

21. जनरल बेंटिक प्रैस कानून की पुर्नसमीक्षा की सहमति कब मिली ?

    1. 1835
    2. 1834
    3. 1832
    4. 1836

Ans :- A

22. मराठी प्रणेता ज्योतिबा फुले ने अपनी कृति गुलामगिरी में किस के अत्याचारों के बारे में लिखा ?

    1. बेरोजगारी
    2. जाति-प्रथा
    3. भूखमरी
    4. आडम्बरों

Ans :- B 

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