Class 10 Science Chapter 16 Notes in Hindi | प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन

Class 10 Science Chapter 16 Notes in Hindi : covered science Chapter 16 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – प्राकृतिक संसाधन किसे कहते है, प्राकृतिक संसाधन के कितने प्रकार होते है, प्रदुषण किसे कहते है, प्रदुषण के प्रकार कितने होते है, पर्यावरण समस्याएँ क्या क्या है, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन किसे कहते है, संपोषित विकास क्या है किसे कहते है, जैव विविधता किसे कहते है, जीवाश्म ईंध किसे कहते है, जीवाश्म ईंध के क्या कार्य है यह कितने प्रकार के होते है?

Class 10 Science Chapter 16 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 sustainable management of natural resources (प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन)
content Class 10 Science Chapter 16 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science Chapter 16 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 16 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 16

प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन

sustainable management of natural resources


प्राकृतिक संसाधन :-

वे संसाधन जो हमें प्रकृति ने दिए हैं और जीवों के द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं । जैसे :- मिट्टी , वायु , जल , कोयला , पेट्रोलियम , वन्य जीवन , वन ।

प्राकृतिक संसाधन के प्रकार :-

समाप्य संसाधन
असमाप्य संसाधन
समाप्य संसाधन :- ये बहुत सीमित मात्रा में पाए जाते हैं और समाप्त हो सकते हैं । उदाहरण :- कोयला , पेट्रोलियम ।

असमाप्य संसाधन :- ये असीमित मात्रा में पाए जाते हैं व समाप्त नहीं होंगे । उदाहरण :- वायु ।

प्रदूषण :-

प्राकृतिक संसाधनों का दूषित होना प्रदुषण कहलाता है ।

प्रदुषण के प्रकार :-

जल प्रदुषण
मृदा प्रदूषण
वायु प्रदुषण
ध्वनि प्रदूषण

पर्यावरण समस्याएँ :-

पर्यावरण समस्याएँ वैश्विक समस्याएँ हैं तथा इनके समाधान अथवा परिवर्तन में हम अपने आपको असहाय पाते हैं । इनके लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं विनियमन हैं तथा हमारे देश में भी पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं । अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं ।

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन :-

प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखने के लिए इनके प्रबंधन की आवश्यकता होती है ताकि यह अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके और संसाधनों का शोषण न हो ।

पर्यावरण को बचाने के लिए राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय अधिनियम हैं ।

प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन की आवश्यकता :-

ये बहुत ही सीमित हैं ।
प्राकृतिक संसाधनों के संपोषित विकास लिए ।
विविधता को बचाने के लिए ।
पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए ।
प्राकृतिक संसाधनों को दूषित होने से बचाने के लिए ।
संसाधनों को समाज के सभी वर्गों में उचित वितरण और शोषण से बचाना ।
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के कारण जनसंख्या में वृद्धि हो रही है और इसके कारण सभी संसाधनों की मांग में भी वृद्धि हो रही है ।

संसाधनों के दोहन का अर्थ :-

जब हम संसाधनों का अंधाधुन उपयोग करते है तो बडी तीव्रता से प्रकृति से इनका हारास होने लगता है । इससे हम पर्यावरण को क्षति पहुँचाते है ।

जब हम खुदाई से प्राप्त धातु कर निष्कर्षण करते है तो साथ ही साथ अपशिष्ट भी प्राप्त होता है जिनका निपटारा नहीं करने पर पर्यावरण को प्रदूषित करता है । जिसके कारण बहुत सी प्राकृतिक आपदाएँ होती रहती है । ये संसाधन हमारे ही नहीं अपितु अगली कई पिढियों के भी है ।

गंगा कार्य परियोजना :-

यह कार्ययोजना करोड़ों रूपयों का एक प्रोजेक्ट है । इसे सन् 1985 में गंगा स्तर सुधारने के लिए बनाया गया ।

जल की गुणवत्ता या प्रदूषण मापन हेतु कुछ कारक :-

जल का pH जो आसानी से सार्व सूचक की मदद से मापा जा सकता है ।
जल में कोलिफार्म जीवाणु ( जो मानव की आंत्र में पाया जाता है ) की उपस्थिति जल का संदूषित होना दिखाता है 

पर्यावरण को बचाने के लिए पाँच प्रकार के R :-

इनकार :- इसका अर्थ है कि जिन वस्तुओं की आपको आवश्यकता नहीं है , उन्हें लेने से इनकार करना । उदाहरण :- सामान खरीदते समय प्लास्टिक थैली को मना करना व अपने स्वयं के थैले में सामान डालो ।

कम उपयोग :- इसका अर्थ है कि आपको कम से कम वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए । उदाहरण :-

आवश्यकता न होन पर पंखे व बल्ब का स्विच बंद करना ।
टपकते नल को ठीक करना ।
भोजन को न फेंकना ।
पुनः उपयोग :- पुनः उपयोग के तरीके में आप किसी वस्तु का बार – बार उपयोग करते हैं । उदाहरण :-

जिस पानी से फल व सब्जी धोए है उसे पौधों में डाल देना
कपड़े धोने के बाद बचे पानी से फर्श व गाड़ी साफ करना ।
पुनः प्रयोजन :- इसका अर्थ यह है कि जब कोई वस्तु जिस उपयोग के लिए बनी है जब उस उपयोग में नहीं लाई जा सकती है तो उसे किसी अन्य उपयोगी कार्य के लिए प्रयोग करें । उदाहरण :- टूटे – फूटे चीनी मिट्टी के बर्तनों में पौधे उगाना ।

पुनः चक्रण :- इसका अर्थ है कि आपको प्लास्टिक , कागज़ , काँच , धातु की वस्तुएँ तथा ऐसे ही पदार्थों का पुनःचक्रण करके उपयोगी वस्तुएँ बनानी चाहिए । उदाहरण :- प्लास्टिक , काँच , धातु आदि को कबाड़ी वाले को दे ।

नोट :- पुनः इस्तेमाल / उपयोग , पुनः चक्रण से बेहतर है क्योंकि इसमें ऊर्जा की बचत होती है ।

संपोषित विकास :-

संपोषित विकास की संकल्पना मनुष्य की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति और विकास के साथ – साथ भावी संतति के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करती है ।

संपोषित विकास का उदेश्य :-

मनुष्य की वर्तमान आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं विकास को प्रोत्साहित करना ।
पर्यावरण को नुकसान से बचाना और भावी पीढ़ी के लिए संसाधनों का संरक्षण करना ।
पर्यावरण संरक्षण के साथ – साथ आर्थिक विकास को बढ़ाना ।

प्राकृतिक संसाधनों की व्यवस्था करते समय ध्यान देना योग्य :-

दीर्घकालिक दृष्टिकोण – ये प्राकृतिक संसाधन भावी पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके ।
इनका वितरण सभी समूहों में समान रूप से हो , न कि कुछ प्रभावशाली लोगों को ही इसका लाभ हो ।
अपशिष्टों के सुरक्षित निपटान का भी प्रबन्ध होना चाहिए ।

वन्य एवं वन्य जीवन संरक्षण :-

वन , जैव विविधता के तप्त स्थल हैं । जैव विविधता को संरक्षित रखना प्राकृतिक संरक्षण के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है क्योंकि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व नष्ट हो सकता है ।

जैव विविधता :-

जैव विविधता किसी एक क्षेत्र में पाई जाने वाली विविध स्पीशीज की संख्या है जैसे पुष्पी पादप , पक्षी , कीट , सरीसृप , जीवाणु आदि ।

तप्त स्थल :-

ऐसा क्षेत्र जहाँ अनेक प्रकार की संपदा पाई जाती है ।

दावेदार :-

ऐसे लोग जिनका जीवन , कार्य किसी चीज पर निर्भर हो , वे उसके दावेदार होते हैं ।

वनों के दावेदार :-

स्थानीय लोग :- वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं ।

सरकार और वन विभाग :- सरकार और वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं 

वन उत्पादों पर निर्भर व्यवसायी :- ऐसे छोटे व्यवसायी जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं , परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं करते ।

न्य जीव और पर्यावरण प्रेमी :- वन जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं ।

कुछ ऐसे उदाहरण जहाँ निवासियों ने वन संरक्षण में मुख्य भूमिका निभाई है ।

खेजरी वृक्ष :-

अमृता देवी विश्नोई ने 1731 में राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में खेजरी वृक्षों को बचाने के लिए 363 लोगों के साथ अपने आप को बलिदान कर दिया था ।

भारत सरकार ने जीव संरक्षण के लिए अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा की जो उनकी स्मृति में दिया जाता है ।

चिपको आंदोलन :-

यह आंदोलन गढ़वाल के ‘ रेनी ‘ नाम के गाँव में हुआ था । वहाँ की महिलाएँ उसी समय वन पहुँच गईं जब ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने लगे थे । महिलाएँ पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं और ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोक लिया ।

यह आंदोलन तीव्रता से बहुत से समुदायों में फैल गया और सरकार को वन संसाधनों के उपयोग के लिए प्राथमिकता निश्चित करने पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया ।

पश्चिम बंगाल के वन विभाग :-

पश्चिम बंगाल के वन विभाग ने क्षयित हुए साल के वृक्षों को अराबाड़ी वन क्षेत्र में नया जीवन दिया ।

सभी के लिए जल :-

जल पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों की मूलभूत आवश्यकता है ।
वर्षा हमारे लिए जल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है ।
भारत के कई क्षेत्रों में बाँध , तालाब और नहरें सिंचाई के लिए उपयोग किए जाते हैं ।

बांध :-

बांध में जल संग्रहण काफी मात्रा में किया जाता है जिसका उपयोग सिंचाई में ही नहीं बल्कि विद्युत उत्पादन में भी किया जाता है ।

कई बड़ी नदियों के जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाए गए हैं ; जैसे :-

टिहरी बांध :- नदी भगीरथी ( गंगा )
सरदार सरोवर बांध :- नर्मदा नदी
भाखड़ा नांगल बांध :- सतलुज नदी ।

बांधों के लाभ :-

सिंचाई के लिए पर्याप्त जल सुनिश्चित करना ।
विद्युत उत्पादन ।
क्षेत्रों में जल का लगातार वितरण करना ।

बांधों से हानियाँ :-

सामाजिक समस्याएँ :-

बड़ी संख्या में किसान एवं आदिवासी विस्थापित होते हैं ।
उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता ।
पर्यावरण समस्याएँ :-

वनों का क्षय होता है ।
जैव विविधता को हानि होती है ।
पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है ।
आर्थिक समस्याएँ :-

जनता का अत्यधिक धन लगता है ।
उस अनुपात में लाभ नहीं होता ।

जल संग्रहण :-

इसका मुख्य उद्देश्य है भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास करना ।

वर्षा जल संचयन :-

वर्षा जल संचयन से वर्षा जल को भूमि के अंदर भौम जल के रूप में संरक्षित किया जाता है ।

जल संग्रहण भारत में बहुत प्राचीन संकल्पना है ।

भौम जल के रूप में संरक्षण के लाभ :-

पानी का वाष्पीकरण नहीं होता ।
यह कुओं को भरता है ।
पौधों को नमी पहुँचाता है ।
मच्छरों के जनन की समस्या नहीं होती ।
यह जंतुओं के अपशिष्ट के संदूषण से सुरक्षित रहता है ।

कोयला और पेट्रोलियम :-

कोयला और पेट्रोलियम अनविकरणीय प्राकृतिक संसाधन हैं । इन्हें जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं ।

निर्माण :-

कोयला :- 300 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी में वनस्पति अवशेषों के अपघटन से कोयले का निर्माण हुआ ।
पेट्रोलियम :- पेट्रोलियम का निर्माण समुद्र में रहने वाले जीवों के मृत अवशेषों के अपघटन से हुआ । यह अपघटन उच्च दाब और उच्च ताप के कारण हुआ और पेट्रोलियम के निर्माण में लाखों वर्ष लगे ।
कोयला और पेट्रोल भविष्य में समाप्त हो जायेंगे ।

कोयला :- वर्तमान दर से प्रयोग करने पर कोयला अगले 200 वर्ष तक ही उपलब्ध रह सकता है ।
पेट्रोलियम :- वर्तमान दर से प्रयोग करने पर पेट्रोलियम केवल अगले 40 वर्षों तक ही मिलेगा ।

जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से होने वाली हानियाँ :-

वायु प्रदूषण :- कोयले और हाइड्रोकार्बन के दहन से बड़ी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड , कार्बन डाइऑक्साइड , नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्पन्न होती हैं जो वायु को प्रदूषित करती हैं ।

बीमारियाँ :- यह प्रदूषित वायु कई प्रकार की श्वसन समस्याएँ उत्पन्न करती है और कई रोग । जैसे :- दमा , खाँसी का कारण बनती हैं ।

वैश्विक ऊष्मण :- जीवाश्म ईंधनों के दहन से CO , गैस उत्पन्न होती है जो ग्रीन हाउस गैस है और विश्व ऊष्मणता उत्पन्न करती है ।

जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग में मितव्ययता बरतनी चाहिए क्योंकि :-

ये समाप्य और सीमित हैं ।
एक बार समाप्त होने के बाद ये निकट भविष्य में उपलब्ध नहीं हो पायेंगे क्योंकि इनके निर्माण की प्रक्रिया बहुत ही धीमी होती है और उसमें कई वर्ष लगते हैं ।

जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को सीमित करने के उपाय :-

जिन विद्युत उपकरणों का उपयोग नहीं हो रहा हो उनका स्विच बंद करें ।
घरों में CFL का उपयोग करें जिस से बिजली की बचत हो ।
निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करना ।
लिफ्ट की अपेक्षा सीढ़ी का उपयोग करना ।
जहाँ हो सके सोलर कुकर का प्रयोग करना ।


Class 10 science Chapter 16  Important Question Answer

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1: अपने घर को पर्यावरण – मित्र बनाने के लिए आप उसमे कौन -कौन परिर्वतन सुझा सकतें हैं?
उत्तर :-

कम उपयोग – इसका अर्थ हैं की आपको कम, से कम वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए करना चाहिए ; जैसे – बिजली के पंखे एवचं बल्ब का स्विच बंद कर देना , खराब नल की मरम्मत करना , ताकि जल व्यर्थ टपके आदि |
पुन : चक्रण – इसका अर्थ हैं की आपको प्लास्टिक , कागज और धातु की वस्तुओ को कचरे में नही फेकना चाहिए बल्कि उनका उपयोग करना चाहिए |
पुनः उपयोग – यह पुन : चक्रण से भी अच्छा तरीका है क्योंकि उसमे भी कुछ ऊर्जा व्यय होती है |इसमें हम किसी वस्तु का उपयोग बार – बार कर सकते है |
प्रश्न 2: इस अध्याय हमने देखा की जब वन हम वन एवं वन्य जन्तुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं | इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने के अधिकार दिए जा सकते हैं आप ऐसा क्यों सोचते हैं ?
उत्तर :-
वन एवं वन्य जन्तुओं के चारों दावेदारों में से वन के अन्दर एवं इसकेनिकते रहने वाले स्थानीय लोग सर्वाधिक उपयुक्त हैं , क्योकिं वे सदियों से वनों का उपयोग संपोषित तरीकों से करते चले आ रहे हैं | वे वृक्षों के ऊपर चढ़कर कुछ शाखाएं एवं पत्तियां ही काटते हैं , जिससे समय केव साथं – साथ उनका पुन : पूरण भी होता रहता हैं | इसके अनेक प्रमाण तथा बेकार कहे जाने वाले वन मूल्य 12.5 करोड़ आँका होगा |

प्रश्न 3:- अकेले व्यकित के रूप भिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम करने के लिए किया कर सकते है ?
उत्तर :
प्राकृतिकं पदों की खपत कम निम्न तरीको से की जा सकती है-

CFls का प्रयोग कर |
सौर कूकर , सौर जल उष्मक का प्रयोग कर कोयले करोसीन और LPG की बचत की जा सकती हैं |
टपकने वाले नलों की मरम्मत कर हम पानी की बचत कर सकते हैं |
रेड लाइट , पर कार या एनी वाहनों को बंद करके पेट्रोल / डीजल की बचत की जा सकती हैं |
6. “चिपको आन्दोलन” का क्या कारण था ?
उत्तर :
चिपको आन्दोलन स्थानीय निवासियों को वनों से अलग करने की नीति का परिणाम था | गाँव के समीप वृक्ष काटने का अधिकार ठेकेदारों को दे दिया गया था , इसीलिए चिपको आन्दोलन हुआ |
13.प्राकृतिक संसाधन किसे कहते है ?
उत्तर :
वे सभी पदार्थ जो हमें प्रकृति से प्राप्त होते है तथा जिनका हम उपयोग करते है प्राकृतिक संसाधन कहलाते है |

प्रश्न 14. खनन प्रदुषण किसे कहते है ?
उत्तर :
खनन प्रदुषण इसलिए होता है क्योंकि धातु के निष्कर्षण के साथ बड़ी मात्रा में धातुमल भी निकलता है |


Class 10 science Chapter 16  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. वे पदार्थ जो प्रदूषण का कारण बनते हैं या जिससे पर्यावरण में आने से उसके गुणों में अवांछित परिवर्तन होते हैं वे क्या कहलाते हैं ?
(a) प्रदूषण
(b) प्रदूषक
(c) संरक्षण
(d) प्रबंधन

► (b) प्रदूषक

2. भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में अवांछित परिवर्तन क्या कहलाता है ?
(a) प्रदूषक
(b) प्रदूषण
(c) पर्यावरण का संरक्षण
(d) प्राकृतिक संसाधन

► (b) प्रदूषण

3. गंगा कार्य योजना ,एक बहु करोड़ीय प्रोजैक्ट का आरम्भ कब किया गया ?
(a) 1972
(b) 1984
(c) 1985
(d) 1992

► (c) 1985

4. जल में कोलिफार्म जीवाणुओं की उपस्थिति जल के किस रूप के संदूषित होने की ओर संकेत करती है ?
(a) घरेलू कचरा
(b) रासायनिक प्रदूषक
(c) भौतिक प्रदूषक
(d) सीवेज जल

► (d) सीवेज जल
5. कौन सा विकास कार्य प्राकृतिक स्रोतों को बिना गवाएँ तथा पर्यावरण को बिना किसी भी प्रकार की हानि के होता है ?
(a) प्रबंधन
(b) संसोधन
(c) संपोषित
(d) संरक्षण

► (c) संपोषित

6. प्रकृति में पाए जाने वाले जन्तु ,पौधे ,उनकी प्रजातियाँ ,जिन्हें पाला या उगाया नहीं जाता वह क्या कहलाता है ?
(a) वनीकरण
(b) जैव-विविधता
(c) वन्य जीवन
(d) संरक्षण

► (c) वन्य जीवन

7. निम्न में से 3-R का क्या अर्थ है ?
(a) कम उपयोग
(b) पुन: चक्रण
(c) पुन: उपयोग
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

8. गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा की कुल लम्बाई कितनी है ?
(a) 1500 कि.मी.
(b) 2000 कि.मी.
(c) 2500 कि.मी.
(d) 1000 कि.मी.

► (c) 2500 कि.मी.

9. किसी क्षेत्र विशेष में बहुत सारे पेड़ लगाकर ,वन क्षेत्र विकसित करने की क्रिया को क्या कहा जाएगा ?
(a) वन्य
(b) वनोंरोपण
(c) वनीकरण
(d) पर्यावरण

► (c) वनीकरण

10. भारत का कितना भू -भाग वनों से ढका होना चाहिए ?
(a) 20%
(b) 25%
(c) 33%
(d) 34%

► (c) 33%

11. असंदूषित जल का pH मान क्या होगा ?
(a) 2
(b) 5
(c) 7
(d) 9

► (c) 7

12. कौन सा भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान सन 1935 में स्थापित किया गया था ?
(a) राजा जी राष्ट्रीय उद्यान
(b) जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(c) रणथंभोर राष्ट्रीय उद्यान
(d) गिर राष्ट्रीय उद्यान

► (b) जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

13. कौन सा भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान सन 1935 में स्थापित किया गया था ?
(a) राजा जी राष्ट्रीय उद्यान
(b) जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(c) रणथंभोर राष्ट्रीय उद्यान
(d) गिर राष्ट्रीय उद्यान

► (b) जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

14. 1970 में चिपको आंदोलन,की शुरुआत गढ़वाल (उतराखंड) के किस गाँव से हुई ?
(a) श्री नगर
(b) टिहरी
(c) ऋषिकेश
(d) रेनी

► (d) रेनी

15. चंडीगढ़ में स्थित पक्षी विहार कहाँ है ?
(a) छत बीड़
(b) रोज गईन
(c) सुखना झील
(d) लेजर वैली

► (c) सुखना झील

16. कूल्हों के द्वारा नहरी सिंचाई व्यवस्था किस प्रदेश में हैं ?
(a) पंजाब
(b) तमिलनाडु
(c) गुजरात
(d) हिमाचल प्रदेश

► (d) हिमाचल प्रदेश

17. ‘चिपको आंदोलन’ का नेतृत्व किसने किया ?
(a) सुंदर लाल बहुगुणा
(b) हेमवती नंदन बहुगुणा
(c) मेघा पाटकर
(d) अरुणधती रॉय

► (a) सुंदर लाल बहुगुणा

18. इंदिरा गाँधी नहर के कारण किस प्रदेश में हरियाली आई है ?
(a) गुजरात
(b) पंजाब
(c) राजस्थान
(d) हरियाणा

► (c) राजस्थान


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Class 10 Science Chapter 14 Notes in Hindi | ऊर्जा के स्रोत

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NCERT class 10 science Chapter 14 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 14 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 14

ऊर्जा के स्रोत

sources of energy


ऊर्जा :-

कार्य करने की क्षमताऊर्जा कहलाती है।यह एक अदीश राशि है तथा इसका S.I मात्रक “जुल” होता है।

ऊर्जा के स्त्रोत :-

वैसी वस्तु जिनसे हमें ऊर्जा प्राप्त होती है , उसे ऊर्जा के स्त्रोत कहते है । जैसे :- कोयला , यूरेनियम , सूर्य , हवा , लकड़ी आदि ।

ऊर्जा की आवश्यकता :-

प्रकाश संश्लेषण
भोजन पकाने के लिये ।
( CFL , LED , बल्ब ) प्रकाश उत्पन्न करने के लिए ।
यातायात के लिए ।
मशीनों को चलाने के लिए ।
उद्योगों एवं कृषि कार्य में ।

ऊर्जा के उत्तम स्रोत के लक्षण :-

प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अधिक कार्य करे । ( उच्च कैलोरोफिक माप )
सस्ता एवं सरलता से सुलभ हो ।
भण्डारण तथा परिवहन में आसान हो ।
प्रयोग करने में आसान तथा सुरक्षित हो ।
पर्यावरण को प्रदूषित न करे ।

ईंधन :-

वह पदार्थ जो जलने पर ऊष्मा तथा प्रकाश देता है , ईंधन कहलाता है ।

अच्छे ईंधन के गुण :-

उच्च कैलोरोफिक माप
अधिक धुआँ या हानिकारक गैसें उत्पन्न न करे ।
मध्यम ज्वलन ताप होना चाहिए ।
सस्ता व आसानी से उपलब्ध हो ।
आसानी से जले ।
भडारण व परिवहन में आसान हो ।

ऊर्जा के स्रोत :-

पारंपरिक स्रोत
वैकल्पिक / गैर पारंपरिक स्रोत
पारंपरिक स्रोत जैसे :-

जीवाश्म ईंधन ( कोयला , पेट्रोलियम )
तापीय विद्युत संयंत्र
जल विद्युत संयंत्र
जैव मात्रा ( बायो मास )
पवन ऊर्जा
वैकल्पिक / गैर पारंपरिक स्रोत जैसे :-

सौर ऊर्जा ( सौर कुकर सौर पैनल )
समुद्रों से ऊर्जा – ज्वारीय , तरंग , महासागरीय
भूतापीय ऊर्जा
नाभिकीय ऊर्जा

ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत :-

ऊर्जा के वे स्रोत जो जनसाधारण द्वारा लंबे समय से प्रयोग किए जाते रहे हैं , ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत कहलाते हैं । उदाहरण :- जीवाश्म ईंधन , जैव- मात्रा , जलीय ऊर्जा , पवन ऊर्जा । इनका उपयोग बहुत से कार्य क्षेत्रों में होता है ।

जीवाश्म ईंधन :-

जीवाश्म से प्राप्त ईंधन जैसे – कोयला , पैट्रोलियम , जीवाश्म ईंधन कहलाते हैं ।

लाखों वर्षों में उत्पादन , सीमित भण्डारण , अनवीकरणीय स्रोत ।

भारतवर्ष में विश्व का 6% कोयला भण्डार है जो कि वर्तमान दर से खर्च करने पर अधिकतम 250 वर्षों तक बने रहेंगे ।

जीवाश्म ईंधन जलाने पर उत्पन्न प्रदूषण / हानियाँ :-

जीवाश्म ईंधन के जलने से मुक्त कार्बन , नाइट्रोजन एवं सल्फर के ऑक्साइड वायुप्रदूषण तथा अम्लवर्षा का कारण बनते हैं जोकि जल एवं मृदा के संसाधनों को प्रभावित करती है ।

उत्पन्न कार्बन डाइ – ऑक्साइड ग्रीन हाउस प्रभाव को उत्पन्न करती है जिससे कि धरती पर अत्यधिक गर्मी हो जाती है ।

जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न प्रदूषण को कम करने के उपाय :-

जीवाश्मी ईंधन के जलाने के कारण उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को कुछ सीमाओं तक दहन प्रक्रम की दक्षता में वृद्धि करके कम किया जा सकता ।
विविध तकनीकों का प्रयोग कर , दहन के फलस्वरूप उत्पन्न गैसों के वातावरण में पलायन को कम करना ।

तापीय विद्युत संयंत्र :-

जीवाश्म ईंधन को जलाकर तापीय ऊर्जा घरों में ताप विद्युत उत्पन्न की जाती है ।

तापीय विद्युत संयत्र कोयले तथा तेल के क्षेत्रों के निकट स्थापित किए जाते हैं , जिससे परिवहन पर होने वाले व्यय को कम कर सकें ।

जल विद्युत संयंत्र :-

जल विद्युत संयंत्रों में गिरते जल की स्थितिज ऊर्जा को विद्युत में रूपांतरित किया जाता है ।

चूँकि ऐसे जल प्रपातों की संख्या बहुत कम है जिनका उपयोग स्थितिज ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जा सके , अतः जल विद्युत संयंत्रों को बाँधों से संबद्ध किया गया है ।

भारत में ऊर्जा की मांग का 25 % की पूर्ति जल – विद्युत संयत्रों से की जाती है ।

जल द्वारा विद्युत उत्पादन होना :-

जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदियों के बहाव को रोककर बड़े जलाशयों ( कृत्रिम झीलों ) में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे – ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं । इन जलाशयों में जल संचित होता रहता है जिसके फलस्वरूप इनमें भरे जल का तल ऊँचा हो जाता है ।

बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल , बाँध के आधार के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिरता है फलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूर्णन गति करते हैं और जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है ।

जल विद्युत संयंत्र से लाभ :-

पर्यावरण को कोई हानि नहीं ।
जल विद्युत ऊर्जा एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है ।
बाँधों के निर्माण से बाढ़ रोकना , सिंचाई करना सुलभ तथा मत्स्य आवर्धन संभव है ।
जल विद्युत संयंत्र से हानियाँ :-

बाँधों के निर्माण से कृषियोग्य भूमि तथा मानव आवास डूबने के कारण नष्ट हो जाते हैं ।
पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो जाते हैं ।
पेड़ पौधों , वनस्पति का जल में डूबने से अवायवीय परिस्थितियों में सड़ने से मीथेन गैस का उत्पन्न होना जो कि ग्रीन हाउस गैस है ।
विस्थापित लोगों के संतोषजनक पुनर्वास की समस्या ।
ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों के उपयोग के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार

जैव मात्रा ( बायो मास ) :-

कृषि व जन्तु अपशिष्ट जिन्हें ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है जैसे – लकड़ी , गोबर , सूखे तने , पत्ते आदि ।

लकड़ी :- लकड़ी जैव मात्रा का एक रूप है जिसे लम्बे समय से ईंधन के रुप में प्रयोग किया जाता है ।

लकड़ी से हानियाँ :-

जलने पर बहुत अधिक धुआँ उत्पन्न करती है जो स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं ।
अधिक ऊष्मा का न देना
अत : उपकरणों की तकनीकी में सुधार करके परंपरागत ऊर्जा स्रोतों की दक्षता बढ़ाई जा सकती है । जैसे :- लकड़ी से चारकोल बनाना ।

चारकोल :- लकड़ी को वायु की सीमित आपूर्ति में जलाने से उसमें उपसिथत जल तथा वाष्पशील पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और अवशेष के रुप में चारकोल प्राप्त होता है ।

चारकोल , लकड़ी से बेहतर ईंधन क्यों है :-

चारकोल , लकड़ी से बेहतर ईंधन है क्योंकि :-
बिना ज्वाला के जलता है ।
अपेक्षाकृत कम धुआँ निकलता है ।
ऊष्मा उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है ।
गोबर के उपले :- जैव मात्रा का एक रूप है परन्तु ईंधन के रूप में प्रयोग करने में कई हानियाँ होती है , जैसे :-

बहुत अधिक धुआँ उत्पन्न करना ।
पूरी तरह दहन न होने के कारण राख का बनना ।
परन्तु तकनीकी सहायता से , गोबर का उपयोग गोबर गैस संयत्र में होने पर वह एक सस्ता व उत्तम ईंधन बन जाता है ।

बायो गैस :-

गोबर , फसलों के कटने के पश्चात बचे अवशिष्ट , सब्जियों के अपशिष्ट तथा वाहित मल जब ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपघटित होते हैं तो बायो गैस का निर्माण होता है ।

अपघटन के फलस्वरूप मेथैन , कार्बन डाई – आक्साइड , हाइड्रोजन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें उत्पन्न होती हैं । जैव गैस को संपाचित्र के ऊपर बनी टंकी में संचित किया जाता है , जिसे पाइपों द्वारा उपयोग के लिए निकाला जाता है ।

बायो गैस बनाने की विधि :-

जैव गैस बनाने के लिए मिश्रण टंकी में गोबर तथा जल का एक गाढ़ा घोल , जिसे कर्दम कहते हैं बनाया जाता है जहाँ से इसे संपाचित्र में डाल देते हैं ।
संपाचित्र चारों ओर से बंद एक कक्ष होता है जिसमें ऑक्सीजन नहीं होती ।
अवायवीय सूक्ष्मजीव जिन्हें जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती , गोबर की स्लरी के जटिल यौगिकों का अपघटन कर देते हैं ।
अपघटन – प्रक्रम पूरा होने तथा इसके फलस्वरूप मेथैन , कार्बन डाइऑक्साइड , हाइड्रोजन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें उत्पन्न होने में कुछ दिन लगते हैं ।
जैव गैस को संपाचित्र के ऊपर बनी गैस टंकी में संचित किया जाता है ।
जैव गैस को गैस टंकी से उपयोग के लिए पाइपों द्वारा बाहर निकाल लिया जाता है ।

बायो गैस के लाभ :-

जैव गैस एक उत्तम ईंधन है क्योंकि इसमें 75 % तक मेथैन गैस होती है ।
धुआँ उत्पन्न किए बिना जलती है ।
जलने के पश्चात कोयला तथा लकड़ी की भांति राख जैसा अपशिष्ट शेष नहीं बचता ।
तापन क्षमता का उच्च होना ।
बायो गैस का प्रयोग प्रकाश के स्रोत के रूप में किया जाता है ।
संयंत्र में शेष बची स्लरी में नाइट्रोजन तथा फास्फोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं जो कि उत्तम खाद के रूप में काम आती है ।
अपशिष्ट पदार्थों के निपटारे का सुरक्षित उपाय है ।

बायो गैस दोहन की सीमाऐं :-

अधिक प्रारंभिक लागत ।
अत्याधिक मात्रा में गोबर की खपत ।
रखरखाव पर अधिक खर्च 

पवन ऊर्जा :-

सूर्य विकिरणों द्वारा भूखंडों तथा जलाशयों के असमान गर्म होने के कारण वायु में गति उत्पन्न होती है तथा पवनों का प्रवाह होता है ।

पवनों की गतिज ऊर्जा का उपयोग पवन चक्कियों द्वारा निम्न कार्यों में किया जाता है । जैसे :-

जल को कुओं से खींचने में
अनाज चक्कियों के चलाने में
टरबाइन को घूमाने में जिससे जनित्र द्वारा वैद्युत उत्पन्न की जा सके ।
परंतु एकल पवन चक्की से बहुत कम उत्पादन होता है , इसीलिए बहुत सारी पवन चक्कियों को एक साथ स्थापित किया जाता है और यह स्थान पवन ऊर्जा फार्म कहलाता है ।

पवन चक्की चलाने हेतु पवन गति 15-20 किमी प्रति घंटा होनी आवश्यक है ।

डेनमार्क को ” पवनों का देश ” कहते हैं ।

भारत का पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पन्न करने में 5 वाँ स्थान है ।

तमिलनाडु में कन्याकुमारी के निकट भारत का विशालतम पवन ऊर्जा फार्म स्थापित किया गया है जो 380 MW विद्युत उत्पन्न करता है ।

पवन ऊर्जा के लाभ :-

पर्यावरण हितैषी होती है ।
नवीकरणीय ऊर्जा का उत्तम स्रोत ।
विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने में बार – बार खर्चा या लागत न होना ।
पवन ऊर्जा की सीमाएँ :-

पवन ऊर्जा फार्म के लिए अत्यधिक भूमिक्षेत्र की आवश्यकता ।
लगातार 15-20 किमी घंटा पवन गति की आपूर्ति होना ।
अत्यधिक प्रारम्भिक लागत होना ।
पवन चक्की के ब्लेड्स की प्रबंधन लागत अधिक होना ।

वैकल्पिक / गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत :-

प्रौद्योगिकी में उन्नति के साथ ही ऊर्जा की माँग में दिन – प्रतिदिन वृद्धि है । अत : ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता है ।

गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत उपयोग करने का कारण :-

जीवाश्म ईंधन सीमित मात्रा में उपलब्ध है , यदि वर्तमान दर से हम उनका उपयोग करते रहे तो वे शीघ्र समाप्त हो जायेंगे ।
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने हेतु जिससे कि वे लम्बे समय तक चल सकें ।
पर्यावरण को बचाने व प्रदूषण दर को कम करने हेतु ।

सौर ऊर्जा :-

सूर्य ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है । सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं ।

सौर स्थिरांक :-

पृथ्वी के सतह पर प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफल पर 1 सेकेण्ड में आने वाली सौर ऊर्जा को सौर स्थिरांक कहते हैं । इसका मान 1.4 kW/m² है । सौर स्थिरांक – 1.4 kJ/s/m² or 1.4 kW/m²

सौर ऊर्जा युक्तियाँ :-

सौर ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में एकत्रित करके उपयोग करना ।

सौर कुकर
सौर जल तापक
सौर सैल – सौर ऊर्जा को विद्युत में रूपांतरित करना ।

सौर तापक युक्तियों में :-

काला पृष्ठ अधिक ऊष्मा अवशोषित करता है अतः इन युक्तियों में काले रंग का प्रयोग किया जाता है ।
सूर्य की किरणों फोकसित करने के लिए दर्पणों तथा काँच की शीट का प्रयोग किया जाता है जिससे पौधाघर प्रभाव उत्पन्न हे जाता है तथा उच्च ताप उत्पन्न हो जाता है ।

बाक्स रूपी सौर कुकर :-

ऊष्मारोधी पदार्थ का बक्सा लेकर आंतरिक धरातल तथा दीवारों पर काला पेन्ट करते हैं । बाक्स को काँच की शीट से ढकते हैं । समतल दर्पण को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि अधिकतम सूर्य का प्रकाश परावर्तित होकर बाक्स में उच्चताप बना सके । 2-3 घंटे में बाक्स के अन्दर का ताप 100°C – 140°C तक हो जाता है ।

बाक्स रूपी सौर कुकर के लाभ :-

कोयला / पैट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों की बचत ।
प्रदूषण नहीं फैलता ।
खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व नष्ट नहीं होते ।
एक से अधिक भोजन एक साथ बनाया जा सकता है ।
बाक्स रूपी सौर कुकर की हानियाँ :-

रात के समय सौर कुकर का उपयोग नहीं किया जा सकता ।
बारिश के समय इसका उपयोग नहीं किया जा सकता ।
सूर्य के प्रकाश का निरंतर समायोजन करना आवश्यक है ताकि यह उसके दर्पण पर सीधा पड़े ।
तलने व बेकिंग हेतु उपयोग नहीं कर सकते ।

सौर सेल :-

सौर सेल सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत में रूपान्तरित करते हैं ।

एक प्ररुपी सौर सेल 0.5 से 1V देता है जो लगभग 0.7 W ( विद्युत शक्ति ) उत्पन्न कर सकता है ।

जब बहुत अधिक संख्या में सौर सेलों को संयोजित करते हैं तो यह व्यवस्था सौर पैनल कहलाती है ।

सोलर सैल के ( लाभ ) :-

सौर सेलों के साथ संबद्ध प्रमुख लाभ यह है इनमें कोई भी गतिमान पुरजा नहीं होता , इनका रखरखाव सस्ता है तथा ये बिना किसी फोकसन युक्ति के काफी संतोषजनक कार्य करते हैं ।

सौर सेलों के उपयोग करने का एक अन्य लाभ यह है कि इन्हें सुदूर तथा अगम्य स्थानों में स्थापित किया जा सकता है । तथा यह पर्यावरण हितैषी है ।

सोलर सैल की ( हानियाँ ) :-

उत्पादन की प्रक्रिया महंगी ।
विशिष्ट श्रेणी के सिलिकॉन की उपलब्धता सीमित ।
सौर सेलों को परस्पर संयोजित करने हेतु प्रयुक्त सिल्वर अत्यन्त महंगा ।
सौर सेल के उपयोग :-

मानव निर्मित उपग्रहों में सौर सेलों का उपयोग ।
रेडियो तथा बेतार संचार यंत्रों , सुदूर क्षेत्रों के टी . वी . रिले केन्द्रों में सौर सेल पैनल का उपयोग होता है ।
ट्रेफिक सिग्नलों , परिकलन तंत्र ( Calculator ) तथा बहुत से खिलौनों में सौर सेल का उपयोग ।

समुद्री से ऊर्जा :-

ज्वारीय ऊर्जा
तरंग ऊर्जा
महासागरीय तापीय ऊर्जा

ज्वारीय ऊर्जा :-

ज्वार भाटे में जल के स्तर के चढ़ने और गिरने से ज्वारीय ऊर्जा प्राप्त होती । ज्वारीय ऊर्जा का दोहन सागर के किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बांध का निर्माण करके किया जाता है ।

ज्वारीय ऊर्जा की सीमाएँ :- बाँध निर्मित किए जा सकने वाले स्थान सीमित हैं ।

तरंग ऊर्जा :-

समुद्र तट के निकट विशाल तरंगों की गतिज ऊर्जा का प्रयोग कर विद्युत उत्पन्न की जाती है । तरंग ऊर्जा से टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिए उपयोग होता है ।

तरंग ऊर्जा की सीमाएँ :- तरंग ऊर्जा का व्यावहारिक उपयोग वहीं संभव है जहाँ तंरगें अत्यंत प्रबल हों ।

महासागरीय तापीय ऊर्जा :-

ताप में अंतर का उपयोग ( पृष्ठ जल तथा गहराई जल में ताप का अंतर ) सागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण विद्युत संयंत्र ( OTEC ) में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है ।

पृष्ठ के तप्त जल का उपयोग अमोनिया को उबालने में किया जाता है । द्रवों की वाष्प जनित्र के टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करती है ।

महासागरीय तापीय ऊर्जा की सीमाएँ :- महासागरीय तापीय ऊर्जा का दक्षतापूर्ण व्यापारिक दोहन अत्यन्त कठिन है ।

भूतापीय ऊर्जा :-

‘ भू ‘ का अर्थ है ‘ धरती ‘ तथा ‘ तापीय ‘ का अर्थ है ‘ ऊष्मा ‘ पृथ्वी के तप्त स्थानों पर भू – गर्भ में उपस्थित ऊष्मीय ऊर्जा को भूतापीय ऊर्जा कहते हैं ।

जब भूमिगत जल तप्त स्थलों के संपर्क में आता है तो भाप उत्पन्न होती है । जब यह भाप चट्टानों के बीच में फंस जाती ही तो इसका दाब बढ़ जाता है । उच्च दाब पर यह भाप पाइपों द्वारा निकाली जाती है जो टरबाइन को घुमाती है तथा विद्युत उत्पन्न की जाती है ।

भूतापीय ऊर्जा के लाभ :-

इसके द्वारा विद्युत उत्पादन की लागत अधिक नहीं है ।
इससे प्रदूषण नहीं होता ।

भूतापीय ऊर्जा की सीमाएँ :-

भूतापीय ऊर्जा सीमित स्थानों पर ही उपलब्ध है ।
तप्त स्थलों की गहराई में पाइप पहुँचाना मुश्किल एवं महँगा होता है ।
न्यूजीलैंड तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में भूतापीय ऊर्जा पर आधारित कई विद्युत शक्ति संयंत्र कार्य कर रहे हैं ।

तप्त स्थल :-

भौमिकीय परिवर्तनों के कारण भूपर्पटी में गहराइयों पर तप्त क्षेत्रों में पिघली चट्टानें ऊपर धकेल दी जाती हैं जो कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो जाती हैं । इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते है ।

नाभिकीय ऊर्जा :-

नाभिकीय अभिक्रिया के दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है ।

यह ऊर्जा दो प्रकार की अभिक्रियाओं द्वारा प्राप्त की जा सकती है :-

नाभिकीय विखंडन
नाभिकीय संलयन

नाभिकीय विखंडन :-

विखंडन का अर्थ है टूटना । नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें भारी परमाणु ( जैसे :- यूरेनियम , प्लूटोनियम अथवा थोरियम ) के नाभिक को निम्न उर्जा न्यूट्रान से बमबारी कराकर हल्के नाभिकों में तोड़ा जाता है । इस प्रक्रिया में विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है ।

यूरेनियम – 235 का प्रयोग छड़ों के रूप में नाभिकीय संयंत्रों में ईंधन की तरह होता है ।

कार्यशैली :-

नाभिकीय संयंत्रों में , नाभिकीय ईंधन स्वपोषी विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया का एक भाग होते हैं , जिसमें नियंत्रित दर पर ऊर्जा मुक्त होती है । इस मुक्त ऊर्जा का उपयोग भाप बनाकर विद्युत उत्पन्न करने में किया जाता है ।

नाभिकीय विद्युत संयंत्र :-

तारापुर ( महाराष्ट्र )
राणा प्रताप सागर ( राजस्थान )
कलपक्कम ( तमिलनाडु )
नरौरा ( उत्तर प्रदेश )
काकरापार ( गुजरात )
कैगा ( कर्नाटक )

नाभिकीय संलयन :-

दो हल्के नाभिकों ( सामान्यतः हाइड्रोजन ) को जोड़कर एक भारी नाभिक ( हीलियम ) बनाना जिसमें भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न हो , नाभिकीय संलयन कहलाती है ।

₁²H + ₁²H → ₂³He + ₀¹n + ऊष्मा

नाभिकीय संलयन हेतु अत्याधिक ताप व दाब की आवश्यकता होती है । सूर्य तथा अन्य तारों की विशाल ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन है । हाइड्रोजन बम भी ‘ नाभिकीय संलयन अभिक्रिया ‘ पर आधारित होता है ।

नाभिकीय ऊर्जा के लाभ :-

नाभिकीय ईंधन की अल्प मात्रा के विखंडन से ऊर्जा की अत्याधिक मात्रा मुक्त होती है ।
CO₂ जैसी ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न नहीं होती ।

नाभिकीय ऊर्जा के सीमाएँ :-

नाभिकीय विद्युत शक्ति संयंत्रों के प्रतिष्ठापन की अत्याधिक लागत है ।
नाभिकीय विकिरण के रिसाव का डर बना रहता है ।
नाभिकीय अपशिष्टों के समुचित भंडारण तथा निपटारा न होने की अवस्था में पर्यावरण संदूषण का खतरा ।
यूरेनियम की सीमित उपलब्धता ।

पर्यावरण विषयक सरोकार :-

किसी भी प्रकार की ऊर्जा का अधिक प्रयोग करने से वातावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है । अत : हमें ऐसे ऊर्जा स्रोत का ध्यान करना चाहिए जिससे , ऊर्जा प्राप्त करने में सरलता हो , सस्ता हो , प्रदूषण मुक्त हो तथा , ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करने की उपलब्ध प्रौद्योगिकी की दक्षता हो ।

दूसरे शब्दों में , ऊर्जा का कोई भी स्रोत पूर्णतः प्रदूषण मुक्त नहीं है । हम यह कह सकते हैं कि कोई स्रोत दूसरे स्रोत की अपेक्षा अधिक स्वच्छ है ।

उदाहरण :- सौर सेल का वास्तविक प्रचालन प्रदूषण मुक्त है परन्तु यह हो सकता है कि युक्ति के संयोजन में पर्यावरणीय क्षति हुई हो ।

अनवीकरणीय स्रोत :-

इस प्रकार के स्रोतों को जो किसी न किसी दिन समाप्त हो जाएँगे , उन्हें ऊर्जा के समाप्य स्रोत अथवा अनवीकरणीय स्रोत कहते हैं ।

नवीकरणीय स्रोत :-

इस प्रकार के ऊर्जा स्रोत जिनका पुनर्जनन हो सकता है , उन्हें ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत कहते हैं ।


Class 10 science Chapter 14  Important Question Answer

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01. हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों कि ओर क्यों ध्यान दे रहे है ?
उत्तर –
हम जानते है कि जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत है | अतः इन्हें बचाने कि आवश्यकता है | पृथ्वी के अंदर कोयले , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस आदि सीमित मात्रा में मौजूद है | यदि हम इनका प्रयोग इसी प्रकार करते रहे तो ये शीघ्र ही समाप्त हो जाएंगे | अतः हमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों कि ओर ध्यान देना चाहिए |

02. भूतापीय ऊर्जा क्या है ?
उत्तर –
जब भूमिगत जल तप्त स्थलों के संपर्क में आता है तो भाप उत्पन्न होती है | जब यह भाप चट्टानों के बीच फंस जाती हैं तो इसका दाब बढ़ जाता है | उच्च दाब पर यह भाप पाइपों द्वारा निकाल ली जाती है, यह भाप विद्युत जनरेटर की टरबाइन को घुमती है तथा विद्युत उत्पन्न की जाती है | इन तप्त स्थलों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा कहलाती है |

03. सौर कूकर के लिए कौन सा दर्पण – अवतल , उत्तल , अथवा समतल – सर्वाधिक उपयुक्त है ?
उत्तर –
सौर कूकर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दर्पण अवतल दर्पण है , क्योंकि यह एक अभिसारी दर्पण है | जो सूर्य कि किरणों को एक बिन्दु पर फोकसित करता है ,जिसके कारण शीघ्र ही इसका ताप और बढ़ जाता है |

04. नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्व है ?
उत्तर –
नाभिकीय ऊर्जा से उत्पन्न ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते है | इस प्रकिया के द्वारा अत्याधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है | इस ऊर्जा का उपयोग भाप बनाकर विद्युत् उत्पन्न करने में किया जाता है |

05. क्या कोई ऊर्जा स्रोत प्रदुषण मुक्त हो सकता है ? क्यों अथवा क्यों नही ?
उत्तर
नही , ऐसा कोई ऊर्जा का स्रोत नही है जो प्रदुषण मुक्त हो | सौर सेल हालाँकि प्रदुषण मुक्त है परन्तु उस युक्ति को जुटाने में पर्यावरण क्षति ग्रस्त हो सकता है |

 


Class 10 science Chapter 14  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. प्राचीन काल में ऊष्मीय ऊर्जा का सबसे अधिक सामान्य स्त्रोत क्या था ?
(a) LPG
(b) जैव गैस
(c) लकड़ी
(d) कोयला

► (c) लकड़ी

2. उत्तम ऊर्जा का स्त्रोत कौन-सा होता है ?
(क) जो प्रति एंकाक आयतन अथवा प्रति एंकाक द्रव्यमान अधिक कार्य करे
(b) सरलता से सुलभ हो सके
(c) भंडारण में आसान तथा सस्ता हो
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

3. जीवाश्मी ईंधन क्या है ?
(a) परंपरागत ऊर्जा स्त्रोत
(b) ऊर्जा के समाव्य स्त्रोत
(c) ऊर्जा के अनवीकरण स्त्रोत
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

4. जीवाश्मी ईंधनों के दहन से कौन-सी प्रदूषक गैस उत्पन्न होती है ?
(a) कॉर्बन मोनोऑक्साइड
(b) सल्फर डाइऑक्साइड
(c) नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

5. निम्नलिखित में से जीवाश्मी ईंधन कौन-से हैं ?
(a) कोयला
(b) पेट्रोलियम
(c) जल
(d) (a) और (b) दोनों

► (d) (a) और (b) दोनों
6. बहते हुए पानी में किस प्रकार की ऊर्जा निहित होती है ?
(a) नाभिकीय ऊर्जा
(b) ऊष्मीय ऊर्जा
(c) गतिज ऊर्जा
(d) यांत्रिक ऊर्जा

► (c) गतिज ऊर्जा

7. डायनेमो किससे विद्युत उत्पादित करता है ?
(a) गतिज ऊर्जा
(b) यांत्रिक ऊर्जा
(c) स्थितिज ऊर्जा
(d) ऊष्मीय ऊर्जा

► (b) यांत्रिक ऊर्जा

8. किसी ऊँचाई पर स्थित जल में कैसी ऊर्जा होती है ?
(a) गतिज ऊर्जा
(b) ऊष्मीय ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) स्थितिज ऊर्जा

► (d) स्थितिज ऊर्जा

9. जल विद्युत संयंत्र में स्थितिज ऊर्जा का परिवर्तन किस प्रकार की ऊर्जा में होता है ?
(a) विद्युत ऊर्जा
(b) यांत्रिक ऊर्जा
(c) रासायनिक ऊर्जा
(d) गतिज ऊर्जा

► (a) विद्युत ऊर्जा

10. जल विद्युत संयंत्र में ऊर्जा का स्त्रोत क्या है ?
(a) सूर्य का प्रकाश
(b) पेट्रोलियम उत्पाद
(c) कोयला
(d) जल

► (d) जल

11. जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए बड़े जलाशयों में जल एकत्र करने के लिए क्या बनाए जाते हैं ?
(a) झरने
(b) तालाब
(c) स्तंभ
(d) बाँध

► (d) बाँध

12. भारत में हमारी ऊर्जा की माँग के चौथाई भाग की पूर्ति किस संयंत्र दवारा होती है ?
(a) तापीय विदयुत संयंत्र
(b) जल विद्युत संयंत्र
(c) पवन ऊर्जा
(d) नाभिकीय ऊर्जा

► (b) जल विद्युत संयंत्र

13. बाँधों के निर्माण के साथ कौन-कौन सी समस्याएँ जुड़ी हैं ?
(a) कृषियोग्य भूमि तथा मानव आवास नष्ट हो जाते हैं
(b) बड़े-बड़े पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो जाते हैं
(c) पेड़-पौधे सड़ने पर मेथेन गैस उत्पन्न करते हैं
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

14. निम्नलिखित में से कौन नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोत है ?
(a) जल विद्युत ऊर्जा
(b) तापीय विद्युत ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) (b) और (c) दोनों

► (a) जल विद्युत ऊर्जा

15. टिहरी बाँध कौन-सी नदी पर बना हुआ है ?
(a) गंगा नदी
(b) सतलुज नदी
(c) नर्मदा नदी
(d) कावेरी नदी

► (a) गंगा नदी

16. सरदार सरोवर बाँध कौन-सी नदी पर है ?
(a) गंगा नदी
(b) सतलुज नदी
(c) नर्मदा नदी
(d) कावेरी नदी

► (c) नर्मदा नदी

17. जब लकड़ी को वायु की सीमित आपूर्ति में जलाते हैं तो उसमें अवशेष के रूप में क्या रह जाता है ?
(a) चारकोल
(b) वुड गैस
(c) पेट्रोल
(d) जल

► (a) चारकोल

18. चारकोल की क्या विशेषताएँ हैं ?
(a) बिना ज्वाला के जलता है
(b) कम धुआँ निकलता है
(c) अधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी


 

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Class 10 Science Chapter 15 Notes in Hindi | हमारा पर्यावरण

Class 10 Science chapter 15 Notes in Hindi : covered science chapter 15 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि –  हमारा पर्यावरण क्या है किसे कहते है, पर्यावरण का अर्थ क्या होता है, पारितंत्र किसे कहते है, पारितंत्र के कितने प्रकार होते है, पारितंत्र के घटक किसे कहते है, अजैविक घटक क्या है, जैविक घटक क्या है किसे कहते है, आहार श्रृंखला किसे कहते है, ओजोन परत किसे कहते है, कचरा प्रबंधन क्या किसे कहते है? 

Class 10 Science chapter 15 Notes in Hindi full details

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Chapter Name Class 10 our environment (हमारा पर्यावरण)
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NCERT class 10 science chapter 15 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 15 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 15

हमारा पर्यावरण

our environment


पर्यावरण का अर्थ :-

परि ( आस – पास ) + आवरण ( घेरे हुए ) । वह आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं या हमारे चारों ओर का वह वातावरण या परिवेश जिसमें हम रहते हैं , पर्यावरण कहलाता है ।

पारितंत्र :-

एक क्षेत्र के सभी जीव व अजैविक घटक मिलकर एक पारितंत्र का निर्माण करते हैं । इसलिए एक पारितंत्र जैविक ( जीवित जीव ) व अजैविक घटक ; जैसे :- तापमान , वर्षा , वायु , मृदा आदि से मिलकर बनता है ।

पारितंत्र के प्रकार :-

इसके दो प्रकार होते हैं ।

प्राकृतिक पारितंत्र :- पारितंत्र जो प्रकृति में विद्यमान हैं । प्राकृतिक पारितंत्र कहलाते हैं । उदाहरण :- जंगल , सागर , झील ।

मानव निर्मित पारितंत्र :- जो पारितंत्र मानव ने निर्मित किए हैं , उन्हें मानव निर्मित पारितंत्र कहते हैं । उदाहरण :- खेत , जलाशय , बगीचा ।

पारितंत्र के घटक :-

अजैविक घटक
जैविक घटक

अजैविक घटक :-

प्रकृति के वे घटक जिनमें जीवन नहीं है , किंतु जीवन को आधार प्रदान करती हैं अजैविक घटक कहलाते हैं ।

सभी निर्जीव घटक जैसे :- हवा , पानी , भूमि , प्रकाश और तापमान आदि मिलकर अजैविक घटक बनाते हैं ।

जैविक घटक :-

प्रकृति के वे घटक जिनमें जीवन है , जैविक घटक कहलाते हैं । जैसे :- पशु – पक्षी , जन्तु , पेड़ – पौधे , सूक्ष्मजीव आदि ।

सभी सजीव घटक जैसे :- पौधे , जानवर , सूक्ष्मजीव , फफूंदी आदि मिलकर जैविक घटक बनाते हैं ।

आहार के आधार पर जैविक घटकों को उत्पादक , उपभोक्ता , अपघटक में बाँटा गया है ।

उत्पादक :-

सभी हरे पौधों एवं नील- हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है , इसी वर्ग में आते हैं तथा उत्पादक कहलाते हैं ।

उपभोक्ता :-

ऐसे जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं , उपभोक्ता कहलाते हैं ।

उपभोक्ता को मुख्यतः शाकाहारी , मांसाहारी तथा सर्वाहारी एवं परजीवी में बाँटा गया है ।

शाकाहारी :- पौधे व पत्ते खाने वाले । जैसे :- बकरी , हिरण ।
माँसाहारी :- माँस खाने वाले । जैसे :- शेर , मगरमच्छ ।
सर्वाहारी :- पौधे व माँस दोनों खाने वाले । जैसे :- कौआ , मनुष्य ।
परजीवी :- दूसरे जीव के शरीर में रहने व भोजन लेने वाले । जैसे :- जू , अमरबेल ।

अपघटक :-

फफूंदी व जीवाणु जो कि मरे हुए जीव व पौधे के जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में विघटित कर देते हैं । इस प्रकार अपघटक स्रोतों की भरपाई में मदद करते हैं ।

आहार श्रृंखला :-

आहार श्रृंखला एक ऐसी शृंखला है जिसमें एक जीव दूसरे जीव को भोजन के रूप में खाते हैं । उदाहरण :- घास → हिरण → शेर

पोषीस्तर :- एक आहार श्रृंखला में , उन जैविक घटकों को जिनमें ऊर्जा का स्थानांतरण होता है , पोषीस्तर कहलाता है ।
एक आहार श्रृंखला में ऊर्जा का स्थानांतरण एक दिशा में होता है ।
सूर्य से प्राप्त ऊर्जा :- हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा का 1 % भाग जो पत्तियों पर पड़ता है , अवशोषित करते हैं ।
ऊर्जा प्रवाह का 10 % नियम :- एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में केवल 10 % ऊर्जा का स्थानांतरण होता है जबकि 90 % ऊर्जा वर्तमान पोषी स्तर में जैव क्रियाओं में उपयोग होती है ।

आहार श्रृंखला के चरण :-

उपभोक्ता के अगले स्तर के लिए ऊर्जा की बहुत ही कम मात्रा उपलब्ध हो पाती है , अत : आहार श्रृंखला में सामान्यत : तीन अथवा चार चरण ही होते हैं ।

जैव आवर्धन :-

आहार श्रृंखला में हानिकारक रसायनों की मात्रा में एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में जाने पर वृद्धि होती है । इसे जैव आवर्धन कहते हैं ।

ऐसे रसायनों की सबसे अधिक मात्रा मानव शरीर में होती है ।

आहार जाल :-

आहार श्रृंखलाएं आपस में प्राकृतिक रूप से जुड़ी होती हैं , जो एक जाल का रूप धारण कर लेती है , उसे आहार जाल कहते हैं ।

पर्यावरण की समस्याएं :-

पर्यावरण में बदलाव हमें प्रभावित करता है और हमारी गतिविधियाँ भी पर्यावरण को प्रभावित करती हैं । इससे पर्यावरण में धीरे – धीरे गिरावट आ रही है , जिससे पर्यावरण की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं । जैसे :- प्रदूषण , वनों की कटाई ।

ओजोन परत :-

ओजोन परत पृथ्वी के चारों ओर एक रक्षात्मक आवरण है जो कि सूर्य के हानिकारक पराबैंगनी प्रकाश को अवशोषित कर लेती हैं । इस प्रकार से यह जीवों की स्वास्थय संबंधी हानियाँ ; जैसे :- त्वचा , कैंसर , मोतियाबिंद , कमजोर परिरक्षा तंत्र , पौधों का नाश आदि से रक्षा करती है ।

मुख्य रूप से ओजोन परत समताप मंडल में पाई जाती है जो कि हमारे वायुमंडल का हिस्सा है । जमीनी स्तर पर ओजोन एक घातक जहर है ।

ओजोन का निर्माण :-

ओजोन का निर्माण निम्न प्रकाश – रासायनिक क्रिया का परिणाम है ।
O₂ पराबैंगनी विकिरण 0 + O ( अणु )
O₂ + O → 0₃ ( ओजोन )

ओजोन परत का ह्रास :-

1985 में पहली बार अंटार्टिका में ओजोन परत की मोटाई में कमी देखी गई , जिसे ओजोन छिद्र के नाम से जाना जाता है ।

ओजोन की मात्रा में इस तीव्रता से गिरावट का मुख्य कारक मानव संश्लेषित रसायन क्लोरोफ्लुओरो कार्बन ( CFC ) को माना गया । जिनका उपयोग शीतलन एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है ।

1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ( यूएनईपी ) में सर्वानुमति बनी की सीएफसी के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए ( क्योटो प्रोटोकोल ) ।

कचरा प्रबंधन :-

आज के समय में अपशिष्ट निपटान एक मुख्य समस्या है जो कि हमारे पर्यावरण को प्रभावित करती है । हमारी जीवन शैली के कारण बहुत बड़ी मात्रा में कचरा इकट्ठा हो जाता है ।

कचरे में निम्न पदार्थ होते हैं :-

जैव निम्नीकरणीय पदार्थ :- पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों के कारण छोटे घटकों में बदल जाते हैं । उदाहरण :- फल तथा सब्जियों के छिलके , सूती कपड़ा , जूट , कागज आदि ।

अजैव निम्नीकरण पदार्थ :- पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों के कारण घटकों में परिवर्तित नहीं होते हैं । उदाहरण :- प्लास्टिक , पॉलिथीन , संश्लिष्ट रेशे , धातु , रेडियोएक्टिव अपशिष्ट आदि ।

सूक्ष्मजीव एंजाइम उत्पन्न करते हैं जो पदार्थों को छोटे घटकों में बदल देते हैं एंजाइम अपनी क्रिया में विशिष्ट होते हैं । इसलिए सभी पदार्थों का अपघटन नहीं कर सकते हैं ।

कचरा प्रबंधन की विधियाँ :-

जैवमात्रा संयंत्र :- जैव निम्नीकरणीय पदार्थ ( कचरा ) इस संयंत्र द्वारा जैवमात्रा व खाद में परिवर्तित किया जा सकता है ।

सीवेज उपचार तंत्र :- नाली के पानी को नदी में जाने से पहले इस तंत्र द्वारा संशोधित किया जाता है ।

कूड़ा भराव क्षेत्र :- कचरा निचले क्षेत्रों में डाल दिया जाता है और दबा दिया जाता है ।

कम्पोस्टिंग :- जैविक कचरा कम्पोस्ट गड्डे में भर कर ढक दिया जाता है ( मिट्टी के द्वारा ) तीन महीने में कचरा खाद में बदल जाता है ।

पुन : चक्रण :- अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ कचरा पुन : इस्तेमाल के लिए नए पदार्थों में बदल दिया जाता है ।

पुन : उपयोग :- यह एक पारंपारिक तरीका है जिसमें एक वस्तु का पुन : -पुनः इस्तेमाल कर सकते हैं । उदाहरण :- अखबार से लिफाफे बनाना ।

भस्मीकरण :- यह एक अपशिष्ट उपचार प्रक्रिया है जिसे थर्मल उपचार के रूप में वर्णित किया जाता है जो कचरे को राख में बदल देता है । मुख्य रूप से इसका उपयोग अस्पतालों से जैविक कचरे के निपटान के लिए उपयोग किया जाता है ।


Class 10 science chapter 15  Important Question Answer

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01. ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्रा को किस प्रकार प्रभावित करती है।
उत्तर :
ऑक्सीजन के तीन परमाणु संलागित होकर ओजोन O3 का एक अणु बनाते है | ओजोन की परत वायुमंडल के ऊपरी सतह में होते है यह हमे सूर्य की हानिकारक पराबैगनी विकिरणों को अवशोषित कर लेती है | अत : ओजोन हमे कई बीमारियोँ जैसे त्वचा का कैंसर , अल्सर आदि से सुरक्षा प्रदान करती है |
02. क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें ( मार डाले ) ?
उत्तर :
आहार शृंखला का प्रत्येक पोषी स्तर महत्वपूर्ण है | यदि हम एक पोषी स्तर के जीवो को समाप्त कर दे तो अगले स्तर के जीवों को भोजन नहीं होगा और वे भूखे मरेंगे तथा पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जायेगा | खाघ शृंखला में ऊर्जा का प्रवाह खत्म हो जाएगा |

03. क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव है?
उत्तर :
नहीं , यह प्रभाव भिन्न – भिन्न नहीं होगा | किसी भी एक पोषी स्तर के प्रभावित होने पर सभी स्तर एक समान रूप से प्रभावित होगे | इसके अतिरिक्त किसी भी पोषी स्तर के जीवों को हटाने पर परितंत्र होता है | प्रत्येक पोषी स्तर अपने से निचले एवं ऊपरी दोनों ही स्तरों को समान रूप से प्रभवित करता है |

04. जैव आवर्धन क्या है? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर :
आहार श्रृंखला में​ रासायनिक अजैविक पदार्थ का अत्यधिक मात्रा में संचित होना जैव आवर्धन कहलाता है | इसकी सर्वाधिक मात्रा मानव में पाई जाती है भिन्न स्तरों का जैविक आवर्धन भी भिन्न है | यह मात्रा स्तरों में ऊपर की ओर बढ़ती है |

05. हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
उत्तर :
हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से पर्यावरण प्रदूषित होता है | ये विघटित नहीं होते | अत: ओनके निपटान की समस्या भी आती है | ये अनेक समस्याएँ उत्पन्न करते है |
06. यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर :
जैव निम्नीकरणीय कचरा एक सिमित समय तक ही पर्यावरण को प्रदूषित करता है | इसके पश्चात नष्ट होने पर समाप्त हो जाता है तथा पुन : चक्रण में भी उपयोगी है | इनके विघटन के पश्चात वातावरण में बदबू तथा विषैली गैसों उत्पन्न होती है |

07.ओजोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है। इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर :
ओजोन परत O3 सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों से हमारी रक्षा करती है | इसकी क्षति से ये विकिरणों को धरती तक पहुँचकर त्वचा के रोग तथा त्वचा का कैसर उत्पन्न करता है | अतः यह हमारे लिए चितां का विषय है | क्लोरोफ्लोरो कार्बन जिनका उपयोग रेफ्रिजरेटर एवं अग्निशामक में होता है , ओजोन को क्षति पहुँचा रहे है | इस क्षति को सिमित करने के लिए हमे क्लोरोफ्लोरो कार्बन तथा रासायनिक पदार्थ का उपयोग कम से कम करना चाहिए |

 


Class 10 science chapter 15  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम दवारा अपघटित नहीं होते वे क्या कहलाते
(a) जैव निम्नीकरणीय
(b) अजैव निम्नीकरणीय
(c) पारितन्त्र
(d) भौतिक चक्र
 
► (b) अजैव निम्नीकरणीय
2. हमारे द्वारा खाए गए भोजन का पाचन किन के द्वारा किया जाता है ?
(a) अपशिष्ट पदार्थों
(b) एंजाइमों
(c) पाचन शक्ति
(d) जीवाणु
 
► (b) एंजाइमों
3. निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ है ?
(a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(c) फलों के छिलके,केक एंव नींबू का रस
(d) केक, लकड़ी एंव घास
 
► (a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
4. वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम दवारा अपघटित हो जाते हैं वह क्या कहलाते है ?
(a) जैव निम्नीकरणीय
(b) अजैव निम्नीकरण
(c) पारितन्त्र
(d) रासायनिक चक्र
 
► (a) जैव निम्नीकरणीय
5. किसी क्षेत्र के सभी जीव तथा वातावरण के अजैव कारक संयुक्त रुप से क्या बनाते हैं ?
(a) भौतिक प्रक्रम
(b) रासायनिक प्रक्रम
(c) पारितन्त्र
(d) पर्यावरण
 
► (c) पारितन्त्र
6. किन के साथ भौतिक कारकों में परस्पर अन्योन्यक्रिया होती है तथा प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं ?
(a) पौधे
(b) जन्तु
(c) सूक्ष्मजीव तथा मानव
(d) उपरोक्त सभी
 
► (d) उपरोक्त सभी
7. निम्न में से अजैव घटक कौन-से होते हैं ?
(a) ताप,वर्षा
(b) वायु
(c) मृदा एंव खनिज
(d) उपरोक्त सभी
 
► (d) उपरोक्त सभी
8. सभी हरे पौधे एंव नील-हरित-शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है किस वर्ग में आते हैं ?
(a) उत्पादक
(b) उपभोक्ता
(c) आहार श्रृंखला
(d) पारितन्त्र
 
► (a) उत्पादक
9. किस की उपस्थिति में अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक पदार्थ जैसे कि शर्करा (चीनी) एंव मंड का निर्माण कर सकते हैं ?
(a) सूर्य के प्रकाश
(b) क्लोरोफिल 
 
► (c) (a) और (b) दोनों
10. उपभोक्ता को कौन-से वर्गों में बाँटा जाता है ?
(a) शाकाहारी
(b) मांसाहारी
(c) सर्वाहारी एंव परजीवी
(d) उपरोक्त सभी
 
► (d) उपरोक्त सभी
11. वे जीव जो उत्पादक दवारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रुप से निर्भर करते हैं उन्हें क्या कहते हैं?
(a) उत्पादक
(b) उपभोक्ता
(c) उत्पादन
(d) अपघटक
 
► (b) उपभोक्ता
12. विभिन जैविक स्तरों पर भाग लेने वाले जीवों की श्रृंखला किस का निर्माण करती है ?
(a) जाल
(b) आहार श्रृंखला
(d) पारितन्त्र
(d) पोषण स्तर का
 
► (b) आहार श्रृंखला
13. जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव किन अवशेषों का अपमार्जन करते हैं ?
(a) मृत जीव
(b) जीवित
(c) (a) और (b) दोनों
(d) गले-सड़े पदार्थ
 
► (a) मृत जीव
14. किसका स्थिरीकरण करके उसे विषमपोषियों अथवा उपभोगताओं के लिए उपलब्ध कराते हैं ?
(a) आहार श्रृंखला
(b) सौर ऊर्जा
(c) उत्पादक
(d) पोषी स्तर
 
► (b) सौर ऊर्जा
15. किसका स्थिरीकरण करके उसे विषमपोषियों अथवा उपभोगताओं के लिए उपलब्ध कराते हैं ?
(a) आहार श्रृंखला
(b) सौर ऊर्जा
(c) उत्पादक
(d) पोषी स्तर
 
► (b) सौर ऊर्जा
16. किसका स्थिरीकरण करके उसे विषमपोषियों अथवा उपभोगताओं के लिए उपलब्ध कराते हैं ?
(a) आहार श्रृंखला
(b) सौर ऊर्जा
(c) उत्पादक
(d) पोषी स्तर
 
► (b) सौर ऊर्जा
17. शाकाहारी अथवा प्राथमिक उपभोक्ता किस स्तर के हैं ?
(a) एक पोषी स्तर
(b) द्वितीय पोषी स्तर
(c) तृतीय पोषी स्तर
(d) चतुर्थ पोषी स्तर
 
► (b) द्वितीय पोषी स्तर
18. सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा कौन प्रदान करती
(a) ओजोन परत
(b) ऑक्सीजन
(c) नाइट्रोजन
(d) कार्बन-डाइऑक्साइड
 
► (a) ओजोन परत

 

 


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Class 10 Science Chapter 13 Notes in Hindi | विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव

Class 10 Science chapter 13 Notes in Hindi : covered science chapter 13 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव क्या है,किसे कहते है, चुम्बक के गुण क्या क्या है,  चुम्बक के ध्रुव किसे कहते है, परिनालिका किसे कहते है, विद्युत चुंबक किसे कहते है, विद्युत मोटर किसे कहते है, विद्युत मोटर का सिद्धांत क्या है, फ्लेमिंग का वामहस्त नियम किसे कहते है, विद्युत जनित्र किसे कहते है?

Class 10 Science chapter 13 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 Magnetic Effects of Electric Current (विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव)
content Class 10 Science chapter 13 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science chapter 13 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 13 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 13

विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव

Magnetic Effects of Electric Current


विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव :-

जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है , तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है , इस घटना को विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं ।

चुम्बक :-

चुम्बक वह पदार्थ है जो लौह तथा लौह युक्त चीजों को अपनी तरफ आकर्षित करती है ।

चुम्बक के गुण :-

प्रत्येक चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं – उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव ।
समान ध्रुव एक – दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं ।
असमान ध्रुव एक – दूसरे को आकर्षित करते हैं ।
स्वतंत्र रूप से लटकाई हुई चुम्बक लगभग उत्तर – दक्षिण दिशा में रुकती है , उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की और संकेत करते हुए ।

चुम्बक के ध्रुव :-

प्रत्येक चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं :-

उत्तरी ध्रुव
दक्षिणी ध्रुव
उत्तर ध्रुव :- उत्तर दिशा की ओर संकेत करने वाले सिरे को उत्तरोमुखी ध्रुव अथवा उत्तर ध्रुव कहते हैं ।

दक्षिण ध्रुव :- दूसरा सिरा जो दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है उसे दक्षिणोमुखी ध्रुव अथवा दक्षिण ध्रुव कहते हैं ।

चुम्बकीय क्षेत्र :-

किसी चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें उसके बल का संसूचन किया जा सकता है , उस चुंबक का चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है ।

चुम्बकीय क्षेत्र का SI मात्रक टेस्ला ( Tesla ) है ।
चुंबकीय क्षेत्र एक ऐसी राशि है जिसमें परिमाण तथा दिशा दोनों होते हैं ।
किसी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा वह मानी जाती है जिसके अनुदिश दिक्सूची का उत्तर ध्रुव उस क्षेत्र के भीतर गमन करता है ।

चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ :-

चुम्बक के चारों ओर बहुत सी रेखाएँ बनती हैं , जो क्षेत्रीय रेखाएं उत्तरी ध्रुव से प्रकट होती हैं तथा दक्षिणी ध्रुव पर विलीन हो जाती हैं । इन रेखाओं को चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ कहते हैं ।

चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण :-

क्षेत्र रेखाएं बंद वक्र होती हैं ।
प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र में रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक निकट होती हैं ।
दो रेखाएँ कहीं भी एक – दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करती क्योंकि यदि वे प्रतिच्छेद करती हैं तो इसका अर्थ है कि एक बिंदु पर दो दिशाएँ जो संभव नहीं हैं ।
चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता को क्षेत्र रेखाओं की निकटता की कोटि द्वारा दर्शाया जाता है ।
नोट :- हैंसक्रिश्चियन ऑस्टैंड वह पहला व्यक्ति था जिसने पता लगाया था कि विद्युत धारा चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है ।

सीधे चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण चुम्बकीय क्षेत्र :-

चुम्बकीय क्षेत्र चालक के हर बिंदु पर सकेंद्री वृतों द्वारा दर्शाया जा सकता है ।
चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम या दिक्सूचक से दी जा सकती है ।
चालक के नजदीक वाले वृत निकट – निकट होते हैं ।
चुम्बकीय क्षेत्र a धारा की शक्ति ।
चुम्बकीय क्षेत्र a=1/चालक से दूरी 

दक्षिण ( दायाँ ) हस्त अंगुष्ठ नियम :-

कल्पना कीजिए कि आप अपने दाहिने हाथ में विद्युत धारावाही चालक को इस प्रकार पकड़े हुए हो कि आपका अंगूठा विद्युत धारा की ओर संकेत करता हो तो आपकी अगुलियाँ चालक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बताएँगी । इसे दक्षिण ( दायाँ ) हस्त अंगुष्ठ नियम का नियम कहते हैं ।

विधुत धारावाही वृताकार पाश के कारण चुम्बकीय क्षेत्र :-

चुम्बकीय क्षेत्र प्रत्येक बिंदु पर संकेन्द्री वृत्तों द्वारा दर्शाया जा सकता है ।
जब हम तार से दूर जाते हैं तो वृत निरंतर बड़े होते जाते हैं ।
विद्युत धारावाही तार के प्रत्येक बिंदु से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पाश के केंद्र पर सरल रेखा जैसे प्रतीत होने लगती है।
पाश के अंदर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा एक समान होती है 

विधुत धारावाही वृत्ताकार पाश के चुम्बकीय क्षेत्र को प्रभावित करने वाले कारक :-

चुम्बकीय क्षेत्र a चालक में से प्रभावित होने वाली धारा ।
चुम्बकीय क्षेत्र a=1/चालक से दूरी ।
चुम्बकीय क्षेत्र कुंडली के फेरों की संख्या ।
चुम्बकीय क्षेत्र संयोजित है । प्रत्येक फेरे का चुम्बकीय क्षेत्र दूसरे फेरे के चुम्बकीय क्षेत्र में संयोजित हो जाता है क्योंकि विद्युत धारा की दिशा हर वृत्ताकार फेरे में समान है ।

परिनालिका :-

पास – पास लिपटे विद्युत रोधी तांबे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं ।

परिनालिका का उपयोग :-

परिनालिका का उपयोग किसी चुम्बकीय पदार्थ जैसे नर्म लोहे को चुम्बक बनाने में किया जाता है ।

परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र :-

परिनालिका का चुम्बकीय क्षेत्र छड़ चुम्बक के जैसा होता है । परिनालिका के अंदर चुम्बकीय क्षेत्र एक समान है तथा समांतर रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है ।

परिनालिका में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा :-

परिनालिका के बाहर – उत्तर से दक्षिण
परिनालिका के अंदर – दक्षिण से उत्तर

विद्युत चुंबक :-

परिनालिका के भीतर उत्पन्न प्रबल चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग किसी चुंबकीय पदार्थ , जैसे नर्म लोहे , को परिनालिका के भीतर रखकर चुंबक बनाने में किया जा सकता है । इस प्रकार बने चुंबक को विद्युत चुंबक कहते हैं ।

विद्युत चुम्बक के गुण :-

यह अस्थायी चुम्बक होता है अत : आसानी से चुम्बकत्व समाप्त हो सकता है ।
इसकी शक्ति बदली जा सकती है ।
ध्रुवीयता बदली जा सकती है ।
प्रायः अधिक शक्तिशाली चुम्बक होते हैं ।

स्थायी चुम्बक के गुण :-

आसानी से चुम्बकत्व समाप्त नहीं किया जा सकता ।
शक्ति निश्चित होती है ।
ध्रुवीयता नहीं बदली जा सकती ।
प्रायः कमजोर चुम्बक होते हैं ।

चुम्बकीय क्षेत्र में किसी विद्युत धारावाही चालक पर बल :-

आंद्रे मेरी ऐम्पियर ने प्रस्तुत किया कि चुम्बक भी किसी विद्युत धारावाही चालक पर परिमाण में समान परन्तु दिशा में विपरीत बल आरोपित करती है ।
चालक में विस्थापन उस समय अधिकतम होता है जब विद्युत धारा की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् होती है ।
विद्युत धारा की दिशा बदलने पर बल की दिशा भी बदल जाती है ।

फ्लेमिंग का वामहस्त ( बाया हाथ ) नियम :-

अपने हाथ की तर्जनी , मध्यमा तथा अंगूठे को इस प्रकार फैलाइए कि ये तीनों एक – दूसरे के परस्पर लम्बवत हों । यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित धारा की दिशा की ओर संकेत करती है तो अंगूठा चालक की गति की दिशा या बल की दिशा की ओर संकेत करेगा ।

MRI : ( Megnetic Resonance Imaging ) :-

यह एक विशेष तकनीक है जिससे चुम्बकीय अनुनाद प्रतिबिंबन का प्रयोग करके शरीर के भीतरी अंगों के प्रतिबिम्ब प्राप्त किए जा सकते हैं ।

विद्युत मोटर :-

विद्युत मोटर एक ऐसी घूर्णन युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में रूपांतरित करती है । विद्युत मोटर का उपयोग विद्युत पंखों , रेफ्रिजेरेटरों , वाशिंग मशीन , विद्युत मिश्रकों , MP3 प्लेयरों आदि में किया जाता है ।

विद्युत मोटर का सिद्धांत :-

विद्युत मोटर – विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव का उपयोग करती है । जब किसी धारावाही आयतकार कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्रा में रखा जाता है तो कुंडली पर एक बल आरो ” त होता है जिसके फलस्वरूप कुंडली और धुरी का निरंतर घुर्णन होता रहता है । जिससे मोटर को दी गई विद्युत उर्जा यांत्रिक उर्जा में रूपांतरित हो जाती है ।

विद्युत मोटर की संरचना :-

आर्मेचर :- विद्युत मोटर में एक विद्युत रोधी तार की एक आयतकार कुंडली ABCD जो कि एक नर्म लोहे के कोड पर लपेटी जाती है उसे आर्मेचर कहते हैं ।

प्रबल चुम्बक :- यह कुंडली किसी प्रबल चुम्बकीय क्षेत्रा के दो ध्रुवों के बीच इस प्रकार रखी जाती है कि इसकी भुजाएँ AB तथा CD चुम्बकीय क्षेत्रा की दिशा के लबंवत रहें ।

विभक्त वलय या दिक परिवर्तक :- कुंडली के दो “ रे धातु की बनी विभक्त वलय को दो अर्ध भागों P तथा Q से संयोजित रहते हैं । इस युक्ति द्वारा कुंडली में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को बदला या उत मित किया जा सकता है ।

ब्रश :- दो स्थिर चालक ( कार्बन की बनी ) ब्रुश X तथा Y विभक्त वलय P तथा Q से हमेशा स्पर्श में रहती है । ब्रुश हमेशा विभक्त वलय तथा बैटरी को जोड़ कर रखती है ।

बैटरी :- बैटरी दो ब्रुशों X तथा Y के बीच संयोजित होती है । विद्युत धारा बैटरी से चलकर ब्रुश X से होते हुए कुंडली ABCD में प्रवेश करती है तथा ब्रुश Y से होते हुए बैटरी के दूसरे टर्मिनल पर वापस आ जाती है ।

विद्युत मोटर की कार्यविधि :-

जब कुंडली ABCD में विद्युत धारा प्रवाहित होती है , तो कुंडली के दोनों भुजा AB तथा CD पर चुम्बकीय बल आरो ” त होता है ।
फ्लेमिंग बामहस्त नियम अनुसार कुंडली की AB बल उसे अधोमुखी धकेलता है तथा CD भुजा पर बल उपरिमुखी धकेलता है ।
दोनों भुजाओं पर बल बराबर तथा विपरित दिशाओं में लगते हैं । जिससे कुंडली अक्ष पर वामावर्त घूर्णन करती है ।
आधे घूर्णन में Q का सम्पर्क ब्रुश X से होता है तथा P का सम्पर्क ब्रुश Y से होता है । अंत : कुंडली में विद्युत धारा उत्क्रमित होकर पथ DCBA के अनुदिश प्रवाहित होती है ।
प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात विद्युत धारा के उत्क्रमित होने का क्रम दोहराता रहता है जिसके फलस्वरूप कुंडली तथा धुरी का निरंतर घूर्णन होता रहता है ।

व्यावसायिक मोटरों :- मोटर की शक्ति में वृद्धि के उपाय :-

स्थायी चुम्बक के स्थान पर विद्युत चुम्बक प्रयोग किए जाते है ।
विद्युत धारावाही कुंडली में फेरों की संख्या अधिक होती है ।
कुंडली नर्म लौह – क्रोड पर लपेटी जाती है । नर्म लौह क्रोड जिस पर कुंडली लपेटी जाती है तथा कुंडली दोनों को मिलाकर आर्मेचर कहते है ।
मानव शरीर के हृदय व मस्तिष्क में महत्वपूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र होता है ।

दिक्परिवर्तक :-

वह युक्ति जो परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है , उसे दिक्परिवर्तक कहते हैं । विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है ।

वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण :-

वह प्रक्रम जिसके द्वारा किसी चालक के परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण अन्य चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है , वैद्युतचुंबकीय प्रेरण कहलाता है ।

इसका सर्वप्रथम अध्ययन सन् 1831 ई . में माइकेल फैराडे ने किया था ।

फैराडे की इस खोज ने कि ” किसी गतिशील चुंबक का उपयोग किस प्रकार विद्युत धारा उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है ” वैज्ञानिक क्षेत्र को एक नयी दिशा प्रदान की ।

गतिशील चुंबक से विद्युत धारा बनाने के क्रियाकलाप का निष्कर्ष :-

जब चुम्बक को कुंडली की तरफ लाया जाता है तो – गेल्वेनोमीटर में क्षणिक विक्षेप विद्युत धारा की उपस्थिति को इंगित करता है ।
जब चुम्बक को कुंडली के निकट स्थिर अवस्था में रखा जाता है तो कोई विक्षेप नहीं ।
जब चुम्बक को दूर ले जाया जाता है तो , गेल्वेनोमीटर में क्षणिक विक्षेप होता है । परन्तु पहले के विपरीत है ।

गेल्वेनोमीटर :-

एक ऐसी युक्ति है जो परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति संसूचित करता है । यह धारा की दिशा को भी संसूचित करता है ।

लेमिंग दक्षिण ( दायां ) हस्त नियम :-

अपने दाहिने हाथ की तर्जनी , मध्यमा तथा अंगूठे को इस प्रकार फैलाइए कि तीनों एक – दूसरे के लम्बवत हों । यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा तथा अंगूठा चालक की दिशा की गति की ओर संकेत करता है तो मध्यमा चालक में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा दर्शाती है ।

यह नियम :-

जनित्र ( जनरेटर ) की कार्य प्रणाली का सिद्धांत है ।
प्रेरित विद्युत धारा की दिशा ज्ञात करने के काम आता है ।

विद्युत जनित्र :-

विद्युत जनित्र द्वारा विद्युत उर्जा या विद्युत धारा का निर्माण किया जाता है । विद्युत जनित्रा में यांत्रिक उर्जा को विद्युत उर्जा में रूपांतरित किया जाता है ।

विद्युत जनित्र का सिद्धांत :-

विद्युत जनित्र में यांत्रिक उर्जा का उपयोग चुम्बकीय क्षेत्र में रखे किसी चालक को घूर्णी गति प्रदान करने में किया जाता है । जिसके फलस्वरूप विद्युत धारा उत्पन्न होती है । विद्युत जनित्र वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है । एक आयताकार कुंडली ABCD को स्थायी चुम्बकीय क्षेत्रा में घुर्णन कराए जाने पर , जब कुंडली की गति की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत होती है तब कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है । विद्युत जनित्र फ्लेमिंग के दक्षिण हस्त नियम पर आधारित है ।

विद्युत जनित्र की सरंचना :-

स्थायी चुम्बक :- कुंडली को स्थायी प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है ।

आर्मेचर :- विद्युतरोधी तार के अधिक फेरों वाली आयताकार कुंडली ABCD जो एक नर्म होले के क्रोड पर लपेटी जाती है उसे आर्मेच कहते हैं ।

वलय :- कुंडली के दो सिरे दो Brass वलय R₁ and R₂ से समायोजित होते हैं जब कुंडली घूर्णन गति करती है तो वलय R₁ और R₂ भी गति करते है ।

ब्रुश :- दो स्थिर चालक ग्रेफाइट ब्रुश B₁ और B₂ पृथक – पृथक रूप से क्रमश : वलय R₁ और R₂ को दबाकर रखती है । दोनों ब्रुश B₁ और B₂ कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा को बाहरी परिपथ में भेजने का कार्य करती है ।

धुरी :- दोनों वलय R₁ और R₂ धुरी से इस प्रकार जुड़ी रहती है कि बिना बाहरी परिपथ को हिलाए वलय स्वतंत्रातापूर्वक घूर्णन गति करती है ।

गैलवेनो मीटर :- प्रेरित विद्युत धारा को मापने के लिए ब्रुशों के बाहरी सिरों को गैलवेनो मीटर के दोनों टर्मिनलों से जोड़ा जाता है ।

विद्युत जनित्र का सिद्धांत की कार्यविधि :-

एक आयताकार कुंडली ABCD जिसे स्थायी चुम्बक के दो ध्रुवों के बीच क्षैतिज रखा जाता है ।
कुंडली को दक्षिणावर्त घुमाया जाता है ।
कुंडली की भुजा AB ऊपर की ओर तथा भुजा CD नीचे की ओर गति करती है ।
कुंडली चुम्बकीय क्षेत्रा रेखाओं को काटती है ।
फ्लेमिंग दक्षिण हस्त नियमानुसार प्रेरित विद्युत धारा AB भुजा में A से B तथा CD भुजा में C से D की ओर बहता है ।
प्रेरित विद्युत धारा बाह्य विद्युत परिपथ में B₁ से B₂ की दिशा में प्रवाहित होती है ।
अर्धघूर्णन के पश्चात भुजा CD ऊपर की ओर तथा भुजा AB नीचे की ओर जाने लगती है । फलस्वरूप इन दोनों भुजाओं में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और DCBA के अनुदिश प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है । बाह्य परिपथ में विद्युत धारा की दिशा B₁ से B₂ होती है ।
प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात बाह्य परिपथ में विद्युत धारा की दिशा परिवर्तित होती है ।

प्रत्यावर्ती धारा :-

ऐसी विद्युत धारा जो समान समय अंतरालों के पश्चात अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं ।

प्रत्यावर्ती धारा का लाभ :- प्रत्यावर्ती धारा को सुदूर स्थानों पर बिना अधिक ऊर्जा क्षय के प्रेषित किया जा सकता है ।

प्रत्यावर्ती धारा की हानि :- प्रत्यावर्ती धारा को संचित नहीं किया जा सकता ।

DC दिष्ट धारा जनित्र :-

दिष्ट धारा प्राप्त करने के लिए विभक्त वलय प्रकार के दिक्परिवर्तक का उपयोग किया जाता है । इस प्रकार के दिक्परिवर्तक से एक ब्रुश सदैव ही उसी भुजा के सम्पर्क में रहता है । इस व्यवस्था से एक ही दिशा की विद्युत धारा उत्पप्न होती है । इस प्रकार के जनित्र को दिष्ट धारा ( dc ) जनित्र कहते हैं ।

दिष्ट धारा का लाभ :- दिष्ट धारा को संचित कर सकते हैं ।

दिष्ट धारा की हानि :- सुदूर स्थानों पर प्रेषित करने में ऊर्जा का क्षय ज्यादा होता है ।

घरेलू विद्युत परिपथ :-

घरेलू विद्युत की लिए तीन प्रकार की तारें प्रयोग में लाई जाती हैं ।

विद्युन्मय तार ( धनात्मक ) :- जिस पर प्रायः लाल विद्युतरोधी आवरण होता है , विद्युन्मय तार ( अथवा धनात्मक तार ) कहते हैं ।
उदासीन तार ( ऋणात्मक ) :- जिस पर काला आवरण होता है , उदासीन तार ( अथवा ऋणात्मक तार ) कहते है ।
भूसंपर्क तार :- जिस पर हरा विद्युत रोधी आवरण होता है । यदि साधित्र के धात्विक आवरण से विद्युत धारा का क्षरण होता है तो यह हमें विद्युत आघात से बचाता है । यह धारा के क्षरण के समय अल्प प्रतिरोध पथ प्रदान करता है ।
भारत में विद्युन्मय तार तथा उदासीन तार के बीच 220V का विभवांतर होता है ।

खंभा → मुख्य आपूर्ति → फ्यूज → विद्युतमापी मीटर → वितरण वक्स → पृथक परिपथ

लघुपथन : ( शॉर्ट सर्किट ) :-

जब विद्युन्मय तार तथा उदासीन तार दोनों सीधे संपर्क में आते हैं तो अतिभारण हो सकता है ( यह तब होता है जब तारों का विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त हो जाता है अथवा साधित्र में कोई दोष होता है ) । ऐसी परिस्थितियों में , किसी परिपथ में विद्युत धारा अकस्मात बहुत अधिक हो जाती है । इसे लघुपथन कहते हैं ।

अतिभारण :-

जब विद्युत तार की क्षमता से ज्यादा विद्युत धारा खींची जाती है तो यह अभिभारण पैदा करता है ।

अतिभारण का कारण :-

आपूर्ति वोल्टता में दुर्घटनावश होने वाली वृद्धि ।
एक ही सॉकेट में बहुत से विद्युत साधित्रों को संयोजित करना ।
सुरक्षा युक्तियाँ :-

विद्युत फ्यूज
भूसंपर्क तार
मिनिएचर सर्किट ब्रेकर ( M.C. B. )


Class 10 science chapter 13  Important Question Answer

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1. मेज के तल में पड़े तार के वृत्ताकार पाश पर विचार कीजिए। मान लीजिए इस पाश में दक्षिणावर्त विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम को लागू करके पाश के भीतर तथा बाहर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दी गई आकृति एक वृताकार पाश का है जिसकी चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाया गया है | दक्षिण अंगुष्ठ नियम लागु करने पर हम पाते हैं कि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ पाश के अंदर मेज के तल की लंबवत बाहर की ओर निर्देशित होती है जबकि पाश के बहार यह अंदर की ओर निर्देशित होती है |

2. क्रियाकलाप 13.7 में हमारे विचार से छड़ AB का विस्थापन किस प्रकार प्रभावित होगा यदि
(i) छड़ AB में प्रवाहित विद्युत धारा में वृद्धि हो जाए
(ii) अधिक प्रबल नाल चुंबक प्रयोग किया जाए, और
(iii) छड़ AB की लंबाई में वृद्धि कर दी जाए?

उत्तर
(i) यदि छड AB में प्रवाहित विद्युत धारा में वृद्धि हो जाए तो छड के विस्थापन में भी वृद्धि होती है |
(ii) यदि अधिक प्रबल नाल चुंबक प्रयोग किया जाए तो छड AB का विस्थापन भी बढेगा |
(iii) यदि छड़ AB की लंबाई में वृद्धि कर दी जाए तो इस पर लगने वाला बल भी बढेगा क्योंकि विस्थापन बढ़ता है |

1. फ्लेमिंग का वामहस्त नियम लिखिए।
उत्तर:
फ्लेमिंग का वामहस्त नियम :
इस नियम के अनुसार, अपने बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा तथा अँगूठे को इस प्रकार फैलाइए कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों |यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करती है तो अँगूठा चालक की गति की दिशा अथवा चालक पर आरोपित बल की दिशा की ओर संकेत करेगा। इसी नियम को फ्लेमिंग का वामहस्त नियम कहते है |

2. विद्युत मोटर का क्या सिद्धांत है?
उत्तर:
विद्युत मोटर का सिद्धांत :
विद्युत मोटर का कार्य करने का सिद्धांत विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव पर आधारित है | चुंबकीय क्षेत्र में लौह-क्रोड़ पर लिपटी कुंडली से जब विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो वह एक बल का अनुभव करती है | जिससे मोटर का आर्मेचर चुंबकीय क्षेत्र में घूमने लगता है | कुंडली के घूमने की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार होता है | यही विद्युत मोटर का सिद्धांत हैं |

 


Class 10 science chapter 13  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. चुंबकीय सुई स्वतंत्र रूप से किस दिशा में ठहरती है ?
(a) सदैव उत्तर में
(b) सदैव दक्षिण में
(c) सदैव उत्तर-दक्षिण में
(d) सदैव पूर्व में

► (c) सदैव उत्तर-दक्षिण में                            

2. विद्युत धारावाही तार किस की भाँति व्यवहार करता है ?
(a) छड़
(b) चुंबक
(c) प्लास्टिक
(d) स्टील

► (b) चुंबक

3. उत्तर दिशा की ओर संकेत करने वाले चुंबक के सिरे को क्या कहते हैं ?
(a) उत्तरी ध्रुव
(b) दक्षिण ध्रुव
(c) पूर्वी ध्रुव
(d) पश्चिमी ध्रुव

► (a) उत्तरी ध्रुव

4. यह किसने प्रमाणित किया था कि विद्युत तथा चुंबकत्व परस्पर संबंधित परिघटनाएँ हैं ?
(a) फ्लेमिंग
(b) मैक्सवेल
(c) माइकेल फैराडे
(d) हैंस क्रिश्चियन ऑस्टेड

► (d) हैंस क्रिश्चियन ऑस्टेड

5. किसी चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें उसके बल का संसूचन किया जा सकता है | वह क्या कहलाता है ?

(a) विद्युत क्षेत्र
(b) चुंबकीय प्रभाव
(c) चुबकीय क्षेत्र
(d) (a) और (b) दोनों

► (c) चुबकीय क्षेत्र

6. चुंबक के बाहर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा क्या कहलाती है ?
(a) पूर्व से पश्चिम ध्रुव
(b) पश्चिम से पूर्व ध्रुव
(c) उत्तर से दक्षिण ध्रुव
(d) दक्षिण से उत्तर ध्रुव

► (c) उत्तर से दक्षिण ध्रुव

7. चुंबक के अंदर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा क्या कहलाती है ?
(a) पूर्व से पश्चिम ध्रुव
(b) पश्चिम से पूर्व ध्रुव
(c) उत्तर से दक्षिण ध्रुव
(d) दक्षिण से उत्तर ध्रुव

► (d) दक्षिण से उत्तर ध्रुव

8. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ कैसी होती हैं ?
(a) बंद वक्र
(b) खुले वक्र
(c) बंद वृत्त
(d) (a) और (b) दोनों

► (a) बंद वक्र
9. किसी धारावाही चालक द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा का पता कैसे लगाया जा सकता है ?
(a) वामहस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा
(b) ऐम्पियर नियम द्वारा
(c) दक्षिण – हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा
(d) जूल के नियम द्वारा

► (c) दक्षिण – हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा

10. यदि विद्युत धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है तो दक्षिण – हस्त अंगुष्ठ नियम के अनुसार तार के नीचे किसी भी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा क्या होगी ?
(a) उतर से दक्षिण की ओर
(b) दक्षिण से उतर की ओर
(c) पूर्व से पश्चिम की ओर
(d) पश्चिम से पूर्व की ओर

► (a) उतर से दक्षिण की ओर

11. विद्युत धारावाही वृताकार पाश के प्रत्येक बिंदु से उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पाश के केंद्र पर कैसी प्रतीत होती है ?
(a) वक्र रेखाओं के रूप में
(b) वृताकार के रूप में
(c) सीधी रेखाओं के रूप में
(d) टेढ़ी – मेढ़ी रेखाओं के रूप में

► (c) सीधी रेखाओं के रूप में

12. परिनालिका का एक सिरा ___ध्रुव तथा दूसरा सिरा ___ध्रुव की भांति व्यवहार करता है?
(a) पूर्व, पश्चिम
(b) उत्तर, दक्षिण
(c) दक्षिण, उत्तर
(d) पश्चिम, पूर्व

► (b) उत्तर, दक्षिण

13. पास-पास लिपटे विद्युतरोधी तांबे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को क्या कहते हैं?
(a) वृताकार पाश
(b) उदासीन तार
(c) विद्युत चुम्बक
(d) परिनालिका

► (d) परिनालिका

14. किस वैज्ञानिक ने यह प्रस्तावित किया कि धारावाही चालक चुंबकीय क्षेत्र में कुछ बल का अनुभव करता है ? (a) हैम्फी डेवी
(b) माइकेल फैराडे
(c) आंद्रे मैरी ऐम्पियर
(d) हैंस क्रिश्चियन ऑसर्टेड

► (c) आंद्रे मैरी ऐम्पियर

15. जब विद्युत धारा की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत होती है, तब छड़ पर आरोपित बल का परिमाण कैसा होता है ?
(a) उच्चतम
(b) निम्नतम
(c) समान
(d) (a) और (b) दोनों

► (a) उच्चतम

16. किसी धारावाही चालक पर लगने वाला बल की दिशा किस पर निर्भर करती है ?
(a) विद्युत धारा की दिशा
(b) चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा
(c) चालक के पदार्थ पर
(d) (a) और (b) दोनों ।

► (d) (a) और (b) दोनों ।

17. फ्लेमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार, एक । धारावाही चालक की गति की दिशा अथवा बल की दिशा की ओर कौन संकेत करता है ?
(a) तर्जनी
(b) मध्यमा
(c) अंगुष्ठ
(d) (a) और (b) दोनों

► (c) अंगुष्ठ

18. धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर उस पर आरोपित बल का पता कैसे लगाया जा सकता है ?
(a) फ्लेमिंग के दक्षिण – हस्त नियम द्वारा
(b) फ्लेमिंग के वामहस्त (बायाँ हाथ) नियम द्वारा
(c) मैक्सवेल के अंगुष्ठ नियम द्वारा
(d) (a) और (b) दोनों

► (b) फ्लेमिंग के वामहस्त (बायाँ हाथ) नियम द्वारा

19. निम्न में से किसमें विद्युत धारावाही चालक तथा चुम्बकीय क्षेत्रों का उपयोग होता है ?
(a) विद्युत मोटर
(b) विद्युत जनित्र
(c) माइक्रोफ्रोन
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

20. विद्युत मोटर किसको किसमें परिवर्तित करती है ?
(a) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में
(b) विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में
(c) यांत्रिक ऊर्जा को ऊष्मा की ऊर्जा में
(d) विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा की ऊर्जा में

► (b) विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में

 

 

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Class 10 Science Chapter 12 Notes in Hindi | विद्युत

Class 10 Science chapter 12 Notes in Hindi : covered science chapter 12 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – विद्युत क्या है,किसे कहते है, विद्युत ऊर्जा क्या है, विद्युत परिपथ किसे कहते है, आवेश किसे कहते है, विधुत धारा किसे कहते है, विधुत धारा क्या है, ओम का नियम क्या है, प्रतिरोध किसे कहते है?

Class 10 Science chapter 12 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 Electricity (विद्युत)
content Class 10 Science chapter 12 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
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NCERT class 10 science chapter 12 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 12 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 12

विद्युत

Electricity


विद्युत ऊर्जा :-

किसी चालक में विद्युत आवेश प्रवाहित होने से जो ऊर्जा व्यय होती है उसे विद्युत ऊर्जा कहते हैं ।

यदि किसी चालक के सिरों के बीच विभवांतर V वोल्ट हो , तो q कूलॉम आवेश के चालक के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले जाने में व्यय विद्युत ऊर्जा w = qv

विद्युत परिपथ :-

किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते है ।

आवेश :-

आवेश परमाणु का एक मूल कण होता है । यह धनात्मक भी हो सकता है और ऋणात्मक भी । समान आवेश एक – दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं । असमान आवेश एक – दूसरे को आकर्षित करते हैं ।

कूलॉम ( c ) आवेश का SI मात्रक है ।
1 कूलॉम आवेश = 6 × 10¹⁸ इलेक्ट्रानों पर उपस्थित आवेश
1 इलेक्ट्रॉन पर आवेश = 1.6 × 10⁻¹⁹C ( ऋणात्मक आवेश )
Q = ne
Q = कुल आवेश
n = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
e = एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश
विधुत धारा :-

आवेश के प्रवाहित होने की दर को विद्युत धारा कहते हैं ।

विद्युत धारा = आवेश/समय यानी I = Q/t
धारा का SI मात्रक = ऐम्पियर ( A )
एक ऐम्पियर विद्युत धारा की रचना प्रति सेकंड एक कूलॉम आवेश के प्रवाह से होती है , अर्थात 1A = 1 C / 1s अल्प परिमाण की विद्युत धारा को मिलिऐम्पियर ( 1 mA = 10-³A ) अथवा माइक्रोऐम्पियर ( 1μA = 10-⁶A ) में व्यक्त करते हैं ।

1A =1C ( 1 कूलाम ) / 1S ( 1 सेकंड )
1m A = 1 मिलि ऐम्पियर = 10-³A
1μA = 1 माइक्रो ऐम्पियर = 10-⁶A
विधुत धारा का मापन :-

विधुत धारा को ऐमीटर द्वारा मापा जाता है । ऐमीटर का प्रतिरोध कम होता है तथा हमेशा श्रेणी क्रम में जुड़ता है ।

विद्युत धारा की दिशा इलेक्ट्रॉन के प्रवाहित होने की दिशा के विपरीत मानी जाती है । क्योंकि जिस समय विद्युत की परिघटना का सर्वप्रथम प्रेक्षण किया था इलेक्ट्रानों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी अतः विद्युत धारा को धनावेशों का प्रवाह माना गया ।

विधुत विभव :-

किसी बिन्दु पर स्थित ईकाई विन्दुवत धनावेश में संग्रहित वैधुत स्थितिज ऊर्जा उस विन्दु के विद्युत विभव के बराबर होती है ।

विभवांतर ( V ) :-

एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक लाने में किया गया कार्य विधुत विभवांतर कहलाता है । विधुत विभवांतर का मात्रक ( V ) वोल्ट है ।

बिंदुओं के बीच विभवांतर ( V ) = किया गया कार्य ( W ) / आवेश ( Q ) अर्थात V = W / Q

विभवांतर 1 वोल्ट :-

1 वोल्ट :- जब 1 कूलॉम आवेश को लाने के लिए 1 जूल का कार्य होता है तो विभवांतर 1 वोल्ट कहलाता है ।

1V = 1JC⁻¹

वोल्ट मीटर :-

विभवांतर को मापने की युक्ति को वोल्टमीटर कहते है । इसका प्रतिरोध ज्यादा होता है तथा हमेशा पार्श्वक्रम में जुड़ता है ।

सेल :-

यह एक सरल युक्ति है जो विभवांतर को बनाए रखती है । विद्युत धारा हमेशा उच्च विभवांतर से निम्न विभवांतर की तरफ प्रवाहित होती है ।

ओम का नियम :-

किसी विद्युत परिपथ में धातु के तार के दो सिरों के बीच विभवांतर उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के समानुपाती होता है परन्तु तार का तापमान समान रहना चाहिए । इसे ओम का नियम कहते हैं । दूसरे शब्दों में :-

V × R
V = IR
R एक नियतांक है जिसे तार का प्रतिरोध कहते हैं ।

प्रतिरोध :-

यह चालक का वह गुण है जिसके कारण वह प्रवाहित होने वाली धारा का विरोध करता है ।

प्रतिरोध का SI मात्रक ओम है । इसे ग्रीक भाषा के शब्द Ω से निरूपित करते हैं । ओम के नियम के अनुसार :- R = V/I

1 ओम = 1 वोल्ट / 1 एम्पियर
जब परिपथ में से 1 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही हो तथा विभवांतर एक वोल्ट का हो तो प्रतिरोध 1 ओम कहलाता है ।

परिवर्ती प्रतिरोध :-

स्रोत की वोल्टता में बिना कोई परिवर्तन किए परिपथ की विद्युत धारा को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले अवयव को परिवर्ती प्रतिरोध कहते हैं ।

धारा नियंत्रक :-

परिपथ में प्रतिरोध को परिवर्तित करने के लिए जिस युक्ति का उपयोग किया जाता है उसे धारा नियंत्रक कहते हैं ।

वे कारक जिन पर एक चालक का प्रतिरोध निर्भर करता है :-

चालक की लम्बाई के समानुपाती होता है ।
अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है ।
तापमान के समानुपाती होता है ।
पदार्थ की प्रकृति पर भी निर्भर करता है ।

प्रतिरोधता :-

1 मीटर भुजा वाले घन के विपरीत फलकों में से धारा गुजरने पर जो प्रतिरोध उत्पन्न होता है वह प्रतिरोधता कहलाता है ।

प्रतिरोधकता का SI मात्रक Ωm है ।

प्रतिरोधकता चालक की लम्बाई व अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के साथ नहीं बदलती परन्तु तापमान के साथ परिवर्तित होती है ।
धातुओं व मिश्रधातुओं का प्रतिरोधकता परिसर – 10⁻⁸ -10⁻⁶ Ωm ।
मिश्र धातुओं की प्रतिरोधकता उनकी अवयवी धातुओं से अपेक्षाकृतः अधिक होती है ।
मिश्र धातुओं का उच्च तापमान पर शीघ्र ही उपचयन ( दहन ) नहीं होता अतः इनका उपयोग तापन युक्तियों में होता है ।
तांबा व ऐलूमिनियम का उपयोग विद्युत संरचरण के लिए किया जाता है क्योंकि उनकी प्रतिरोधकता कम होती है ।

प्रतिरोधकों का श्रेणी क्रम संयोजन :-

श्रेणीक्रम संयोजन :- जब दो या तीन प्रतिरोधकों को एक सिरे से दूसरा सिरा मिलाकर जोड़ा जाता है तो संयोजन श्रेणीक्रम संयोजन कहलाता है ।

श्रेणीक्रम में कुल प्रभावित प्रतिरोध :-

RS = R₁ + R₂ + R₃
प्रत्येक प्रतिरोधक में से एक समान धारा प्रवाहित होती है ।

तथा कुल विभवांतर = व्यष्टिगत प्रतिरोधकों के विभवांतर का योग है ।

V = V₁ + V₂ + V₃
V₁ = IR₁ V₂ = IR₂ V₃ = IR₃
V₁ + V₂ + V₃ = IR₁ + IR₂ + IR₃
V = I(R₁ + R₂ + R₃) (V₁ + V₂ + V₃ = V)
IR = I(R₁ + R₂ + R₃)
R = R₁ + R₂ + R₃
अत : एकल तुल्य प्रतिरोध सबसे बड़े व्यक्तिगत प्रतिरोध से बड़ा है ।

पार्श्वक्रम में संयोजित प्रतिरोधक :-

पार्श्वक्रम संयोजन :- जब तीन प्रतिरोधकों को एक साथ बिंदुओं X तथा Y के बीच संयोजित किया जाता है तो संयोजन पार्श्वक्रम संयोजन कहलाता है ।

पार्श्वक्रम में प्रत्येक प्रतिरोधक के सिरों पर विभवांतर उपयोग किए गए विभवांतर के बराबर होता है । तथा कुल धारा प्रत्येक व्यष्टिगत प्रतिरोधक में से गुजरने वाली धाराओं के योग के बराबर होती है ।

I = I₁ + I₂ + I₃
एकल तुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम प्रथक ।
प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है ।

श्रेणीक्रम संयोजन की तुलना में पार्यक्रम संयोजन के लाभ :-

श्रेणीक्रम संयोजन में जब एक अवयव खराब हो जाता है तो परिपथ टूट जाता है तथा कोई भी अवयव काम नहीं करता ।
अलग – अलग अवयवों में अलग – अलग धारा की जरूरत होती है , यह गुण श्रेणी क्रम में उपयुक्त नहीं होता है क्योंकि श्रेणीक्रम में धारा एक जैसी रहती है ।
पार्श्वक्रम संयोजन में प्रतिरोध कम होता है ।

विधुत धारा का तापीय प्रभाव :-

यदि एक विद्युत् परिपथ विशुद्ध रूप से प्रतिरोधक है तो स्रोत की ऊर्जा पूर्ण रूप से ऊष्मा के रूप में क्षयित होती है , इसे विद्युत् धारा का तापीय प्रभाव कहते हैं ।

ऊर्जा = शक्ति x समय
H = P × t
H = VIt। P = VI
H = I²Rt V = IR
H = ऊष्मा ऊर्जा

अत : उत्पन्न ऊर्जा ( ऊष्मा ) = I²Rt
जूल का विद्युत् धारा का तापन नियम : इस नियम के अनुसार :-

किसी प्रतिरोध में तत्पन्न उष्मा विद्युत् धारा के वर्ग के समानुपाती होती है ।
प्रतिरोध के समानुपाती होती है ।
विद्युत धारा के प्रवाहित होने वाले समय के समानुपाती होती है ।
तापन प्रभाव हीटर , प्रेस आदि में वांछनीय होता है परन्तु कम्प्यूटर , मोबाइल आदि में अवांछनीय होता है ।

विद्युत बल्ब में अधिकांश शक्ति ऊष्मा के रूप प्रकट होती है तथा कुछ भाग प्रकाश के रूप में उत्सर्जित होता है ।

विद्युत बल्ब का तंतु टंगस्टन का बना होता है क्योंकि :-

यह उच्च तापमान पर उपचयित नहीं होता है ।
इसका गलनांक उच्च ( 3380 ° C ) है ।
बल्बों में रासानिक दृष्टि से अक्रिय नाइट्रोजन तथा आर्गन गैस भरी जाती है जिससे तंतु की आयु में वृद्धि हो जाती है ।

विधुत शक्ति :-

कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं । ऊर्जा के उपभुक्त होने की दर को भी शक्ति कहते हैं ।

किसी विद्युत परिपथ में उपभुक्त अथवा क्षयित विद्युत ऊर्जा की दर प्राप्त होती है । इसे विद्युत शक्ति भी कहते हैं । शक्ति P को इस प्रकार व्यक्त करते हैं । P = VI

शक्ति का SI मात्रक = वाट है ।
1 वाट 1 वोल्ट × 1 ऐम्पियर
ऊर्जा का व्यावहारिक मात्रक = किलोवाट घंटा ( Kwh )
1 kwh = 3.6 x 10⁶J
1 kwh = विद्युत ऊर्जा की एक यूनिट


Class 10 science chapter 12  Important Question Answer

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01. मान लीजिए किसी वैदयुत्‌ अवयव के दो सिरों के बीच विभवांतर को उसके पूर्व के विभवांतर की तुलना में घटाकर आधा कर देने पर भी उसका प्रतिरोध नियत रहता है। तब उस अवयव से प्रवाहित होने वाली विद्युतूधारा में कया परिवर्तन होगा ?

उत्तर– यदि एक विद्युत अवयव के दोनों सिरों के बीच विभवांतर को उसके पूर्व के विभवांतर की तुलना में आधा कर देने पर उनमें प्रवाहित विद्युतूधारा भी घटकरm आधी हो जाती है। क्योंकि I = V/R , विभवांतर के V/2 होने पर, विद्युतूधारा ½ हो जाएगी परंतु प्रतिरोध में कोई बदलाव नहीं होगा।

02. श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैद्युत्‌ युक्तियों को पार्श्व क्रम में संयोजित करने के क्या लाभ हैं?

उत्तर– पार्श्वक्रम में संयोजित करने के लाभ होते हैं-

(a) प्रतिरोधों को पार्श्वक्रम में जोड़ने से किसी भी चालक में स्विच की सहायता से विद्युतूधारा स्वतंत्रतापूर्वक भेजी अथवा रोकी जा सकती है।

(2) ऐसा करने से सभी समांतर शाखाओं के सिरों के बीच का विभवांतर बराबर होता है। इसलिए लैंप, बिजली की प्रैस, रेफ्रीजरेटर, रेडियो आदि को एक ही विभव पर प्रचलन के योग्य बनाया जा सकता है।

03. किसी विद्युत्‌ हीटर की डोरी क्यों उत्तप्त नहीं होती जबकि उसका तापन अवयव उत्तप्त हो जाता है?

उत्तर– विद्युत्‌ हीटर की डोरी कॉपर के मोटे तार की बनी होती है, जिसका प्रतिरोध उसके अवयव की उपेक्षा बहुत कम होता है। इसलिए यदि इन दोनों में से एक समान विद्युत धारा प्रवाहित हो तो अवयव का तापन I2 Rt डोरी के तापन की अपेक्षा बहुत अधिक होगा, इस प्रकार अवयव अत्यधिक गर्म होकर उत्तप्त होता है परंतु डोरी उत्तप्त नहीं होती क्योंकि वह अधिक गर्म नहीं होती ।

04 . श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैद्युत्‌ युक्तियों को पार्श्व क्रम में संयोजित करने के क्या लाभ हैं?

उत्तर– पार्श्वक्रम में संयोजित करने के लाभ होते हैं-

(a) प्रतिरोधों को पार्श्वक्रम में जोड़ने से किसी भी चालक में स्विच की सहायता से विद्युतूधारा स्वतंत्रतापूर्वक भेजी अथवा रोकी जा सकती है।

(2) ऐसा करने से सभी समांतर शाखाओं के सिरों के बीच का विभवांतर बराबर होता है। इसलिए लैंप, बिजली की प्रैस, रेफ्रीजरेटर, रेडियो आदि को एक ही विभव पर प्रचलन के योग्य बनाया जा सकता है।

05. विद्युत टोस्टरों तथा विद्युत्‌ इस्तरियों के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर किसी मिश्रधातु के क्यों बनाए जाते हैं?

उत्तर– विद्युत्‌ टोस्टरों तथा विद्युत्‌ इस्तरियों के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर ‘एक मिश्रधातु के बनाए जाते हैं । इसके निम्नलिखित कारण हैं–

(1) मिश्रधातु (Ni + Cr + Mn + Fe) का प्रतिरोध अधिक होता है।

(2) इसका गलनांक अधिक होता है।

(3) उच्च तापमान पर इसका ऑक्सीकरण नहीं होता।

06. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर तालिका 12.2 में दिए गए आँकड़ों के आधार पर दीजिए

(a) आयरन (Fe) तथा मरकरी (Hg) में कौन अच्छा विद्युत्‌ चालक है ?

(b) कौन-सा पदार्थ सर्वश्रेष्ठ चालक है?

उत्तर– (a) मरकरी की अपेक्षा आयरन अच्छा विद्युत चालक है क्योंकि आयरन की अवरोधता मरकरी की अपेक्षा कम है।

(b) चाँदी सर्वश्रेष्ठ चालक है क्योंकि इसकी अवरोधता न्यूनतम 1.60 × 10–8 Ωm है

 


Class 10 science chapter 12  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. विद्युत धारा के प्रवाह की दिशा किस प्रकार ज्ञात की जाती है ?
(a) इलेक्ट्रॉनों के बहने की दिशा के विपरीत
(b) धनात्मक आवेश के बहने की दिशा में
(c) इलेक्ट्रॉनों के बहने की दिशा में
(d) (a) और (b) दोनों

► (d) (a) और (b) दोनों

2. विद्युत परिपथ क्या है ?
(a) विद्युत धारा का सतत व बंद पथ
(b) विद्युत धारा का खुला पथ
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं

► (a) विद्युत धारा का सतत व बंद पथ

3. विदयुत धारा के लिए गणितीय वयंजक क्या है ? (Q=आवेश ,t= समय (सेकन्ड में)
(a) I = Q × t
(b) I = Q/t
(c) I = Q + t
(d) I = Q – t

► (b) I = Q/t

4. विदयुत धारा के प्रवाह की दिशा किस प्रकार ज्ञात की जाती है ?
(a) इलेक्ट्रॉनों के बहने की दिशा के विपरीत
(b) धनात्मक आवेश के बहने की दिशा में
(c) इलेक्ट्रॉनों के बहने की दिशा में
(d) (a) और (b) दोनों

► (d) (a) और (b) दोनों

5. विद्युत आवेश का SI मात्रक क्या है ?
(a) कूलॉम (c)
(b) वोल्ट (w)
(c) ओम (om)
(d) मीटर (m)

► (a) कूलॉम (c)
6. किसी तार में से 3 सेकंड में 30 कूलॉम आवेश प्रवाहित होता है ! तार में से (ऐम्पियर में ) कितनी धारा बह रही है?
(a) 3.3
(b) 10
(c) 90
(d) 30

► (b) 10

7. ऐमीटर का उपयोग क्या मापने के लिए किया जाता है ?
(a) विद्युत धारा
(b) विभवान्तर
(c) प्रतिरोध
(d) विद्युत शक्ति

► (a) विद्युत धारा

8. दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर को कैसे निकाला जा सकता है ? (W = किया गया कार्य ,Q = आवेश)
(a) V=WQ
(b) V=W/Q
(c) V=I/Q
(d) V=W+Q

► (b) V=W/Q

9. सुचालक के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक आवेश का विस्थापित करने में किया गया कार्य क्या कहलाता है ?
(a) विद्युत विभव
(b) विद्युत क्षेत्र
(c) विभवान्तर
(d) विद्युत धारा

► (c) विभवान्तर

Class 10 Science Chapter 12 Notes in Hindi

10. किस यंत्र द्वारा विभवान्तर को मापा जाता है ?
(a) ऐमीटर
(b) हाइड्रोमीटर
(c) गैल्वेनोमीटर
(d) वोल्टमीटर

► (d) वोल्टमीटर

11. 10 वोल्ट विभव वाले एक आवेशित सुचालक के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक 1 कूलॉम आवेश को विस्थापित करने में किए गए कार्य का मान कितना होगा ?
(a) 1 जूल
(b) 10 जूल
(c) शून्य
(d) 100 जूल

► (b) 10 जूल

12. 12 V विभवान्तर के दो बिन्दुओं के बीच 2C आवेश को ले जाने में कितना कार्य किया जाता है ?
(a) 20 J
(b) 24 J
(c) 26 J
(d) 30 J

► (b) 24 J

13. परिपथ में दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर को बनाए रखने के लिए कौन-सा यंत्र प्रयोग में लाया जाता है ?
(a) परिपथ
(b) धारा
(c) तार
(d) सेल

► (d) सेल

14. कौन -सा नियम विभवान्तर तथा विदयुत धारा के बीच संबंध दर्शाता
(a) फैराडे का नियम
(b) ऑरस्टेड का नियम
(c) ओम का नियम
(d) न्यूटन का नियम

► (c) ओम का नियम

15. विद्युत परिपथ किससे मिलकर बनता है ?
(a) प्लग कुंजी
(b) सेल अथवा एक बैटरी
(c) वैधुत अवयव तथा संयोजी तारों से
(d) उपरोक्त सभी

► (d) उपरोक्त सभी

Class 10 Science Chapter 12 vvi question

16. विभवान्तर (C) तथा विद्युत धारा (1) के बीच ग्राफ कैसा होता है ?
(a) सीधी रेखा
(b) वक्र रेखा
(c) S आकृति की रेखा
(d) X-अक्ष के समांतर

► (a) सीधी रेखा

17. आवेश के प्रवाह का विरोध कौन करता है ?
(a) प्रतिरोध (R)
(b) विभवान्तर (v)
(c) विद्युत धारा (I)
(d) उपरोक्त सभी

► (a) प्रतिरोध (R)

18. यदि प्रतिरोध दोगुना हो जाए तो विद्युत धारा कितनी हो जाती है ?
(a) आधी
(b) दोगुनी
(c) चार गुना
(d) आठ गुना

► (a) आधी

 


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Class 10 Science Chapter 11 Notes in Hindi | मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार

Class 10 Science Chapter 11 Notes in Hindi : covered science Chapter 11 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार क्या है किसे कहते है, मानव नेत्र के क्या क्या भाग व्होटे है, एवं उनके कार्य है, मोतियाबिंद क्या है, निकट – दृष्टि दोष किसे कहते है,  दीर्घ – दृष्टि दोष दीर्घ किसे कहते है, प्रिज्म किसे कहते है, विचलन  क्या है, इंद्रधनुष कैसे बनता है,

Class 10 Science Chapter 11 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 human eye and colorful world (मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार)
content Class 10 Science Chapter 11 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science Chapter 11 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 11 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 11

मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार

human eye and colorful world


 

मानव नेत्र :-    यह एक अत्यंत मूल्यावान एवं सुग्राही ज्ञानेंद्रिय है । मानव नेत्र एक कैमरे के भांति कार्य करता है । जो हमें चारों ओर के रंगबिरंगे संसार को देखने योग्य बनाता है । यह दृष्टिपटल पर उल्टा , वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है । यह नेत्र गोलक में स्थित होते हैं । नेत्र गोलक का व्यास लगभग 2.3 cm होता है ।

मानव नेत्र के विभिन्न भाग एवं उनके कार्य :-

दृढ़ पटल :- मनुष्य का नेत्र लगभग एक खोखले गोले के समान होता है । इसकी सबसे बाहरी पर्त , अपारदर्शी , श्वेत तथा दृढ़ होती है । इसे दृढ़ पटल कहते हैं । इसके द्वारा नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा होती है ।

रक्तक पटल :- दृढ़ पटल के भीतरी पृष्ठ से लगी काले रंग की एक झिल्ली होती है , जिसे रक्तक पटल कहते हैं । यह नेत्र के भीतरी भागों में परावर्तन रोकती है ।

श्वेत मंडल / कॉर्निया :- नेत्र के अग्र भाग पर एक पारदर्शी झिल्ली होती है जिसे श्वेत मंडल या कॉर्निया कहते है । नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणों का अधिकांश अपवर्तन कॉर्निया के बाहरी पृष्ठ पर होता है ।

नेत्र गोलक :- इसकी आकृति लगभग गोलाकार होती है । इसका व्यास लगभग 2.3cm होती है ।

लेंस :- यह एक उत्तल लेंस है जो प्रकाश को रेटिना पर अभिसरित करता है । यह एक रेशेदार जहेलीवत पदार्थ का बना होता है । लेंस केवल विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को रेटिना पर क्रेन्द्रित करने के लिए आवश्यक फोकस दूरी में सूक्ष्म समायोजन करता है ।

परितारिका :- कॉर्निया के पीछे एक गहरा पेशीय डायफ्राम होता है जो पुतली के आकार को नियंत्रित करता है ।

पुतली :- यह परिवर्ती द्धारक की भांति कार्य करती है । जिसका साइज परितारिका की सहायता से बदला जाता है । यह आंख में प्रवेश होने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करती है ।

अभिनेत्र लैंस :- यह एक उत्तल लैस है । जो प्रकाश को रेटिना पर अभिसारित करता है और वस्तु का उल्टा तथा वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है । यह एक रेशेदार जेलीवत पदार्थ का बना होता है ।

पक्ष्भामी पेशियां :- अभिनेत्र लैंस की वक्रता को नियंत्रित करती है । अभिनेत्र लैंस की वक्रता में परिवर्तन होने पर इसकी फोकस दूरी भी परिवर्तित हो जाती है ताकि हम वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब देख सकें ।

रेटीना :- यह एक कोमल सूक्ष्म झिल्ली है जिसमें प्रकाश सुग्राही कोशिकाएं अधिक संख्या में पाई जाती हैं । प्रदीप्त होने पर प्रकाश – सुग्राही कोशिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा विद्युत सिग्नल पैदा करती हैं । ये सिग्नल दृक् तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचा दिए जाते हैं । मस्तिष्क इन सिग्नलों की व्याख्या करता है और हम वस्तुओं को देख पाते हैं ।

दूर बिंदु :- वह दूरतम बिंदु जिस तक कोई नेत्र वस्तुओं को सुस्पष्ट देख सकता है , नेत्र का दूर – बिंदु कहलाता है । सामान्य नेत्र के लिए यह अनंत दूरी पर होता है ।

निकट बिंदु :- वह न्यूनतम दूरी जिस पर रखी कोई वस्तु बिना तनाव के अत्यधिक स्पष्ट देखी जा सकती है , उसे नेत्र का निकट बिंदू कहते हैं ।

समंजन क्षमता :-

अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित कर लेता है समंजन कहलाती है ।

सुस्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी :-

किसी सामान्य दृष्टि के कारण वयस्क के लिए निकट बिंदू आँख से लगभग 25cm की दूरी पर होता है । इसे सुस्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी भी कहते हैं ।

दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन

मोतियाबिंद :-

अधिक उम्र के कुछ व्यक्तियों के नेत्र का क्रिस्टलीय लेंस दूधिया तथा धुँधला हो जाता है । इस स्थिति को मोतियाबिंद कहते हैं । इसके कारण नेत्र की दृष्टि में कमी या पूर्ण रूप से दृष्टि क्षय हो जाती है ।

मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा के बाद दृष्टि का वापस लौटना संभव होता है ।

निकट – दृष्टि दोष :-

इस दोष में व्यक्ति निकट रखी वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है परंतु दूर रखी वस्तुओं को वह सुस्पष्ट नहीं देख पाता । ऐसे दोषयुक्त व्यक्ति का दूर – बिंदु अनंत पर न होकर नेत्र के पास आ जाता है ।

दोष उत्पन्न होने के कारण :-

अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक होना ।
नेत्र गोलक का लंबा हो जाना ।
निवारण :-

इस दोष को किसी उपयुक्त क्षमता के अवतल लेंस ( अपसारी लेंस ) के उपयोग द्वारा संशोधित किया जा सकता है । उपयुक्त क्षमता का अवतल लेंस वस्तु के प्रतिबिंब को वापस दृष्टिपटल ( रेटिना ) पर ले आता है , तथा इस प्रकार इस दोष का संशोधन हो जाता है ।

दीर्घ – दृष्टि दोष दीर्घ :-

दृष्टि दोषयुक्त कोई व्यक्ति दूर की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है परंतु निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता । ऐसे दोषयुक्त व्यक्ति का निकट – बिंदु सामान्य निकट बिंदु ( 25cm ) से दूर हट जाता है ।

दोष उत्पन्न होने के कारण :-

अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का अत्यधिक हो जाना ।
नेत्र गोलक का छोटा हो जाना ।
निवारण :-

इस दोष को उपयुक्त क्षमता के अभिसारी लेंस ( उत्तल लेंस ) का उपयोग करके संशोधित किया जा सकता है । उत्तल लेंस युक्त चश्मे दृष्टिपटल पर वस्तु का प्रतिबिंब फोकसित करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त क्षमता प्रदान करते हैं ।

जरा – दूरदृष्टिता :-

आयु में वृद्धि होने के साथ – साथ मानव नेत्र में समंजन – क्षमता घट जाती है । अधिकांश व्यक्तियों का निकट – बिंदु दूर हट जाता है । इस दोष को जरा – दूरदृष्टिता कहते हैं ।

दोष उत्पन्न होने के कारण :-

यह पक्ष्माभी पेशियों के धीरे – धीरे दुर्बल होने तथा क्रिस्टलीय लेंस के लचीलेपन में कमी आने के कारण उत्पन्न होता है ।

निवारण :-

उत्तल लेंस के प्रयोग से ।

कभी – कभी किसी व्यक्ति के नेत्र में दोनों ही प्रकार के दोष निकट – दृष्टि तथा दूर – दृष्टि दोष होते हैं ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रायः द्विफोकसी लेंसों की आवश्यकता होती ऊपरी भाग अवतल लेंस और निचला भाग उत्तल लेंस होता है ।

आजकल संस्पर्श लेंस ( Contact lens ) अथवा शल्य हस्तक्षेप द्वारा दृष्टि दोषों का संशोधन संभव है ।

दोनों नेत्रों का सिर पर सामने की ओर स्थित होने का लाभ :-

इससे हमें त्रिविम चाक्षुकी का लाभ मिलता है ।
इससे हमारा दृष्टि – क्षेत्र विस्तृत हो जाता है ।
इससे हम धुंधली चीजों को भी देख पाते हैं ।

प्रिज्म से प्रकाश अपवर्तन :-

प्रिज्म के दो त्रिभुजाकार आधार तथा तीन आयताकार पार्श्व – पृष्ठ होते हैं ।

प्रिज्म कोण :-

प्रिज्म के दो पार्श्व फलकों के बीच के कोण को प्रिज्म कोण कहते हैं ।

विचलन कोण :-

आपतित किरण एवं निर्गत किरण के बीच के कोण को विचलन कोण कहते हैं ।

काँच के प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश का विक्षेपण :-

सूर्य का श्वेत प्रकाश जब प्रिज्म से होकर गुजरता है तो प्रिज्म श्वेत प्रकाश को सात रंगों की पट्टी में विभक्त कर देता है । यह सात रंग है :- बैंगनी , जामुनी , नीला , हरा , पीला , नारंगी तथा लाल । प्रकाश के अवयवी वर्गों के इस बैंड को स्पेक्ट्रम ( वर्णक्रम ) कहते हैं । प्रकाश के अवयवी वर्गों में विभाजन को विक्षेपण कहते हैं ।

इंद्रधनुष :-

इंद्रधनुष वर्षा के पश्चात आकाश में जल के सूक्ष्म कणों में दिखाई देने वाला प्राकृतिक स्पेक्ट्रम है । यह वायुमंडल में उपस्थित जल की बूँदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के परिक्षेपन के कारण प्राप्त होता है । इंद्रधनुष सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में बनता है ।

जल की सूक्ष्म बूंदें छोटे प्रिज्मों की भाँति कार्य करती है । सूर्य के आपतित प्रकाश की ये बूंदें अपवर्तित तथा विक्षेपित करती हैं , तत्पश्चात इसे आंतरिक परावर्तित करती हैं , अंततः जल की बूँद से बाहर निकलते समय प्रकाश को पुनः अपवर्तित करती है । प्रकाश के परिक्षेपण तथा आंतरिक परावर्तन के कारण विभिन्न वर्ण प्रेक्षक के नेत्रों तक पहुँचते हैं ।

किसी प्रिज्म से गुजरने के पश्चात , प्रकाश के विभिन्न वर्ण , आपतित किरण के सापेक्ष अलग – अलग कोणों पर झुकते हैं ।

लाल प्रकाश सबसे कम झुकता है जबकि बैंगनी प्रकाश सबसे अधिक झुकता है ।

आइजक न्यूटन :-

आइजक न्यूटन ने सर्वप्रथम सूर्य का स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के लिए काँच के प्रिज्म का उपयोग किया । एक दूसरा समान प्रिज्म उपयोग करके उन्होंने श्वेत प्रकाश के स्पेक्ट्रम के वर्गों को और अधिक विभक्त करने का प्रयत्न किया । किंतु उन्हें और अधिक वर्णों नहीं मिल पाए ।

फिर उन्होंने एक दूसरा सर्वसम प्रिज्म पहले प्रिज्म के सापेक्ष उल्टी स्थिति में रखा । उन्होंने देखा कि दूसरे प्रिज्म से श्वेत प्रकाश का किरण पुंज निर्गत हो रहा है । इससे न्यूटन ने यह निष्कर्ष निकाला कि सूर्य का प्रकाश सात वर्गों से मिलकर बना है ।

वायुमंडलीय अपवर्तन :-

वायुमंडलीय अस्थिरता के कारण प्रकाश का अपवर्तन वायुमंडलीय अपवर्तन कहलाता है ।

वायुमंडलीय अपवर्तन के प्रभाव :-

तारों का टिमटिमाना
अग्रिम सूर्योदय तथा विलम्बित सूर्यास्त
तारों का वास्तविक स्थिति से कुछ ऊँचाई पर प्रतीत होना ।
गरम वायु में से होकर देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति का परिवर्तित होना ।
1. तारों का टिमटिमाना :- दूर स्थित तारा हमें प्रकाश के बिंदु स्रोत के समान प्रतीत होता है । चूंकि तारों से आने वाली प्रकाश किरणों का पथ थोड़ा – थोड़ा परिवर्तित होता रहता है , अत : तारे की आभासी स्थिति विचलित होती रहती है तथा आँखों में प्रवेश करने वाले तारों के प्रकाश की मात्रा झिलमिलाती रहती है । जिसके कारण कोई तारा कभी चमकीला प्रतीत होता है तो कभी धुंधला , जो कि टिमटिमाहट का प्रभाव है ।

2. अग्रिम सूर्योदय तथा विलम्बित सूर्यास्त :- वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य हमें वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पूर्व दिखाई देने लगता है तथा वास्तविक सूर्यास्त के लगभग 2 मिनट पश्चात् तक दिखाई देता रहता है ।

3. तारों का वास्तविक स्थिति से कुछ ऊँचाई पर प्रतीत होना :- पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने के पश्चात् पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचने तक तारे का प्रकाश निरंतर अपवर्तित होता जाता है । वायुमंडलीय अपवर्तन उसी माध्यम में होता है जिसका क्रमिक परिवर्ती अपवर्तनांक हो । क्योंकि वायुमंडल तारे के प्रकाश को अभिलंब की ओर झुका रहता है अतः क्षितिज के निकट देखने पर कोई तारा अपनी वास्तविक स्थिति से कुछ ऊँचाई पर प्रतीत होता है ।

04. गरम वायु में से होकर देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति का परिवर्तित होना :- आग के तुरंत ऊपर की वायु अपने ऊपर की वायु को तुलना में अधिक गरम हो जाती है । गरम वायु अपने ऊपर की ठंडी वायु की तुलना में कम सघन होती है तथा इसका अपवर्तनांक ठंडी वायु की अपेक्षा थोड़ा कम होता है । क्योंकि अपवर्तक माध्यम ( वायु ) की भौतिक अवस्थाएँ सिथर नहीं हैं । इसलिए गरम वायु में से होकर देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति परिवर्तित होती रहती है ।

प्रकाश का प्रकीर्णन :-

टिंडल प्रभाव :-

जब कोई प्रकाश किरण का पुंज वायुमण्डल के महीन कणों जैसे धुआँ , जल की सूक्ष्म बूंदें , धूल के निलंबित कण तथा वायु के अणु से टकराता है तो उस किरण पुंज का मार्ग दिखाई देने लगता है । कोलाइडी कणों के द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन की परिघटना टिंडल प्रभाव उत्पन्न करती है ।

उदाहरण :-

जब धुएँ से भरे किसी कमरे में किसी सूक्ष्म छिद्र से कोई पतला प्रकाश किरण पुंज प्रवेश करता है तो हम टिंडल प्रभाव देख सकते हैं ।
जब किसी घने जंगल के वितान से सूर्य का प्रकाश गुजरता है तो भी टिन्डल प्रभाव को देखा जा सकता है ।
Rayleigh का नियम :-

प्रकीर्णित a=1/λ⁴
λ- प्रकाश किरण की तरंग दैर्ध्य

प्रकीर्णित प्रकाश का वर्णन किस पर निरभर करता है :-

प्रकीर्णित प्रकाश का वर्णन प्रकीर्णन न करने वाले कणों के आकार पर निर्भर करता है । जैसे :;

अत्यंत सूक्ष्म कण मुख्य रूप से नीले प्रकाश को प्रकीर्ण करते हैं ।
बड़े आकार के कण अधिक तरंगदैर्ध्य के प्रकाश को प्रकीर्ण करते हैं ।
यदि प्रकीर्णन करने वाले कणों का साइज बहुत अधिक है तो प्रकीर्णित प्रकाश श्वेत भी प्रतीत हो सकता है ।

ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते ?

तारों की अपेक्षा पृथ्वी के काफी नजदीक होते हैं । इसलिए उसे प्रकाश का बड़ा स्रोत माना जाता है । यदि गृह की प्रकाश के बिंदु स्रोतों का संग्रह माने तो प्रत्येक स्रोत द्वारा , हमारे आँखों में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा में कुल परिवर्तत का औसत मान शून्य होगा , जिस कारण ग्रह टिमटिमाते नहीं ।

‘ खतरे ‘ का संकेत लाल रंग का क्यों होता है ?

खतरे ‘ के संकेत का प्रकाश लाल रंग का होता है । लाल रंग कुहरे या धुएँ से सबसे कम प्रकीर्ण होता है । इसलिए यह दूर से देखने पर भी दिखाई देता है ।

स्वच्छ आकाश का रंग नीला क्यों होता है ?

वायुमंडल में वायु के अणु तथा अन्य सूक्ष्म कणों का आकार दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य के प्रकाश की अपेक्षा छोटा है । ये कण कम तरंगदैर्ध्य के प्रकाश को प्रकीर्णित करने में अधिक प्रभावी हैं ।

लाल वर्ण के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य नीले प्रकाश की अपेक्षा 1.8 गुनी है ।

अतः जब सूर्य का प्रकाश वायुमंडल से गुजरता है , वायु के सूक्ष्म कण लाल रंग की अपेक्षा नीले रंग को अधिक प्रबलता से प्रकीर्ण करते हैं । प्रकीर्णित हुआ नीला प्रकाश हमारे नेत्रों में प्रवेश करता है ।

ऊँचाई पर उड़ते हुए यात्रियों को आकाश काला क्यों प्रतीत होता है ?

क्योंकि इतनी ऊँचाई पर प्रकीर्णन सुस्पष्ट नहीं होता ।

बादल सफेद क्यों प्रतीत होते हैं ?

बादल सूक्ष्म पानी की बूंदों से बने होते हैं ये सूक्ष्म बूंदों का आकार दृश्य किरणों की तरंगदैर्ध्य की सीमा से अधिक है । इसलिए जब श्वेत प्रकाश इन कणों से टकराता है तो सभी दिशा में परावर्तित या प्रकीर्ण हो जाता है । क्योंकि श्वेत प्रकाश के सभी रंग परावर्तित या प्रकीर्ण अधिकतम समान रूप से होते हैं । इसलिए हमें श्वेत रंग ही दिखाई देता है ।


Class 10 science Chapter 11  Important Question Answer

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01. नेत्रा की समंजन क्षमता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
मानव को दूर तथा पास की वस्तुएँ पूर्णत: देखते के लिए नेत्र सुनियोजित करते पड़ते है | इस प्रकार मानव के अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता जिससे वह अपनी फोकस दुरी कोण सुनियोजित कर लेता है , समाजंन क्षमता कहलाती है |

02. अंतिम पंक्ति में बैठे किसी विद्यार्थी को श्यामपट्ट पढ़ने में कठिनाई होती है। यह विद्यार्थी किस दृष्टि दोष से पीडि़त है? इसे किस प्रकार संशोधित किया जा सकता है?
उत्तर :
इस विद्यार्थी को निकट – दृष्टि दोष है निकट दृष्टि दोष ( मायोपिया ) को किसी उपयुक्त क्षमता के अवतल लेंस द्वारा संशोधित किया जाता है |

03. सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर :
मानव की सुस्पष्ट देखने की न्यूनतम दुरी 25cm है | 25cm से कम दुरी पर रखी हुई वस्तु से टकरकार प्रतिबिंब हुए प्रकाश की किरणों का दृष्टिपटल पर वस्तु सुस्पष्ट नहीं दिखाई देगी | क्योंकि मानव नेत्र की क्षमता 25cm से बढाई नहीं जा सकता है |

04. जब हम नेत्रा से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं तो नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी का क्या होता है?
उत्तर :
प्रतिबिंब दूरी सदैव एक जैसी रहती है | इसका कारण है कि वस्तु की दुरी मानव नेत्र के लेंस की फोकस दुरी इस प्रकार समायोजित हो जाती है जिससे प्रतिबिंब दृष्टि पटल पर ही बने |

05. तारे क्यों टिमटिमाते हैं?
उत्तर :
पृथ्वी के वायुमंडल का अपवर्तनांक निरंतर परिवर्तित होता रहता है | आँखों में प्रवेश करने वाला तारों का प्रकाश निरंतर अपवर्तन के कारण अनियमित रहता है एवं उस झिलमिलाहट के कारण तारे टिमटिमाते हुए प्रतीत होते है |

06. व्याख्या कीजिए कि ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते ?
उत्तर :
ग्रहों से पृथ्वी की दुरी काफी कम है | ग्रह प्रकाश के भंडार होते है | जो प्रकाश किरणें ग्रहों से आती है उनमें अपवर्तन नहीं होता है | निकटता व प्रकाश का भंडार होने के साथ – साथ उनकी स्थिति में परिवर्तन नहीं होता अत: वे टिमटिमाते हुए प्रतीत नहीं होते |

07. सूर्योदय के समय सूर्य रक्ताभ क्यों प्रतीत होता है?
उत्तर :
सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय सूर्य क्षितिज पर होता है | उस स्थिति में सूर्य की किरणें पहले पृथ्वी के वायुमंडल में वायु की मोटी परतों तक पहुँचती है उसके पश्चात् हमारी आँखों तक | कम तंरग दैधर्य के प्रकाश के अधिकतर भाग का वायुमंडल के कणों द्वारा प्रकीर्णन हो जाता है | इस प्रकार केवल लंबी प्रकाश किरणें (लाल) हमारे नेत्रों में प्रवेश कर पाती है और हमें सूर्य रक्ताभ प्रतीत होती है |


Class 10 science Chapter 11  Important Objective Question Answer (MCQ)

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Q1. जो नेत्र निकट स्थित वस्तु को साफ नहीं देख सकता उस नेत्र में होता है
A.दूर दृष्टिदोष
B.निकट दृष्टि दोष
C.जरा दृष्टिदोष
D.वर्णांधता

Ans: निकट दृष्टि दोष
Q2. चन्द्रमा पर खड़े अंतरिक्ष यात्री को आकाश प्रतीत होता है
A.नीला
B.उजला
C.लाल
D.काला

Ans: काला
Q3. निकट दृष्टिदोष का निवारण किस लेंस से होता है?
A.उत्तल
B.अवतल
C.बाइफोकल
D.सिलिन्ड्रिकल

Ans: अवतल
Q4. स्पेक्ट्रम में किस रंग की किरण का झुकाव अधिक होता है?
A.लाल
B.पीला
C.बैंगनी
D.हरा

Ans: बैंगनी
Q5. प्रकाश के किस रंग का तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होता है?
A.बैंगनी
B.हरा
C.लाल
D.पीला

Ans: लाल
Q6. मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिंब है, वह है
A.कॉर्निया
B.परितारिका
C.पुतली
D.दृष्टि पटल

Ans: दृष्टि पटल
Q7. किसी वस्तु का प्रतिबिंब आँख के जिस भाग पर पड़ता है, वह है?
A.कॉर्निया
B.रेटिना
C.पुतली
D.आइरिस

Ans: रेटिना
Q8. मानव नेत्र में किस प्रकार का लेंस पाया जाता है?
A.उत्तल
B.अवतल
C.वलयाकार
D.बाइफोकल

Ans: उत्तल
Q9. स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के लिए किसका उपयोग होता है?
A.काँच की सिल्ली
B.अवतल दर्पण
C.उत्तल लेंस
D.प्रिज्म

Ans: प्रिज्म
Q10. दृश्य प्रकाश में किस वर्ण का तरंगदैर्घ्य अधिकतम होता है?
A.बैंगनी
B.लाल
C.नीला
D.पीला

Ans: लाल
Q11. सामान्य नेत्र के लिए सुस्पष्ट दर्शन की न्यूनतम दूरी होती है
A.25 m
B.2.5 m
C.25 cm
D.2.5 cm

Ans: 25 cm
Q12. मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिंब बनाते हैं वह है
A.कॉर्निया
B.परितारिका
C.पुतली
D.दृष्टिपटल

Ans: दृष्टिपटल
Q13. मानव नेत्र, अभिनेत्र लेंस की फोकस-दूरी समायोजित कर विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को फोकसित कर सकता है। ऐसा हो पाने का कारण है
A.जरा-दूरदृष्टिता
B.समंजन
C.निकट-दृष्टिता
D.दीर्घ-दृष्टिता

Ans: समंजन
Q14. अभिनेत्र लेंस की फोकस-दूरी में परिवर्तन किया जाता है
A.परितारिका द्वारा
B.पुतली द्वारा
C.दृष्टिपटल द्वारा
D.पक्ष्माभी पेशियों द्वारा

Ans: पक्ष्माभी पेशियों द्वारा
Q15. एक स्वस्थ आँख के दूरी बिन्दु होता है
A.25 सेमी
B.शून्य
C.250 सेमी
D.अनंत से 25 सेमी

Ans: अनंत से 25 सेमी
Q16. किस दृष्टि दोष को अवतल और उत्तल दोनों लेंसों से बने द्विफोकसी लेंस द्वारा संशोधित किया जा सकता है?
A.निकट दृष्टि दोष
B.दीर्घ-दृष्टि दोष
C.जरा-दूर दृष्टिता
D.मोतियाबिंद

Ans: जरा-दूर दृष्टिता
Q17. कैमरे की तरह नेत्र में प्रवेश करते प्रकाश के परिमाण को नियंत्रित करता है
A.कॉर्निया
B.लेंस
C.पुतली
D.आइरिस

Ans: आइरिस
Q18. मानव नेत्र में प्रकाश किस रास्ते प्रवेश करता है?
A.कॉर्निया
B.लेंस
C.पुतली
D.आइरिस

Ans: पुतली
Q19. आकाश का रंग नीला होने का कारण है
A.परावर्तन
B.प्रकीर्णन
C.अपवर्तन
D.इनमें से कोई नहीं

Ans: प्रकीर्णन
Q20. नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणों का अधिकांश अपवर्तन होता है
A.नेत्रोद अंतर पृष्ठ पर
B.अभिनेत्र के अंतरपृष्ठ पर
C.कॉर्निया के बाहरी पृष्ठ पर
D.इनमें से कोई नहीं

Ans: कॉर्निया के बाहरी पृष्ठ पर


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Class 10 Science Chapter 10 Notes in Hindi | प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन

Class 10 Science chapter 10 Notes in Hindi : covered science chapter 10 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन किसे कहते है, प्रकाश के परावर्तन के नियम कितने है, प्रतिबिंब किसे कहते है,  प्रतिबिंब के कितने प्रकार होते है, दर्पण किसे कहते है इस के किते प्रकार होते है, दर्पण सूत्र किसे कहते है  ,आवर्धन किसे कहते है,लेंस की क्षमता क्या होती है ?

Class 10 Science chapter 10 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 light reflection and refraction (प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन)
content Class 10 Science chapter 10 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science chapter 10 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 10 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 10

प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन

light reflection and refraction


प्रकाश :-

प्रकाश ऊर्जा का एक रूप है , जिसकी मदद से हम किसी भी वस्तु को देख पाते हैं , प्रकाश कहलाता है ।

प्रकाश के गुण :-

प्रकाश सरल ( सीधी ) रेखाओं में गमन करता है ।
प्रकाश विद्युत चुंबकीय तरंग है इसलिए इसे संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
प्रकाश अपारदर्शी वस्तुओं की तीक्ष्ण छाया बनाता है ।
प्रकाश की चाल निर्वात में सबसे अधिक है : 3 × 10⁸ m/s

प्रकाश का परावर्तन :-

जब प्रकाश – किरण किसी माध्यम से चलती हुई किसी चमकदार तल पर आपतित होती है तो वह तल से टकरा कर उसी माध्यम में वापस लौट आती है । यह प्रकाश का परावर्तन कहलाता है । जैसे :- प्रकाश का किसी दर्पण से टकराकर वापिस उसी माध्यम में वापस लौटना ।

प्रकाश के परावर्तन के नियम :-

प्रकाश के परावर्तन के निम्नलिखित दो नियम हैं :-

प्रथम नियम :- तल के अभिलंब एवं आपतित किरण के बीच बना कोण तथा परावर्तित किरण एवं तल के अभिलंब के बीच बना कोण बराबर होते हैं , अर्थात्

आपतन कोण < i = परावर्तन कोण < r

द्वितीय नियम :- आपतित किरण , अभिलंब तथा परावर्तित किरण सभी एक ही तल में होते हैं । इस प्रकार के तल को आपतन तल कहते हैं ।

प्रतिबिंब :-

प्रतिबिंब वहाँ बनता है जिस बिंदु पर कम से दो परावर्तित किरणें प्रतिच्छेदित होती हैं या प्रतिच्छेदित प्रतीत होती हैं ।

प्रतिबिंब के प्रकार :-

प्रतिबिम्ब की प्रकृति दो प्रकार का होता है :-

वास्तविक प्रतिबिंब
आभासी प्रतिबिंब

वास्तविक प्रतिबिंब :-

यह तब बनता है जब प्रकाश की किरणें वास्तव में प्रतिच्छेदित होती हैं ।
इसे परदे पर प्राप्त कर सकते हैं ।
वास्तविक प्रतिबिंब उल्टा बनता है ।

आभासी प्रतिबिंब :-

यह तब बनता है जब प्रकाश की किरणें प्रतिच्छेदित होती प्रतीत होती हैं ।
इसे परदे पर प्राप्त नहीं कर सकते ।
आभासी प्रतिबिंब सीधा बनता है ।

समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब :-

आभासी एवं सीधा होता है ।
प्रतिबिंब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होता है ।
प्रतिबिंब दर्पण के उतने पीछे बनता है जितनी वस्तु की दर्पण से दूरी होती है ।
प्रतिबिंब पार्श्व परिवर्तित होता है ।

पार्श्व उत्क्रमण :-

जब हम अपना प्रतिबिंब समतल दर्पण में देखते हैं तो हमारा दायाँ हाथ प्रतिबिंब का बायाँ हाथ दिखाई पड़ता है तथा हमारा बायाँ हाथ प्रतिबिंब का दायाँ हाथ दिखाई पड़ता है इस प्रकार वस्तु के प्रतिबिंब में पार्श्व बदल जाते हैं । इस घटना को पार्श्व उत्क्रमण कहते हैं ।

पार्श्व परिवर्तन :-

इसमें वस्तु का दायां भाग बायां प्रतीत होता है और बायां भाग दायां ।

गोलीय दर्पण :-

ऐसे दर्पण जिनका परावर्तक पृष्ठ गोलीय है , गोलीय दर्पण कहलाते हैं ।

गोलीय दर्पण के प्रकार :-

गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते हैं :-

अवतल दर्पण
उत्तल दर्पण
अवतल दर्पण :- वह गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ अंदर की ओर अर्थात गोले के केंद्र की ओर वक्रित है , वह अवतल दर्पण कहलाता है ।

उत्तल दर्पण :- वह गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित है , उत्तल दर्पण कहलाता है ।

अवतल दर्पण के उपयोग :-

बड़ी फोकस दूरी तथा बड़े द्वारक का अवतल दर्पण दाढ़ी बनाने के काम आता है । मनुष्य अपने चेहरे को दर्पण के ध्रुव तथा फोकस के बीच में रखता है जिससे चेहरे का सीधा व बड़ा आभासी प्रतिबिंब दर्पण में दिखाई देने लगता है ।
डॉक्टर प्रकाश की किरणें छोटे अवतल दर्पण से परावर्तित करके आँख , दाँत , नाक , कान , गले इत्यादि में डालते हैं । इससे ये अंग भली – भाँति प्रकाशित हो जाते हैं ।
अवतल दर्पणों का उपयोग टेबिल लैम्पों की शेडों में किया जाता है । जिससे प्रकाश दर्पण से होकर अभिसारी हो जाता है और क्षेत्र को अधिक प्रकाश पहुँचाता हैं ।
अवतल दर्पणों का उपयोग मोटरकारों , रेलवे इंजनों में तथा सर्च लाइट के लैम्पों में परावर्तक के रूप में होता है । लैम्प दर्पण के मुख्य फोकस पर होता है । अतः परावर्तन के पश्चात् प्रकाश एक समांतर किरण- पुँज के रूप में आगे बढ़ता है ।

उत्तल दर्पण के उपयोग :-

उत्तल दर्पण का उपयोग गली तथा बाजारों में लगे लैम्पों के ऊपर किया जाता है । प्रकाश दर्पण से परावर्तित होकर अपसारी किरण- पुँज के रूप में चलता है और अधिक क्षेत्र में फैल जाता है ।
उत्तल दर्पण मोटरकारों में ड्राइवर की सीट के पास लगा रहता है । इसमें ड्राइवर पीछे से आने वाले व्यक्तियों व गाड़ियों के प्रतिबिंब देख सकता है । ये उत्तल दर्पण बहुत बड़े क्षेत्र में फैली वस्तुओं के प्रतिबिंब आकार में छोटे तथा सीधे दिखते हैं ।

गोलीय दर्पण में सामान्यतः प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द :-

नोट :- ये शब्द गोलीय दर्पणों के बारे में चर्चा करते समय सामान्यतः प्रयोग में आते हैं ।

ध्रुव :- गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के केंद्र को दर्पण का ध्रुव कहते हैं । यह दर्पण के पृष्ठ पर स्थित होता है । ध्रुव की प्राय : P अक्षर से निरूपिात करते हैं

वक्रता केंद्र :– गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ एक गोले का भाग है । इस गोले का केंद्र गोलीय दर्पण का वक्रता केंद्र कहलाता है । यह अक्षर C से निरूपित किया जाता है ।

वक्रता त्रिज्या :- गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ जिस गोले का भाग है , उसकी त्रिज्या दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहलाती है । इसे अक्षर R से निरूपित किया जाता है ।

मुख्य अक्ष :- गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा वक्रता त्रिज्या से गुजरने वाली एक सीधी रेखा को मुख्य अक्ष कहते हैं । मुख्य अक्ष दर्पण के ध्रुव पर अभिलंब हैं ।

मुख्य फोकस :- मुख्य अक्ष पर वह बिंदु जहाँ मुख्य अक्ष के समांतर किरणें आकर मिलती हैं या परावर्तित किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से आती हुई महसूस होती हैं वह बिंदु गोलीय दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है ।

अवतल दर्पण का मुख्य फोकस :- मुख्य अक्ष के समान्तर आपतित प्रकाश किरणें अवतल दर्पण द्वारा परावर्तन के पश्चात् जिस बिन्दु से होकर गुजरती है , उस बिन्दु को अवतल दर्पण का मुख्य फोकस कहते हैं ।

उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस :- उत्तल दर्पण द्वारा मुख्य अक्ष के समांतर परावर्तित किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से आती हैं । यह बिंदु उत्तल दर्पण का मुख्य फोकस कहलाता है ।

फोकस दूरी :- गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा मुख्य फोकस के मध्य की दूरी फोकस दूरी कहलाती है । इसे अक्षर F द्वारा निरूपित करते हैं । छोटे द्वारक के गोलीय दर्पणों के लिए वक्रता त्रिज्या फोकस दूरी से दुगुनी होती है । हम इस संबंध को R = 2F द्वारा व्यक्त करते हैं ।

द्वारक :- गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठतल की वृत्ताकार सीमारेखा का व्यास दर्पण का द्वारक कहलाता है । इसे MN से दर्शाया जाता है ।

गोलीय दर्पणों में प्रतिबिंब बनाने के निम्नलिखित नियम :-

गोलीय दर्पण पर , जब मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश किरण आपतित होती है , तो वह परावर्तित होकर मुख्य फोकस ( अवतल दर्पण ) से होकर जाती हैं या मुख्य फोकस से होकर आती हुई प्रतीत उत्तल दर्पण में होती है ।
जब मुख्य फोकस में से होकर जाने वाली ( अवतल दर्पण ) अथवा मुख्य फोकस बिंदु की ओर जाने वाली किरण ( उत्तल दर्पण ) दर्पण पर आपतित होती है , तब वह परावर्तित होकर मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है ।
जब वक्रता केंद्र में से होकर जाने वाली ( अवतल दर्पण ) या वक्रता केंद्र की ओर जाने वाली ( उत्तल दर्पण ) किरण दर्पण पर आपतित होती है , तब वह परावर्तित होकर अपने मार्ग पर ही वापस लौट जाती है ।
उत्तल दर्पण के बिंदु P की ओर मुख्य अक्ष से तिर्यक दिशा में आपतित किरण तिर्यक दिशा में ही परावर्तित होती है । आपतित तथा परावर्तित किरणें आपतन बिंदु पर मुख्य अक्ष से समान कोण बनाती है ।

उत्तल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की विशेषताएँ :-

प्रतिबिंब सदैव दर्पण के पीछे बनता है ।
दर्पण के ध्रुव तथा फोकस के बीच बनता है ।
सीधा तथा आभासी होता है ।
वस्तु के आकार से छोटा होता है ।

गोलीय दर्पणों द्वारा परावर्तन के लिए चिह्न परिपाटी :-

चिह्न परिपाटी :- प्रकाश में दर्पण से वस्तु की दूरी ( u ) , दर्पण से प्रतिबिंब की दूरी ( v ) , फोकस दूरी ( f ) आदि को उचित चिह्न देते हैं । इसके लिए निर्देशांक ज्यामिति की परिपाटी अपनाई जाती है , जो निम्न प्रकार से हैं :-

बिंब हमेशा दर्पण के बाईं ओर रखा जाता है । इसका अर्थ है कि दर्पण पर बिंब से प्रकाश बाईं ओर से आपतित होता है ।
मुख्य अक्ष के समांतर सभी दूरियाँ दर्पण के ध्रुव से मापी जाती हैं ।
मूल बिंदु के दाईं ओर ( + x – अक्ष के अनुदिश ) मापी गई सभी दूरियाँ धनात्मक मानी जाती हैं जबकि मूल बिंदु के बाईं ओर ( – x – अक्ष के अनुदिश ) मापी गई दूरियाँ ऋणात्मक मानी जाती हैं ।
मुख्य अक्ष के लंबवत तथा ऊपर की ओर ( + y – अक्ष के अनुदिश ) मापी जाने वाली दूरियाँ धनात्मक मानी जाती हैं ।
मुख्य अक्ष के लंबवत तथा नीचे की ओर ( – y – अक्ष के अनुदिश ) मापी जाने वाली दूरियाँ ऋणात्मक मानी जाती हैं ।
इन नियमों के अनुसार :-

बिंब की दूरी ( u ) हमेशा ऋणात्मक होती है ।
अवतल दर्पण की फोकस दूरी हमेशा ऋणात्मक होती है ।
उत्तल दर्पण की फोकस दूरी हमेशा धनात्मक होती है ।

दर्पण सूत्र :-

1/v + 1/u = 1/f
v = प्रतिबिंब की दूरी
u = बिंब की दूरी
f = फोकस दूरी
गोलीय दर्पण में इसके ध्रुव से बिंब की दूरी , बिंब दूरी ( u ) कहलाती है । दर्पण के ध्रुव से प्रतिबिंब की दूरी , प्रतिबिंब दूरी ( v ) कहलाती है । ध्रुव से मुख्य फोकस की दूरी , फोकस दूरी ( f कहलाती है ।

आवर्धन :-

गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न वह आपेक्षिक विस्तार है जिससे ज्ञान होता है कि कोई प्रतिबिंब बिंब की अपेक्षा कितना गुना आवर्धित है , इसे प्रतिबिंब की ऊँचाई तथा बिंब की ऊँचाई के अनुपात रूप में व्यक्त किया जाता है ।

m = प्रतिबिं की ऊँचाई ( h’ ) / बिंब की ऊंचाई ( h₀ )

m = hi/h₀

यदि ‘ m ‘ ऋणात्मक है तो प्रतिबिंब वास्तविक होता है ।
यदि ‘ m ‘ धनात्मक है तो प्रतिबिंब आभासी बनता है ।
यदि hi = h₀ तो m = 1 – प्रतिबिंब का आकार बिंब के बराबर है ।
यदि hi > h₀ तो m > 1 – प्रतिबिंब बिंब से बड़ा होता है ।
यदि hi < h₀ तो m < 1- प्रतिबिंब बिंब से छोटा होता है ।
समतल दर्पण का आवर्धन सदैव +1 होता है ( + ) साइन आभासी प्रतिबिंब दर्शाता है । ( 1 ) दर्शाता है कि प्रतिबिंब का आकार बिंब के आकार के बराबर है ।

प्रकाश का अपवर्तन :-

जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तिरछा होकर जाता है तो दूसरे माध्यम में इसके संचरण की दिशा परिवर्तित हो जाती है । इस परिघटना को प्रकाश अपवर्तन कहते हैं ।

प्रकाश- अपवर्तन के कुछ उदाहरण :-

प्रकाश के अपवर्तन के कारण स्विमिंग पूल का तल वास्तविक स्थिति से विस्थापित हुआ प्रतीत होता है ।
पानी में आंशिक रूप से डूबी हुई पेंसिल वायु तथा पानी के अन्तरपृष्ठ पर टेढ़ी प्रतीत होती है ।
काँच के गिलास में पड़े नीबू वास्तविक आकार से बड़े प्रतीत होते हैं ।
कागज पर लिखे शब्द गिलास स्लैब से देखने पर ऊपर उठे हुए प्रतीत होते हैं ।

प्रकाश – अपवर्तन के दो नियम :-

आपतित किरण अपवर्तित किरण तथा दोनों माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब सभी एक ही तल में होते हैं ।
प्रकाश के किसी निश्चित रंग तथा निश्चित माध्यमों के युग्म के लिए आपतन कोण की ज्या ( sine ) तथा अपवर्तन कोण की ज्या ( sine ) का अनुपात स्थिर होता है । इस नियम को स्नेल का अपवर्तन का नियम भी कहते हैं ।

अपवर्तनांक :-

किन्हीं दिए हुए माध्यमों के युग्म के लिए होने वाले दिशा परिवर्तन के विस्तार को अपवर्तनांक के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है ।

निरपेक्ष अपवर्तनांक :-

यदि माध्यम -1 निर्वात या वायु है , तब माध्यम 2 का अपवर्तनांक निर्वात के सापेक्ष माना जाता है । यह माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक कहलाता है ।

N = c/v
C = 3 × 10⁸MS⁻¹
हीरे का अपवर्तनांक सबसे अधिक है । हीरे का अपवर्तनांक 242 है इसका तात्पर्य यह है कि प्रकाश की चाल 1/242 गुणा कम है हीरे में निर्वात की अपेक्षा ।

प्रकाशिक सघन माध्यम :-

दो माध्यमों की तुलना करते समय अधिक अपवर्तनांक वाला माध्यम दूसरे की अपेक्षा प्रकाशिक सघन होता है ।

उदहारण :- जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में जाती है तो उसकी चाल धीमी हो जाती है तथा अभिलंब की ओर झुक जाती है ।

प्रकाशिक विरल माध्यम :-

दो माध्यमों की तुलना करते समय कम अपवर्तनांक वाला माध्यम प्रकाशिक विरल माध्यम है ।

उदहारण :- जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है तो इसकी चाल बढ़ जाती है तथा ये अभिलंब से दूर हट जाती है ।

लेंस :-

दो तलों से घिरा हुआ कोई पारदर्शी माध्यम जिसका एक या दोनों तल गोलीय है , लेंस कहलाता है ।

लेंस दो प्रकार के होते हैं :-

उत्तल लेंस
अवतल लेंस
उत्तल लेंस :- यह बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है तथा दोनों पृष्ठों की वक्रता त्रिज्या बराबर होती है । यह किरण पुंज को अभिसरित करता है , इसलिए इसे अभिसारी लेंस भी कहते हैं ।

अवतल लेंस :- यह बीच में पतला व किनारों पर मोटा होता है । साधारणतया इसके दोनों पृष्ठों की वक्रता त्रिज्याएँ बराबर होती हैं । यह किरण पुंज को अपसरित करता है , इसलिए इसे अपसारी लेंस भी कहते हैं ।

लेंस में सामान्यतः प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द :-

नोट :- ये शब्द लेंस के बारे में चर्चा करते समय सामान्यतः प्रयोग में आते हैं ।

वक्रता केंद्र :- किसी लेंस में चाहे वह उत्तल हो अथवा अवतल , दो गोलीय पृष्ठ होते हैं । इनमें से प्रत्येक पृष्ठ एक गोले का भाग होता है । इन गोलों के केंद्र लेंस के वक्रता केंद्र कहलाते हैं । लेंस का वक्रता केंद्र प्रायः अक्षर C द्वारा निरूपित किया जाता है ।

मुख्य अक्ष :- किसी लेंस के दोनों वक्रता केंद्रों से गुजरने वाली एक काल्पनिक सीधी रेखा लेंस की मुख्य अक्ष कहलाती है ।

प्रकाशिक केंद्र :- लेंस का केंद्रीय बिंदु इसका प्रकाशिक केंद्र कहलाता है । इसे प्रायः अक्षर O से निरूपित करते हैं । लेंस के प्रकाशिक केंद्र से गुजरने वाली प्रकाश किरण बिना किसी विचलन के निर्गत होती है ।

द्वारक :- गोलीय लेंस की वृत्ताकार रूपरेखा का प्रभावी व्यास इसका द्वारक कहलाता है ।

पतले लेंस :- जिनका द्वारक इनकी वक्रता त्रिज्या से बहुत छोटा है और दोनों वक्रता केंद्र प्रकाशिक केंद्र से समान दूरी पर होते हैं । ऐसे लेंस छोटे द्वारक के पतले लेंस कहलाते हैं ।

लेंस का मुख्य फोकस :- उत्तल लेंस पर मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश की बहुत सी किरणें आपतित हैं । ये किरणें लेंस से अपवर्तन के पश्चात मुख्य अक्ष पर एक बिंदु पर अभिसरित हो जाती हैं । मुख्य अक्ष पर यह बिंदु लेंस का मुख्य फोकस कहलाता है ।

अवतल लेंस का मुख्य फोकस :- अवतल लेंस पर मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश की अनेक किरणें आपतित होती है । ये किरणें लेंस से अपवर्तन के पश्चात मुख्य अक्ष के एक बिंदु से अपसरित होती प्रतीत होती हैं । मुख्य अक्ष पर यह बिंदु अवतल लेंस का मुख्य फोकस कहलाता है ।

फोकस दूरी :- किसी लेंस के मुख्य फोकस की प्रकाशिक केंद्र से दूरी फोकस दूरी कहलाती है । फोकस दूरी को अक्षर ‘ f ‘ द्वारा निरूपित किया जाता है ।

लेंस द्वारा प्रतिबिंब बनाने के नियम :-

किसी वस्तु का लेंस द्वारा प्रतिबिंब बनाने के लिए निम्नलिखित नियम हैं :-

लेंस के प्रथम फोकस से होकर जाने वाली ( उत्तल लेंस में ) किरण या प्रथम फोकस की ओर जाती प्रतीत होने वाली ( अवतल लेंस में ) किरण लेंस से निकलने पर मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है ।
लेंस की मुख्य अक्ष के समांतर चलने वाली किरण लेंस से निकल कर द्वितीय फोकस से या तो होकर जाती है ( उत्तल लेंस में ) अथवा द्वितीय फोकस से आती हुई प्रतीत होती है ( अवतल लेंस में )
लेंस के प्रकाशीय केंद्र से होकर जाने वाली किरण अपवर्तन के पश्चात् बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है ।

लेंस के लिए चिह्न परिपाटी व प्रतिबिंब बनाने के नियम :-

चिह्न परिपाटी :- दर्पणों में बताई गई निर्देशांक ज्यामिति की चिह्न परिपाटी लेंस में भी लागु होती है । इसके अनुसार , :-

किरण आरेख बनाते समय लेंस पर प्रकाश किरणें सदैव बाईं ओर से डाली जाती हैं ।
लेंस में सभी दूरियाँ प्रकाशिक केंद्र से मुख्य अक्ष के साथ नापी जाती हैं ।
आपतित किरण की दिशा में नापी गई दूरियाँ धनात्मक तथा आपतित किरण के विपरीत दिशा में नापी हुई दूरियाँ ऋणात्मक ली जाती हैं ; जैसे- उत्तल लेंस की फोकस दूरी f धनात्मक और अवतल लेंस की फोकस दूरी ऋणात्मक लेते हैं ।
मुख्य अक्ष के ऊपर वस्तु तथा प्रतिबिंब की लंबाइयाँ धनात्मक तथा अक्ष से नीचे की ओर इनकी लंबाइयाँ ऋणात्मक लेते हैं ।

लेंस सूत्र :-

लेंस सूत्र बिंब दूरी ( u ) , प्रतिबिंब दूरी ( v ) तथा फोकस दूरी ( f ) के बीच संबंध प्रदान करता है । लेंस सूत्र व्यक्त किया जाता है :-

1/v + 1/u = 1/f

उपरोक्त लेंस सूत्र व्यापक है तथा किसी भी गोलीय लेंस के लिए , सभी स्थितियों मान्य है ।

आवर्धन :-

किसी लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन , किसी गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न आवर्धन की ही भाँति प्रतिबिंब की ऊँचाई तथा बिंब की ऊँचाई के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है ।

आवर्धन को अक्षर m द्वारा निरूपित किया जाता है । यदि बिंब की ऊँचाई h हो तथा लेंस द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब की ऊँचाई h ‘ हो , तब लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन प्राप्त होगाः

m = प्रतिबिं की ऊँचाई ( h’ ) / बिंब की ऊंचाई ( h₀ )
m = v/u
m = hi/h₀ = v/u

लेंस की क्षमता :-

किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरण या अपसरण करने की मात्रा को उसकी क्षमता के रूप में व्यक्त किया जाता है । लेंस की क्षमता उसकी फोकस दूरी का व्युत्क्रम होती है ।

लेंस की क्षमता P = 1/f

लेंस की क्षमता का मात्रक ( डाइऑप्टर ) ( D ) है । 1D = 1m⁻¹

डाइऑप्टर उस लेंस की क्षमता है जिसकी फोकस दूरी 1 मीटर हो ।
उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक होती है । ( + ve )
अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक होती है । ( – ve )
अनेक प्रकाशिक यंत्रों में कई लेंस लगे होते हैं । उन्हें प्रतिबिंब को अधिक आवर्धित तथा सुस्पष्ट बनाने के लिए संयोजित किया जाता है । सम्पर्क में रखे लेंसों की कुल क्षमता ( P ) उन लेंसों की पृथक – पृथक क्षमताओं का बीजगणितीय योग होती है ।


Class 10 science chapter 10  Important Question Answer

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01.  वाहनों में उतल दर्पण ही क्यों लगाया जाता हैं ?
उत्तर :
क्योकि उतल दर्पण सदैव सीधा प्रतिबिम्ब बनाते हैें। इनका दृष्टि क्षेत्र बहुत अधिक अर्थात लंबी दूरी के भी वस्तु का वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाते हैं । क्योकि ये बाहर की ओर वक्रित होते हैं ।

02. प्रकाश के अपवर्तन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हैं तो यह अपने मार्ग से विचलीत हो जाती हैं। प्रकाश के किरण को अपने मार्ग से विचलीत हो जाना प्रकाश का अपवर्तन कहलाता हैं ।

03. अपवर्तनांक किसे कहते हैं ?
उत्तर :
जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हैं तो यह अपने मार्ग से विचलीत हो जाती हैं। ये विचलन माध्यम और उस माध्यम में प्रकाश की चाल पर निर्भर करता हैं । अतः अपवर्तनांक माध्यमों में प्रकाश की चालों का अनुपात होता है।

04. जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हैं तो किस प्रकार मुडती है ?
उत्तर :
जब प्रकाश की किरण एक माध्यम (विरल) से दूसरे माध्यम (सघन) मे जाती हैं तो यह अभिलंब की ओर मुड जाती हैं । जब यही प्रकाश की किरण सघन से विरल की ओर जाती हैं तो अभिलंब से दूर भागती हैं।
05. स्नैल का नियम लिखिए |
उत्तर:
जब प्रकाश की किरण किन्हीं दो माध्यमों के सीमा तल पर तिरछी आपतित होती हैं तो आपतन कोण (i) की ज्या (sin) अपवर्तन कोण की ज्या (sin) का अनुपात एक नियतांक होता हैं । इस नियतांक को दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक कहते हैं । इस नियम को स्नैल का नियम भी कहते है।

06. प्रकाश के अपवर्तन के नियम लिखिए।
उत्तर :
प्रकाश के अपवर्तन के दो नियम हैं ।

आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा आपतन बिन्दु पर अभिलंब तीनों एक ही तल में होते हैं ।
जब प्रकाश की किरण किन्हीं दो माध्यमों के सीमा तल पर तिरछी आपतित होती हैं तो आपतन कोण (i) की ज्या (sin) तथा अपवर्तन कोण (r) की ज्या (sin) का अनुपात एक नियतांक होता हैं ।

07.  लेंस की क्षमता क्या हैं ? इसका SI मात्रक क्या है ?
उत्तर :
किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरण या अपसरण करने की मात्रा (डिग्री) को उसकी क्षमता कहते है। यह उस लेंस के फोकस दूरी के व्युत्क्रम के बराबर होता हैं। इसका SI मात्रक डाइऑप्टर (D) होता हैं।
लेंस की क्षमता को P द्वारा व्यक्त करते हैं।


Class 10 science chapter 10  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. प्रकाश के परावर्तन के नियम कौन-कौन से हैं ?
(a) आपतन कोण,परावर्तन कोण के बराबर
(b) आपतित किरण तथा परावर्तित किरण एक ही तल में
(c) आपतन कोण,परावर्तन कोण से बड़ा
(d) (a) और (b) दोनों
► (d) (a) और (b) दोनों

2. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रकाश का एक गुण है ?
(a) परावर्तन
(b) अपवर्तन
(c) विक्षेपण
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

3. वस्तुओं को दृश्यमान कौन बनाता है ?
(a) जल
(b) हवा
(c) प्रकाश
(d) धूल के कण
► (c) प्रकाश

4. समतल दर्पण के द्वारा बना प्रतिबिंब कैसा होता है ?
(a) सीधा,आभासी तथा समान आकार का
(b) सीधा, आभासी तथा आकार में बड़ा
(c) सीधा, आभासी तथा आकार में छोटा
(d) वास्तविक, उल्टा तथा उसी आकार का
► (a) सीधा,आभासी तथा समान आकार का

5. गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित है वह क्या कहलाता है ?
(a) उत्तल दर्पण
(b) समतल दर्पण
(c) अवतल दर्पण
(d) (a) और (b) दोनों
► (a) उत्तल दर्पण

6. गोलीय दर्पण जिसका परावर्तक पृष्ठ अंदर की ओर अर्थात गोले के केंद्र की ओर वक्रित है, वह क्या कहलाता है ?
(a) उत्तल दर्पण
(b) अवतल दर्पण
(c) (a) और (b) दोनों
(d) समतल दर्पण
► (b) अवतल दर्पण
7. गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के केन्द्र को क्या कहते हैं ?
(a) ध्रुव
(b) वक्रता केन्द्र
(c) वक्रता त्रिज्या
(d) मुख्य अक्ष
► (a) ध्रुव

Class 10 Science Chapter 10 in hindi notes

8. चम्मच का अंदर की ओर वक्रित पृष्ठ कैसा है ?
(a) लगभग उत्तल दर्पण
(b) लगभग अवतल दर्पण
(c) लगभग उत्तल लैंस
(d) (a) और (b) दोनों
► (b) लगभग अवतल दर्पण

9. उत्तल दर्पण में वक्रता केंद्र परावर्तक पृष्ठ के किस ओर स्थित होता है ?
(a) ऊपर की ओर
(b) नीचे की ओर
(c) पीछे की ओर
(d) आगे की ओर
► (c) पीछे की ओर

10. गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ एक गोले का भाग है, इस गोले का केंद्र क्या कहलाता है ?
(a) ध्रुव (P)
(b) वक्रता केंद्र (C)
(c) वक्रता त्रिज्या (R)
(d) द्वारक
► (b) वक्रता केंद्र (C)

11. अवतल दर्पण या उत्तल दर्पण पर मुख्य अक्ष के समांतर कुछ किरणें परावर्तित होने के बाद एक बिंदु पर मिलती है या एक बिंदु से आती हुई प्रतित होती है, यह बिंदु क्या कहलाता है ?
(a) मुख्य अक्ष
(b) मुख्य द्वारक
(c) मुख्य फोक्स
(d) द्वारक
► (c) मुख्य फोक्स

12. गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा वक्ता त्रिज्या से गुजरने वाली एक सीधी रेखा को क्या कहते हैं ?
(a) मुख्य फोकस
(b) मुख्य अक्ष
(c) द्वारक
(d) ध्रुव
► (b) मुख्य अक्ष

13. एक अवतल दर्पण की फोकस दूरी कैसी होती है ?
(a) सदैव धनात्मक
(b) सदैव ऋणात्मक
(c) धनात्मक जब प्रतिबिंब वास्तविक है
(d) ऋणात्मक जब प्रतिबिंब वास्तविक है
► (b) सदैव ऋणात्मक

14. वक्ता त्रिज्या (R) तथा फोकस दूरी कैसी होती है ?
(a) R=f
(b) R=2f
(c) R=f/2
(d) R=4f
► (b) R=2f

15. एक बिंब को अवतल दर्पण के ध्रुव तथा फोकस के बीच रखा गया है प्रतिबिंब कहाँ बनेगा?
(a) फोकस पर
(b) C पर
(c) दर्पण के पीछे
(d) अंनत पर
► (c) दर्पण के पीछे

16. अवतल दर्पण निम्नलिखित में से किस स्थिति में आभासी तथा सीधा प्रतिबिंब बनाता है ?
(a) जब बिंब अंनत पर होता है
(b) जब बिंब 2F पर होता है
(c) जब बिंब F पर होता है
(d) जब बिंब P तथा F के बीच होता है
► (d) जब बिंब P तथा F के बीच होता है

Class 10 Science Chapter 10 vvi question

17. अवतल दर्पण का उपयोग कहाँ किया जाता है ?
(a) टार्च
(b) शेविंग दर्पण
(c) दंत विशेषज्ञ द्वारा उपयोग दर्पण
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

18. उत्तल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब हमेशा कैसा होता है ?
(a) आभासी
(b) सीधा
(c) आकार में छोटा
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

19. मुख्य अक्ष के लंबवत तथा ऊपर की ओर मापी जाने वाली दूरियाँ कैसी मानी जाती हैं ?
(a) ऋणात्मक
(b) धनात्मक
(c) (a) और (b) दोनों
(d) शून्य
► (b) धनात्मक

20. निम्नलिखित में से किस कारण से पानी में टेढ़ी रखी कोई पेंसिल टूटी हुई प्रतीत होती है ?
(a) परावर्तन
(b) अपवर्तन
(c) पूर्ण आंतरिक परावर्तन
(d) विक्षेपण
► (b) अपवर्तन


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Class 10 Science Chapter 9 Notes in Hindi | आनुवंशिकता एवं जैव विकास

Class 10 Science chapter 9 Notes in Hindi : covered science chapter 9 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – आनुवंशिकता एवं जैव विकास क्या है किसे कहेत है, विभिन्नता क्या है इस के कितने प्रकार होते है, जनन क्या है किसे कहते है, मेंडेल के आनुवांशिक के नियम का नियम कैसे दिया,  जीवाश्म क्या है,जाति उदभव किसे कहते है, आनुवंशिक लक्षण क्या है, उपार्जित लक्षण क्या है, मानव में लिंग निर्धारण किस प्रकार होते है? 

Class 10 Science chapter 9 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 Heredity and evolution (आनुवंशिकता एवं जैव विकास)
content Class 10 Science chapter 9 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science chapter 9 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 9 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 9

आनुवंशिकता एवं जैव विकास

Heredity and evolution


आनुवंशिकी :-

लक्षणों के वंशीगत होने एवं विभिन्नताओं का अध्ययन ही आनुवंशिकी कहलाता है ।

आनुवंशिकता :-

विभिन्न लक्षणों का पूर्ण विश्वसनीयता के साथ वंशागत होना आनुवंशिकता कहलाता है ।

विभिन्नता :-

एक स्पीशीज के विभिन्न जीवों में शारीरिक अभिकल्प और डी ० एन० ए० में अन्तर विभिन्नता कहलाता है ।

विभिन्नता के दो प्रकार :-

शारीरिक कोशिका विभिन्नता
जनन कोशिका विभिन्नता
शारीरिक कोशिका विभिन्नता :-

यह शारीरिकी कोशिका में आती है ।
ये अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित नहीं होते ।
जैव विकास में सहायक नहीं है ।
इन्हें उपार्जित लक्षण भी कहा जाता है ।
उदाहरण :- कानों में छेद करना , कुत्तों में पूँछ काटना ।
जनन कोशिका विभिन्नता :-

यह जनन कोशिका में आती है ।
यह अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित होते हैं ।
जैव विकास में सहायक हैं ।
इन्हें आनुवंशिक लक्षण भी कहा जाता है ।
उदाहरण :- मानव के बालों का रंग , मानव शरीर की लम्बाई

जनन के दौरान विभिन्नताओं का संचयन :-

विभिन्नताएँ :- जनन द्वारा परिलक्षित होती हैं चाहे जन्तु अलैंगिक जनन हो या लैंगिक जनन ।

अलैंगिक जनन :-

विभिन्नताएँ कम होंगी
डी.एन.ए. प्रतिकृति के समय न्यून त्रुटियों के कारण उत्पन्न होती हैं ।
लैंगिक जनन :-

विविधता अपेक्षाकृत अधिक होगी
क्रास संकरण के द्वारा , गुणसूत्र क्रोमोसोम के विसंयोजन द्वारा , म्यूटेशन ( उत्परिवर्तन ) के द्वारा ।

विभिन्नता के लाभ :-

प्रकृति की विविधता के आधार पर विभिन्नता जीवों को विभिन्न प्रकार के लाभ हो सकते हैं ।
उदाहरण :- ऊष्णता को सहन करने की छमता वाले जीवपणुओं को अधिक गर्मी से बचने की संभावना अधिक होती है ।
पर्यावरण कारकों द्वारा उत्तम परिवर्त का चयन जैव विकास प्रक्रम का आधार बनाता है ।

मेंडल का योगदान :-

मेंडल ने वंशागति के कुछ मुख्य नियम प्रस्तुत किए ।

मेंडल को आनुवंशिकी के जनक के नाम से जाना जाता है । मैंडल ने मटर के पौधे के अनेक विपर्यासी (विकल्पी ) लक्षणों का अध्ययन किया जो स्थूल रूप से दिखाई देते हैं । उदाहरणत :- गोल / झुर्रीदार बीज , लंबे / बौने पौधे , सफेद / बैंगनी फूल इत्यादि ।

उसने विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधों को लिया जैसे कि लंबे पौधे तथा बौने पौधे । इससे प्राप्त संतति पीढ़ी में लंबे एवं बौने पौधों के प्रतिशत की गणना की ।

मेंडल द्वारा मटर के पौधे का चयन क्यों किया :-

मेंडल ने मटर के पौधे का चयन निम्नलिखित गुणों के कारण किया ।

मटर के पौधों में विपर्यासी विकल्पी लक्षण स्थूल रूप से दिखाई देते हैं ।
इनका जीवन काल छोटा होता है ।
सामान्यतः स्वपरागण होता है परन्तु कृत्रिम तरीके से परपरागण भी कराया जा सकता है ।
एक ही पीढ़ी में अनेक बीज बनाता है ।

I. एकल संकरण ( मोनोहाइब्रिड ) :-

मटर के दो पौधों के एक जोड़ी विकल्पी लक्षणों के मध्य क्रास संकरण को एकल संकर क्रास कहा जाता है । उदाहरण :- लंबे पौधे तथा बौने पौधे के मध्य संकरण ।

अवलोकन :-

( 1 ) प्रथम संतति पीढ़ी अथवा F₁ में कोई पौधा बीच की ऊँचाई का नहीं था । सभी पौधे लंबे थे । इसका अर्थ था कि दो लक्षणों में से केवल एक पैतृक जनकीय लक्षण ही दिखाई देता है ।
( 2 ) F₂ पीढ़ी में 3/4 लंबे पौधे वे 1/4 बौने पौधे थे ।
( 3 ) फीनोटाइप F₂ – 3 : 1 ( 3 लंबे पौधे : 1 बौना पौधा )
जीनोटाइप F₂ – 1 : 2 : 1
TT , Tt , tt का संयोजन 1 : 2 : 1 अनुपात में प्राप्त होता है ।
निष्कर्ष :-

TT व Tt दोनों लंबे पौधे हैं , यद्यपि tt बौना पौधा है ।
T की एक प्रति पौधों को लंबा बनाने के लिए पर्याप्त है । जबकि बौनेपन के लिए t की दोनों प्रतियाँ tt होनी चाहिए ।
T जैसे लक्षण प्रभावी लक्षण कहलाते हैं , t जैसे लक्षण अप्रभावी लक्षण कहलाते हैं ।

द्वि – संकरण द्वि / विकल्पीय संकरण :-

मटर के दो पौधों के दो जोड़ी विकल्पी लक्षणों के मध्य क्रास

द्विसंकर क्रॉस के परिणाम जिनमें जनक दो जोड़े विपरीत विशेषकों में भिन्न थे जैसे बीच का रंग और बीच की आकृति ।

F₂ गोल , पीले बीज : 9
गोल , हरे बीज : 3
झुरींदार , पीले बीज : 3
झुरींदार , हरे बीज : 1
इस प्रकार से दो अलग अलग ( बीजों की आकृति एवं रंग ) को स्वतंत्र वंशानुगति होती है ।

आनुवंशिकता के नियम :-

मेंडेल ने मटर पर किए संकरण प्रयोगों के निष्कर्षो के आधार पर कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जिन्हें मेंडेल कें आनुवंशिकता के नियम कहा जाता है ।

मेंडेल के आनुवांशिक के नियम :-

यह नियम निम्न प्रकार से हैं :-

प्रभावित का नियम ।
पृथक्करण का नियम / विसंयोजन का नियम ।
स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम ।
प्रभाविता का नियम : जब मेंडल ने भिन्न – भिन्न लक्षणों वाले समयुग्मजी पादपों में जब संकर संकरण करवाया तो इस क्रॉस में मेंडेल ने एक ही लक्षण प्रदर्शित करने वाले पादपों का ही अध्ययन किया । तो उसने पाया कि एक प्रभावी लक्षण अपने आप को अभिव्यक्त करता है । और एक अप्रभावी लक्षण अपने आप को छिपा लेता है । इसी को प्रभाविता कहा गया है और इस नियम को मेंडल का प्रभावतििा का नियम कहा जाता है ।

पृथक्करण का नियम / विसंयोजन का नियम / युग्मकों की शुद्धता का निमय :- युग्मक निर्माण के समय दोनों युग्म विकल्पी अलग हो जाते है । अर्थात् एक युग्मक में सिर्फ एक विकल्पी हो जाता है । इसलिए इसे पृथक्करण का नियम कहते है ।

युग्मक किसी भी लक्षण के लिए शुद्ध होते है ।
स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम :- यह नियम द्विसंकर संकरण के परिणामों पर आधारित है । इस नियम के अनुसार किसी द्विसंकर संरकरण में एक लक्षण की वंशगति दूसरे लक्षण की वंशागति से पूर्णतः स्वतंत्र होती है । अर्थात् एक लक्षण के युग्मा विकल्पी दूसरे लक्षण के युग्मविकल्पी से निर्माण के समय स्वतंत्र रूप से पृथक व पुनव्यवस्थित होते है ।

इसे में लक्षण अनुपात 9 : 3 : 3 : 1 होता है ।

लिंग निर्धारण :-

अलग – अलग स्पीशीज लिंग निर्धारण के लिए अलग – अलग युक्ति अपनाते है ।

लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी कारक :-

कुछ प्राणियों में लिंग निर्धारण अंडे के ऊष्मायन ताप पर निर्भर करता है उदाहरण :- घोंघा
कुछ प्राणियों जैसे कि मानव में लिंग निर्धारण लिंग सूत्र पर निर्भर करता है । XX ( मादा ) तथा XY ( नर )

मानव में लिंग निर्धारण :-

आधे बच्चे लड़के एवं आधे लड़की हो सकते हैं । सभी बच्चे चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की अपनी माता से X गुणसूत्र प्राप्त करते हैं । अत : बच्चों का लिंग निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें अपने पिता से किस प्रकार का गुणसूत्र प्राप्त हुआ है ।

जिस बच्चे को अपने पिता से X गुणसूत्र वंशानुगत हुआ है वह लड़की एवं जिसे पिता से Y गुणसूत्र वंशागत होता है , वह लड़का होता है ।

विकास :-

वह निरन्तर धीमी गति से होने वाला प्रक्रम जो हजारों करोड़ों वर्ष पूर्व जीवों में शुरू हुआ जिससे नई स्पीशीज का उद्भव हुआ विकास कहलाता है ।

उपार्जित लक्षण :-

वे लक्षण जिसे कोई जीव अपने जीवन काल में अर्जित करता है उपार्जित लक्षण कहलाता है | उदाहरण : अल्प पोषित भृंग के भार में कमी ।

उपार्जित लक्षणों का गुण :-

ये लक्षण जीवों द्वारा अपने जीवन में प्राप्त किये जाते हैं । ये जनन कोशिकाओं के डी.एन.ए. ( DNA ) में कोई अंतर नहीं लाते व अगली पीढ़ी को वंशानुगत / स्थानान्तरित नहीं होते ।
जैव विकास में सहायक नहीं है । उदाहरण :– अल्प पोषित भंग के धार में कमी ।

आनुवंशिक लक्षण  :-

वे लक्षण जिसे कोई जीव अपने जनक से प्राप्त करता है आनुवंशिक लक्षण कहलाता है । उदाहरण :- मानव के आँखों व बालों के रंग ।
आनुवंशिक लक्षण के गुण :-

ये लक्षण जीवों की वंशानुगत प्राप्त होते हैं ।
ये जनन कोशिकाओं में घटित होते हैं तथा अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित होते हैं ।
जैव विकास में सहायक है । उदाहरण :- मानव के आँखों व बालों के रंग ।

जाति उदभव  :-

पूर्व स्पीशीज से एक नयी स्पीशीज का बनना जाति उदभव कहलाता है ।

जाति उद्भव किस प्रकार होता है ?

जीन प्रवाह :- उन दो समष्टियों के बीच होता है जो पूरी तरह से अलग नहीं हो पाती है किंतु आंशिक रूप से अलग – अलग हैं ।

आनुवंशिक विचलन :- किसी एक समष्टि की उत्तरोत्तर पीढ़ियों में जींस की बारंबरता से अचानक परिवर्तन का उत्पन होना ।

प्राकृतिक चुनाव :- वह प्रक्रम जिसमें प्रकृति उन जीवों का चुनाव कर बढ़ावा देती है जो बेहतर अनुकूलन करते हैं ।

भौगोलिक पृथक्करण :- जनसंख्या में नदी , पहाड़ आदि के कारण आता है । इससे दो उपसमष्टि के मध्य अंतर्जनन नहीं हो पाता ।

आनुवंशिक विचलन का कारण :-

यदि DNA में परिवर्तन पर्याप्त है ।
गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन ।

अभिलक्षण :-

बाह्य आकृति अथवा व्यवहार का विवरण अभिलक्षण कहलाता है । दूसरे शब्दों में , विशेष स्वरूप अथवा विशेष प्रकार्य अभिलक्षण कहलाता है । उदहारण :-

हमारे चार पाद होते हैं , यह एक अभिलक्षण है ।
पौधों में प्रकाशसंश्लेषण होता है , यह भी एक अभिलक्षण है

समजात अभिलक्षण :-

विभिन्न जीवों में यह अभिलक्षण जिनकी आधारभूत संरचना लगभग एक समान होती है । यद्यपि विभिन्न जीवों में उनके कार्य भिन्न – भिन्न होते हैं ।

उदाहरण :- पक्षियों , सरीसृप , जल – स्थलचर , स्तनधारियों के पदों की आधारभूत संरचना एक समान है , किन्तु यह विभिन्न कशेरूकी जीवों में भिन्न – भिन्न कार्य के लिए होते हैं ।

समजात अंग यह प्रदर्शित करते हैं कि इन अंगों की मूल उत्पत्ति एक ही प्रकार के पूर्वजों से हुई है व जैव विकास का प्रमाण देते हैं ।

समरूप अभिलक्षण :-

वह अभिलक्षण जिनकी संरचना व संघटकों में अंतर होता है , सभी की उत्पत्ति भी समान नहीं होती किन्तु कार्य समान होता है ।

उदाहरण :- पक्षी के अग्रपाद एवं चमगादड़ के अग्रपाद ।

समरूप अंग यह प्रदर्शित करते हैं कि जन्तुओं के अंग जो समान कार्य करते हैं , अलग – अलग पूर्वजों से विकसित हुए हैं ।

जीवाश्म  :-

यदि कोई मृत कीट गर्म मिट्टी में सूख कर कठोर हो जाए तथा उसमें कीट के शरीर की छाप सुरक्षित रह जाए । जीव के इस प्रकार के परिरक्षित अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं । उदहारण :-

आमोनाइट – जीवाश्म – अकशेरूकी
ट्राइलोबाइट – जीवाश्म – अकशेरूकी
नाइटिया – जीवाश्म – मछली
राजोसौरस – जीवाश्म – डाइनोसॉर कपाल

जीवाश्म कितने पुराने हैं :-

खुदाई करने पर पृथ्वी की सतह के निकट वाले जीवाश्म गहरे स्तर पर पाए गए जीवाश्मों की अपेक्षा अधिक नए होते हैं ।

फॉसिल डेटिंग :– जिसमें जीवाश्म में पाए जाने वाले किसी एक तत्व के विभिन्न समस्थानिकों का अनुपात के आधार पर जीवाश्म का समय निर्धारण किया जाता है ।

विकास एवं वर्गीकरण :-

विकास एवं वगीकरण दोनों आपस में जुड़े हैं ।

जीवों का वर्गीकरण उनके विकास के संबंधों का प्रतिबिंब है ।
दो स्पीशीज के मध्य जितने अधिक अभिलक्षण समान होंगे उनका संबंध भी उतना ही निकट का होगा ।
जितनी अधिक समानताएँ उनमें होंगी उनका उद्भव भी निकट अतीत में समान पूर्वजों से हुआ होगा ।
जीवों के मध्य समानताएँ हमें उन जीवों को एक समूह में रखने और उनके अध्ययन का अवसर प्रदान करती हैं ।

विकास के चरण :-

विकास क्रमिक रूप से अनेक पीढ़ियों में हुआ ।

I. योग्यता को लाभ :- जैसे

आँख का विकास जटिल अंगों का विकास डी.एन.ए. में मात्र एक परिवर्तन द्वारा संभव नहीं है , ये क्रमिक रूप से अनेक पीढ़ियों में होता है ।

प्लैनेरिया में अति सरल आँख होती है ।
कीटों में जटिल आँख होती है ।
मानव में द्विनेत्री आँख होती है ।
II . गुणता के लाभ :- जैसे

पंखों का विकास :- पंख ( पर ) -ठंडे मौसम में ऊष्मारोधन के लिए विकसित हुए थे , कालांतर में उड़ने के लिए भी उपयोगी हो गए ।

उदाहरण :- डाइनोसॉर के पंख थे , पर पंखों से उड़ने में समर्थ नहीं थे । पक्षियों ने परों को उड़ने के लिए अपनाया ।

कृत्रिम चयन :-

बहुत अधिक भिन्न दिखने वाली संरचनाएं एक समान परिकल्प में विकसित हो सकती है । दो हजार वर्ष पूर्व मनुष्य जंगली गोभी को एक खाद्य पौधे के रूप में उगाता था तथा उसने चयन द्वारा इससे विभिन्न सब्जियाँ विकसित की । इसे कृत्रिम चयन कहते हैं ।

आण्विक जातिवृत :-

यह इस विचार पर निर्भर करता है कि जनन के दौरान डी.एन.ए. में होने वाले परिवर्तन विकास की आधारभूत घटना है ।
दूरस्थ संबंधी जीवों के डी.एन.ए. में विभिन्नताएँ अधिक संख्या में संचित होंगी ।

मानव विकास के अध्ययन के मुख्य साधन :-

उत्खनन
डी.एन.ए. अनुक्रम का निर्धारण
समय निर्धारण
जीवाश्म अध्ययन


Class 10 science chapter 9  Important Question Answer

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01. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण (Traits) प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं ?

उत्तर– जब मेंडल ने मटर के लंबे पौधे और बौने पौधे का संकरण कराया तो उसे प्रथम संतति पीढ़ी F में सभी पौधे लंबे प्राप्त हुए थे। इसे का अर्थ था कि दो लक्षणों में से केवल एक पैतृक लक्षण ही दिखाई दिया। उन दोनों का मिश्रित प्रमाण दिखाई नहीं दिया। उसने पैतृक पौधों और F, पीढ़ी के पौधों को स्वपरागण से उगाया। इस दूसरी पीढ़ी E, में सभी पौधे लंबे नहीं थे। इस में एक चौथाई पौधे बौने थे। मेंडल ने लंबे पौधों के लक्षण को प्रभावी और बौने पौधों के लक्षण को अप्रभावी कहा।

02. मेंडल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि विभिन्न विकल्पी लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशानुगति करते हैं?

उत्तर– मेंडल ने गोल बीज वाले लंबे पौधों का झुर्रीदार बीजों वाले बिने पौधों से संकरण कराया तो संतति में सभी पौधे प्र्ब्नावी लक्षणों के थे | परन्तु संतति में कुछ पौधे गोल बीज वाले , कुछ झुर्रीदार बीज वाले बौने पौधे थे | अतः ये लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशानुगत होते हैं |

03 . मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है ?

उत्तर– मानवों में लिंग का निर्धारण विशेष लिंग गुणसूत्रों के आधार पर होता है। नर में XY गुणसूत्र होते हैं और मादा में XX गुणसूत्र विद्यमान होते हैं। इससे स्पष्ट है कि मादा के पास Y गुणसूत्र होता ही नहीं है। जब नर-मादा के संयोग से संतान उत्पन्न होती है तो मादा किसी भी अवस्था में नर शिशु को उत्पन्न करने में समर्थ हो ही नहीं सकती क्योंकि नर शिशु में XY गुणसूत्र होने चाहिएँ।

04. वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं जिनके दवारा विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है ?

उत्तर– विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:
(i) यदि लक्षण जीवित रहने में सहायता करता है, तो यह जनसंख्या में बढ़ेगा तथा प्रकृति इसका चयन कर लेगी।
(ii) किसी जिन के विभिन्न विकल्प किसी जनसंख्या में अचानक परिवर्तित होते हैं।
(iii) इन परवाह-विभिन्न जनसंख्याओं के बीच संकरण से, एक ही गति के जीवों में जीनों का आदान-प्रदान होगा इससे विभिन्नताएँ व लक्षण बढ़ेंगे।

05.बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिंता का विषय क्यों है ? |

उत्तर– पर्यावरण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने अन्दर बदलाव उत्पन्न करता है तभी वह जीवित रह पता हैं | बाघ पर्यावरण के अनुकूल परिवर्तन नहीं कर रहे | पर्यावरण में मनुष्य के द्र्वारा आए दिन परिवर्तन हो रहे है बाघों की संख्या दिन -प्रतिदिन घटती जा रही है जो चिंता का विषय है


Class 10 science chapter 9  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. आनुवंशिक पदार्थ कौन-से हैं ?
(a) प्रोटीन
(b) DNA
(c) RNA
(d) उपरोक्त सभी
► (b) DNA

2. विज्ञान की वह शाखा जो आनुवंशिकता तथा विभिन्नताओं की कार्यप्रणाली से संबंध रखती है वह क्या कहलाती है?
(a) आनुवंशिकी
(b) पेलेइंटोलांजी
(c) आणविक जीव विज्ञान
(d) कोशिका विज्ञान
► (a) आनुवंशिकी

3. आनुवंशिकता की इकाई क्या है ?
(a) जीन
(b) प्रोटीन
(c) DNA
(d) RNA
► (a) जीन

4. आनुवंशिक पदार्थ कौन-से हैं ?
(a) प्रोटीन
(b) DNA
(c) RNA
(d) उपरोक्त सभी
► (b) DNA

5. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए किस पौधे को चुना था ?
(a) शीशम
(b) गाजर घास
(c) गार्डन मटर
(d) जंगली मटर
► (c) गार्डन मटर

6. आनुवंशिकता के नियमों की खोज सर्वप्रथम किसने की थी ?
(a) चालर्स डार्विन
(b) यूगो डी वेरीज
(c) जे.बी.लैमार्क
(d) जी .जे मेंडल
► (d) जी .जे मेंडल

7. माता व पिता बच्चे में नुवंशिक पदार्थ का कितने प्रतिशत प्रदान करते हैं ?
(a) असमान मात्रा
(b) पिता अधिक मात्रा प्रदान करता है
(c) बराबर मात्रा
(d) माता अधिक मात्रा प्रदान करती है
► (c) बराबर मात्रा

8. मटर के पौधे में निम्नलिखित में से कौन-सा लक्षण प्रभावी है ?
(a) लम्बापन
(b) फूलों का लाल रंग
(c) पीले बीज
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

Class 10 Science Chapter 9 Notes in Hindi

9. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधे को ही क्यों चुना था ?
(a) अनेक विकल्पी लक्षण
(b) उगाना तथा रख -रखाव आसान है
(c) जीवन काल कम होता है
(c) उपरोक्त सभी
► (c) उपरोक्त सभी

10. मेंडल द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘कारक’ को आज हम किस रूप में जानते हैं ?
(a) DNA
(b) जीन
(c) प्रोटीन
(d) गुण
► (b) जीन

11. लंबे और बौने पौधे के बीच संकरण करवाने पर F1 पीढ़ी कैसी होती है ?
(a) सभी लंबे
(b) सभी बौने
(c) आधे लंबे आधे बौने
(d) इनमें से कोई नहीं
► (a) सभी लंबे

12. एक संकरण क्रॉस की F2 में जीन प्रारूप अनुपात कितना होता है ?
(a) 1:1:1
(b) 1:3:3:1
(c) 1:2:1
(d) 1:4:1
► (c) 1:2:1

13. एक संकरण क्रॉस की F2 में लक्षण प्रारूप अनुपात कितना होता है ?
(a) 1:1
(b) 2:1
(c) 3:1
(d) 4:1
► (c) 3:1

14. जीवों के लक्षण किसके द्वारा नियंत्रित होते हैं ?
(a) जीन
(b) कोशिका द्रव्य
(c) कोशिका झिल्ली
(d) रिक्तिका
► (a) जीन

15. गुणसूत्र किसके बने होते हैं ?
(a) DNA
(b) प्रोटीन
(c) RNA
(d) (a) और (b) दोनों
► (d) (a) और (b) दोनों

16. जीवों के लक्षण किसके द्वारा नियंत्रित होते हैं ?
(a) जीन
(b) कोशिका द्रव्य
(c) कोशिका झिल्ली
(d) रिक्तिका
► (a) जीन

17. अजैव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का विचार किसने दिया ?
(a) जे .बी .लैमार्क
(b) स्टेनले मिलर
(c) जे .बी .एस डाल्डेन
(d) एच .सी. उरे
► (c) जे .बी .एस डाल्डेन

Class 10 Science Chapter 9 VVI QUESTION

18. प्राकृतिक वरण द्वारा जैव विकास का सिद्धांत किसने दिया था ?
(a) जे.बी.लैमार्क
(b) जी.जे.मेंडल
(c) चार्ल्स डार्विन
(d) ह्यूगो डी वेरिज
► (c) चार्ल्स डार्विन

19. अंग जिनकी सरंचना समान होती है तथा कार्य भिन्न होता है ,क्या कहलाते हैं ?
(a) समजात अंग
(b) समरूप अंग
(c) अवशेष अंग
(d) जीवाश्म
► (a) समजात अंग

20. अंग जिनकी सरंचना भिन्न तथा कार्य समान होते है ,क्या कहलाते हैं ?
(a) समजात अंग
(b) समरूप अंग
(c) अवशेष अंग
(d) जीवाश्म
► (b) समरूप अंग

 


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Class 10 Science Chapter 8 Notes in Hindi | जीव जनन कैसे करते हैं

Class 10 Science chapter 8 Notes in Hindi : covered science chapter 8 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि – जनन  क्या है  किसे कहते है, प्रजनन के प्रकार कितने है, ऊतक किसे कहते है क्या है, लैंगिक प्रजनन क्या किसे कहते है, परागण तथा निषेचन में अंतर क्या अंतर है, मानव में प्रजनन क्या है, नर जनन तंत्र क्या है जनन कैसे होते है, गर्भरोधन क्या है इस के कितने प्रकार होते है?

Class 10 Science chapter 8 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 how do organisms reproduce (जीव जनन कैसे करते हैं)
content Class 10 Science chapter 8 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science chapter 8 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 8 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 8

जीव जनन कैसे करते हैं

how do organisms reproduce


Chapter = 8 
.जीव जनन कैसे करते हैं.


 

जनन :-  जनन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं । यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है ।

जनन जीवों का अस्तित्व बनाए रखता है । जनन की मूल घटना डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना है । इसके साथ – साथ दूसरी कोशिकाओं का सृजन भी होता है ।

डी० एन० ए० प्रतिकृति का प्रजनन में महत्त्व :-

वास्तव में कोशिका केन्द्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के डी.एन.ए. के अणुओं में आनुवांशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में जाता है ।

डी.एन.ए. प्रतिकृति बनना भी पूर्णरूपेण विश्वसनीय नहीं होता है । अपितु इन प्रतिकृतियों में कुछ विभिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं , जिनमें से कुछ ऐच्छिक विभिन्नताएं ही संतति में समावेश हो पाती है ।

विभिन्नता का महत्व :-

यदि एक समष्टि अपने निकेत ( परितंत्र ) के अनुकूल है , परन्तु निकेत में कुछ उग्र परिवर्तन ( ताप , जल स्तर में परिवर्तन आदि ) आने पर समष्टि का पूर्ण विनाश संभव है । परन्तु यदि समष्टि में कुछ जीवों में कुछ विभिन्नता होगी तो उनके जीने की कुछ संभावनाएं रहेंगी । अतः विभिन्नताएं स्पीशीज ( समष्टि ) की उत्तरजीविता को लम्बे समय तक बनाए रखने में उपयोगी है । विभिन्नता जैव विकास का आधार होती है ।

प्रजनन के प्रकार :-

अलैंगिक प्रजनन
लैंगिक प्रजनन
अलैंगिक प्रजनन :- जनन की वह विधि जिसमें सिर्फ एकल जीव ही भाग लेते है , अलैंगिक प्रजनन कहलाता है ।

लैंगिक प्रजनन :- जनन की वह विधि जिसमें नर एवं मादा दोनों भाग लेते हैं , लैंगिक प्रजनन कहलाता है ।

अलैंगिक प्रजनन व लैंगिक प्रजनन में अंतर :-

अलैंगिक प्रजनन लैंगिक प्रजनन
एकल जीव नए जीव उत्पन्न करता है । दो एकल जीव ( एक नर व एक मादा ) मिलकर नया जीव उत्पन्न करते हैं ।
युग्मक का निर्माण नहीं होता है । नर युग्मक व मादा युग्मक बनते हैं ।
नया जीव पैतृक जीव के समान / समरूप होता है । नया जीव अनुवांशिक रूप से पैतृक जीवों के समान होता है परन्तु समरूप नहीं ।
सतत् गुणन के लिए यह एक बहुत ही उपयोगी माध्यम है । प्रजाति में विभिन्नताएँ उत्पन्न करने में सहायक होता है ।
यह निम्न वर्ग के जीवों में अधिक पाया जाता है । उच्च वर्ग के जीवों में पाया जाता है ।

अलैंगिक प्रजनन की विधियाँ :-

विखंडन
द्विविखंडन
बहुखंडन
खंडन
पुनरुद्भवन ( पुनर्जनन )
मुकुलन
बीजाणु समासंघ
कायिक प्रवर्धन
बीजाणु समासंघ
1. विखंडन :- इस प्रजनन प्रक्रम में एक जनक कोशिका दो या दो से अधिक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है । उदाहरण :-

( क ) द्विविखंडन :- इसमे जीव दो कोशिकाओं में विभाजित होता है । उदाहरण :- अमीबा , लेस्मानिया
( ख ) बहुखंडन :– इसमे जीव बहुत सारी कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है । उदाहरण :- प्लैज्मोडियम
2. खंडन :- इस प्रजनन विधि में सरल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीव विकसित होकर छोटे – छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है । ये टुकड़े वृद्धि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं । उदाहरण :- स्पाइरोगाइरा ।

3. पुनरुद्भवन ( पुनर्जनन ) :- इस प्रक्रम में किसी कारणवश , जब कोई जीव कुछ टुकड़ों में टूट जाता है , तब प्रत्येक टुकड़ा नए जीव में विकसित हो जाता है । उदाहरण :- प्लेनेरिया , हाइड्रा ।

4. मुकुलन :- इस प्रक्रम में , जीव के शरीर पर एक उभार उत्पन्न होता है जिसे मुकुल कहते हैं । यह मुकुल पहले नन्हें फिर पूर्ण जीव में विकसित हो जाता है तथा जनक से अलग हो जाता है । उदाहरण :- हाइड्रा , यीस्ट ( खमीर ) ।

5. बीजाणु समासंघ :- कुछ जीवों के तंतुओं के सिरे पर बीजाणु धानी बनती है जिनमें बीजाणु होते हैं । बीजाणु गोल संरचनाएँ होती हैं जो एक मोटी भित्ति से रक्षित होती हैं । अनुकूल परिस्थिति मिलने पर बीजाणु वृद्धि करने लगते हैं ।

6. कायिक प्रवर्धन :- कुछ पौधों में नए पौधे का निर्माण उसके कायिक भाग जैसे जड़ , तना पत्तियाँ आदि से होता है , इसे कायिक प्रवर्धन कहते हैं ।

( a ) कायिक प्रवर्धन की प्राकृतिक विधियाँ :-
जड़ द्वारा :- डहेलिया , शकरकंदी
तने द्वारा :- आलू , अदरक
पत्तियों द्वारा :- ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कलिकाएँ होती हैं , जो विकसित होकर नया पौधा बनाती है ।
( b ) कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियाँ :-
रोपण :- आम
कर्तन – गुलाब
लेयरिंग :- चमेली
ऊतक संवर्धन :- आर्किक , सजावटी पौधे
कायिक संवर्धन के लाभ :-
बीज उत्पन्न न करने वाले पौधे ; जैसे :- केला , गुलाब आदि के नए पौधे बना सकते हैं ।
नए पौधे आनुवंशिक रूप में जनक के समान होते हैं ।
बीज रहित फल उगाने में मदद मिलती है ।
पौधे उगाने का सस्ता और आसान तरीका है ।
7. बीजाणु समासंघ :- इस अलैंगिक जनन प्रक्रम में कुछ सरल बहुकोशिकीय जीवों के ऊर्ध्व तंतुओं पर सूक्ष्म गुच्छ ( गोल ) संरचनाएं जनन में भाग लेती हैं । ये गुच्छ बीजाणुधानी है जिनमें बीजाणु वृद्धि करके राइजोपस के नए जीव उत्पन्न करते हैं ।

ऊतक संवर्धन –

इस विधि में शाखा के सिरे से कोशिकाएँ लेकर उन्हें पोषक माध्यम में रखा जाता है । ये कोशिकाएँ गुणन कर कोशिकाओं के गुच्छे जिसे कैलस कहते हैं में परिवर्तित हो जाती है । कैलस को हॉर्मोन माध्यम में रखा जाता है , जहाँ उसमें विभेदन होकर नए पौधे का निर्माण होता है जिसे फिर मिट्टी में रोपित कर देते है । उदहारण :- आर्किक , सजावटी पौधे ।

द्विखण्डन तथा बहुखण्डन में अन्तर :-

द्विखण्डन  बहुखण्डन
यह क्रिया अनुकूल परिस्थितियों में होती है ।  यह क्रिया सामान्यतया प्रतिकूल परिस्थितियों में होती है ।
इसमें केन्द्रक दो पुत्री केन्द्रकों में विभाजित होता है ।  इसमें केन्द्रक अनेक संतति केन्द्रकों में बँट जाता है ।
इसमें केन्द्रक विभाजन के साथ – साथ कोशाद्रव्य का बँटवारा हो जाता है ।  यह सामान्यतया खाँच विधि से होता । इसमें केन्द्रकों का विभाजन पूर्ण होने के पश्चात् प्रत्येक संतति केन्द्रक के चारों ओर थोड़ा – थोड़ा कोशाद्रव्य एकत्र हो जाता है ।
एककोशिकीय जीव से दो सन्तति जीव बनते हैं । इसमें एककोशिकीय जीव से अनेक सन्तति जीव ( जितने भागों में केन्द्रक का विभाजन होता है ) बनते हैं ।
उदाहरण :- अमीबा उदाहरण :- प्लाज्मोडियम

लैंगिक प्रजनन :-

इस जनन विधि में नयी संतति उत्पन्न करने हेतु वे व्यष्टि ( एकल जीवों ) की भागीदारी होती है । दूसरे शब्दों में नवीन संतति उत्पन्न करने हेतु नर व मादा दोनों लिंगों की आवश्यकता होती है ।

लैंगिक प्रजनन नर व मादा युग्मक के मिलने से होता है ।
नर व मादा युग्मक के मिलने के प्रक्रम को निषेचन कहते हैं ।
संतति में विभिन्नता उत्पन्न होती है ।
डी० एन० ए० की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यों है ?

जनन प्रक्रिया में डी ० एन ० ए ० प्रतिकृतिकरण एक आवश्यक प्रक्रम है , इसके फलस्वरूप जीवधारी की संरचना निश्चित बनी रहती है , जिसके कारण जीवधारी अपने सूक्ष्मावास के अनुरूप बना रहता है ।

पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन :-

आवृतबीजी ( एंजियोस्पर्म ) के जननांग पुष्प में अवस्थित होते हैं । बाह्यदल , दल ( पंखुड़ी ) , पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर । पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर पुष्प के जनन भाग हैं जिनमें जनन – कोशिकाएँ होती हैं ।

फूल के प्रकार :-

( i ) एक लिंगी पुष्प :- जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्रीकेसर में से कोई एक जननांग उपस्थित होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं । उदहारण :- पपीता , तरबूज ।

( ii ) उभयलिंगी पुष्प :- जब पुष्प पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर दोनों उपस्थित होते हैं तो उन्हें उभयलिंगी पुष्प कहते हैं । उदहारण :- गुड़हल , सरसों

बीज निर्माण की प्रक्रिया :-

परागकोश में उत्पन्न परागकण , हवा , पानी या जन्तु द्वारा उसी फूल के वर्तिक्राग ( स्वपरागण ) या दूसरे फूल के वर्तिकाग्र ( परपरागण ) पर स्थानांतरित हो जाते हैं ।
परागकण से एक नलिका विकसित होती है जो वर्तिका से होते हुए बीजांड तक पहुँचती है ।
अंडाशय के अन्दर नर व मादा युग्मक का निषेचन होता है तथा युग्मनज का निर्माण होता है ,
युग्मनज में विभाजन होकर भ्रूण का निर्माण होता है । बीजांड से एक कठोर आवरण विकसित होकर बीज में बदल जाता है ।
अंडाशय फल में बदल जाता है तथा फूल के अन्य भाग झड़ जाते हैं ।
अंकुरण :-

बीज ( भावी पौधा ) / भ्रूण जो उपयुक्त पीरास्थितियों में नवोद्भिद में विकसित होता है । इस प्रक्रम को अंकुरण कहते हैं ।

परागण तथा निषेचन में अंतर :-

परागण निषेचन
परागकोश से पराग कणों के वर्तिकाग्र पर पहुँचने की क्रिया परागण कहलाती है । नर तथा मादा युग्मकों के मिलने की प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं ।
परागण प्राय :- कीट , वायु , जल , पक्षी आदि के माध्यम से होता है । उच्च पादपों में नर युग्मकों को मादा युग्मक तक ले जाने का कार्य परागनलिका करती है ।
यह क्रिया निषेचन से पहले होती है । उच्च पादपों में नर युग्मकों को मादा युग्मक तक ले जाने का कार्य परागनलिका करती है ।

मानव में प्रजनन :-

मानवों में लैंगिक जनन होता है ।

लैंगिक परिपक्वता :- जीवन का वह काल जब नर में शुक्राणु तथा मादा में अंड – कोशिका का निर्माण शुरू हो जाता है । किशोरावस्था की इस अवधि को यौवनारंभ कहते हैं ।

यौवनारंभ पर परिवर्तन :-

( a ) किशोरों में एक समान :-

कांख व जननांग के पास गहरे बालों का उगना ।
त्वचा का तैलीय होना तथा मुँहासे निकलना ।
( b ) लड़कियों में :-

स्तन के आकार में वृद्धि होने लगती है ।
रजोधर्म होने लगता है ।
( c ) लड़कों में :-

चेहरे पर दाढ़ी – मूंछ निकलना ।
आवाज का फटना ।
ये परिवर्तन संकेत देते हैं कि लैंगिक परिपक्वता हो रही है ।

नर जनन तंत्र :-

जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले अंग , संयुक्त रूप से , नर जनन तंत्र बनाते हैं ।

( i ) वृषण :- कोशिका अथवा शुक्राणु का निर्माण वृषण में होता है । यह उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं । इसका कारण यह है कि शुक्राणु उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से कम होता है ।

वृषण ग्रन्थी , टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उत्पन्न करती है ।
टेस्टोस्टेरॉन के कार्य :-
शुक्राणु उत्पादन का नियंत्रण ।
लड़कों में यौवनावस्था परिवर्तन ।
( ii ) शुक्रवाहिनी :- उत्पादित शुक्राणुओं का मोचन शुक्रवाहिकाओं द्वारा होता है । ये शुक्रवाहिकाएँ मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़ कर एक संयुक्त नली बनाती है ।

( iii ) मूत्रमार्ग :- यह मूत्र और वीर्य दोनों के बाहर जाने का मार्ग हैं । बाहरी आवरण के साथ इसे शिश्न कहते हैं ।

( iv ) संबंधित ग्रंथियाँ :- शुक्राशय ग्रथि तथा प्रोस्ट्रेट ग्रंथि अपने स्राव शुक्रवाहिनी में डालते हैं । इससे :-

शुक्राणु तरल माध्यम में आ जाते हैं ।
यह माध्यम उन्हें पोषण प्रदान करता है ।
उनके स्थानांतरण में सहायता करता है । शुक्राणु तथा ग्रंथियों का स्राव मिलकर वीर्य बनाते हैं ।

मादा जनन तंत्र :-

( i ) अंडाशय :-

मादा युग्मक अथवा अंड – कोशिका का निर्माण अंडाशय में होता है ।
लड़की के जन्म के समय ही अंडाशय में हजारों अपरिपक्व अंड होते हैं ।
यौवनारंभ पर इनमें से कुछ अंड परिपक्व होने लगते हैं ।
दो में से एक अंडाशय द्वारा हर महीने एक परिपक्व अंड उत्पन्न किया जाता है ।
अंडाशय एस्ट्रोजन व प्रोजैस्ट्रोन हॉर्मोन भी उत्पन्न करता है ।
( ii ) अंडवाहिका ( फेलोपियन ट्यूब ) :-

अंडाशय द्वारा उत्पन्न अंड कोशिका को गर्भाशय तक स्थानांतरण करती है ।
अंड कोशिका व शुक्राणु का निषेचन यहाँ पर होता है ।
( iii ) गर्भाशय :-

यह एक थैलीनुमा संरचना है जहाँ पर शिशु का विकास होता है ।
गर्भाशय ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता हैं ।
जब अंड – कोशिका का निषेचन होता है :-

निषेचित अंड युग्मनज कहलाता है , जो गर्भाशय में रोपित होता है । गर्भाशय में रोपण के पश्चात् युग्मनज में विभाजन व विभेदन होता है तथा भ्रूण का निर्माण होता है ।

जब अंड का निषेचन नहीं होता :-

हर महीने गर्भाशय खुद को निषेचित अंड प्राप्त करने के लिए तैयार करता है ।
गर्भाशय की भित्ती मांसल एवं स्पोंजी हो जाती है । यह भ्रूण के विकास के लिए जरूरी है ।
यदि निषेचन नहीं होता है तो इस भित्ति की आवश्यकता नहीं रहती । अतः यह पर्त धीरे – धीरे टूट कर योनि मार्ग से रक्त एवं म्यूकस के रूप में बाहर निकलती है ।
यह चक्र लगभग एक महीने का समय लेता है तथा इसे ऋतुस्राव अथवा रजोधर्म कहते हैं ।
40 से 50 वर्ष की उम्र के बाद अंडाशय से अंड का उत्पन्न होना बन्द हो जाता है । फलस्वरूप रजोधर्म बन्द हो जाता है जिसे रजोनिवृति कहते हैं ।
प्लेसेंटा :-

यह एक विशिष्ट उत्तक हैं जिसकी तश्तरीनुमा संरचना गर्भाशय में धंसी होती है ।

प्लेसेंटा के मुख्य कार्य :-

माँ के रक्त से ग्लूकोज ऑक्सीजन आदि ( पोषण ) भ्रूण को प्रदान करना ।
भ्रूण द्वारा उत्पादित अपशिष्ट पदार्थों का निपटान ।
गर्भकाल :-

अंड के निषेचन से लेकर शिशु के जन्म तक के समय को गर्भकाल कहते हैं । इसकी अवधि लगभग 9 महीने होती है ।

जनन स्वास्थ्य :-

जनन स्वास्थ्य का अर्थ है , जनन से संबंधित सभी आयाम जैसे शारीरिक , मानसिक , सामाजिक एवं व्यावहारिक रूप से स्वस्थ्य होना ।

रोगों का लैंगिक संचरण :-

( STD’s ) अनेक रोगों का लैंगिक संचरण भी हो सकता है ; जैसे :-

( a ) जीवाणु जनित :- गोनेरिया , सिफलिस
( b ) विषाणु जनित :- मस्सा ( warts ) , HIV – AIDS
कंडोम के उपयोग से इन रोगों का संचरण कुछ सीमा तक रोकना संभव है ।

गर्भरोधन :-

गर्भधारण को रोकना गर्भरोधन कहलाता है ।

गर्भरोधन के प्रकार :-

( a ) यांत्रिक अवरोध :-

शुक्राणु को अंडकोशिका तक नहीं पहुँचने दिया जाता । उदाहरण :-

शिश्न को ढकने वाले कंडोम
योनि में रखे जाने वाले सरवाइकल कैप
( b ) रासायनिक तकनीक :-

मादा में अंड को न बनने देना , इसके लिए दवाई ली जाती है जो हॉर्मोन के संतुलन को परिवर्तित कर देती है ।

इनके अन्य प्रभाव ( विपरीत प्रभाव ) भी हो सकते हैं ।

( c ) IUCD ( Intra Uterine contraceptive device ) :-

लूप या कॉपर- T को गर्भाशय में स्थापित किया जाता है । जिससे गर्भधारण नहीं होता ।

( d ) शल्यक्रिया तकनीक :-

( i ) नसबंधी :- पुरुषों में शुक्रवाहिकाओं को रोक कर , उसमें से शुक्राणुओं के स्थानांतरण को रोकना ।
( ii ) ट्यूबेक्टोमी :- महिलाओं में अंडवाहनी को अवरुद्ध कर , अंड के स्थानांतरण को रोकना ।
भ्रूण हत्या :-

मादा भ्रूण को गर्भाशय में ही मार देना भ्रूण हत्या कहलाता है ।

एक स्वस्थ्य समाज के लिए , संतुलित लिंग अनुपात आवश्यक है । यह तभी संभव होगा जब लोगों में जागरूकता फैलाई जाएगी व भ्रूण हत्या तथा भ्रूण लिंग निर्धारण जैसी घटनाओं को रोकना होगा |


Class 10 science chapter 8  Important Question Answer

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01. एक-कोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में क्या अंतर है ?
उत्तर:
एक – कोशिक जीवों में सरल संरचना होती है अतः उनमें अलैंगिक प्रजनन होता है तथा जनन के लिए विशेष अंग नंही होते | इनमे जनन दो तरह से होता है – द्विखंदन तथा बहुविखंडन | बहुकोशिकीय जीवों में जटिल सरंचना के कारण जनन तंत्र होते है अतः उनमें लैंगिक प्रजनन भी होता है तथा अलैंगिक भी |

02. जनन किसी स्पीशीज की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर :
जनन की मूल रचना DNA की प्रतिर्कति बनाता है | कोशिकाएँ विभिन्न रासायनिक क्रियाएँ DNA की दो प्रतिर्कति बनती है यह जीव की संरचना एंव पैटर्न के लिए उत्तरदायी है DNA की ये प्रतिर्कतियाँ विलग होकर ‘विभाजित होती है | व दो कोशिकाओं का निर्माण करती है | इस प्रकार कुछ विभिन्नता आती है जो स्पीशीज के असितत्व के लाभप्रद है |

03. गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते हैं ?
उत्तर :
गर्भधारण युकितयाँ गर्भधारण को रोकने हेतु अपनाई जाती है | जीव प्रजनन क्रिया करते है एंव जीवों की वृद्धि करते है इस प्रकार यदि यह क्रिया निरंतर चलती रहे तो पृथ्वी पर जनसंख्या विस्फोट हो जाए इसके अतिरिक्त गर्भधारण के समय स्त्री के शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है | अतः अधिक बार यह क्रिया उसके लिए हानिकारक हो सकती है | इस प्रकार गर्भ निरोधक युकितयाँ परम आवश्यक है |

04. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के जीवित रहने के लिए किस प्रकार उतरदायी हैं?
उत्तर :
जीवों में विभिन्नता ही उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में बने रहने में सहायक हैं। शीतोष्ण जल में पाए जाने वाले जीव़ परिस़्िथतिक तं़त्ऱ के अनुकुल जीवित रहते है। यदि वैश्विक उष्मीकरण के कारण जल का ताप बढ जाता हैं तो अधिकतर जीवाणु मर जाएगें, परन्तु उष्ण प्रतिरोधी क्षमता वाले कुछ जीवाणु ही खुद को बचा पाएगें और वृद्धि कर पाएगें । अतः जीवों में विभिन्नता स्पीशीज की उतरजीविता बनाए रखने में उपयोगी हैं ।

05.  शरीर का अभिकल्प समान होने के लिए जनन जीव के अभिकल्प का ब्लूप्रिंट तैयार करता है। परन्तु अंततः शारीरिक अभिकल्प में विविधता आ ही जाती है। क्यों?
उत्तर :

क्योंकि कोशिका के केन्द्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के डी. एन. ए. के अणुओं में आनुवांशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढी में जाता है । कोशिका के केन्द्रक के डी. एन. ए. में प्रोटीन संश्लेषण के लिए सूचना निहित होती हैं इस सूचना के भिन्न होने की अवस्था में बनने वाली प्रोटीन भी भिन्न होगी । इन विभिन्न प्रोटीनों के कारण अंततः शारीरिक अभिकल्प में विविधता आ ही जाती है।

06. डी. एन. ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यो है ?
उत्तर :
डी. एन. ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक हैं क्योंकि-

डी. एन. ए. की प्रतिकृति संतति जीव में जैव विकास के लिए उतरदायी होती हैं ।
डी. एन. ए. की प्रतिकृति में मौलिक डी. एन. ए. से कुछ परिवर्तन होता है मूलतः समरूप नहीं होते अतः जनन के बाद इन पीढीयों में सहन करने की क्षमता होती है ।
डी. एन. ए. की प्रतिकृति में यह परिवर्तन परिवर्तनशील परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता प्रदान करती है ।

 


Class 10 science chapter 8  Important Objective Question Answer (MCQ)

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1. एक कोशिका विभाजित होकर कितनी कोशिकाएँ बनाती है ?
(a) चार
(b) दो
(c) छह
(d) आठ
► (b) दो

2. कौन -सा अणु है जो जीव संरचना/डिज़ाइन का ब्लूप्रिंट रखता है ?
(a) DNA
(b) RNA
(c) प्रोटीन
(d) कार्बोहाइड्रेट
► (a) DNA

3. दो कोशिकाएँ जो समसूत्रों विभाजन के परिणामस्वरुप बनती है वे कैसी होती है ?
(a) असमान
(b) एक जैसी
(c) कुछ समान कुछ असमान
(d) इनमें से कोई नहीं
► (b) एक जैसी

4. एकल जीवों में प्रजनन की कौन – कौन सी विधि है ?
(a) विखंडन और खंडन
(b) पुर्नजनन
(c) मुकुलन
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

5. विभिन्नताएँ किसका आधार होती है ?
(a) जाति उद्भव का
(b) जैव विकास का
(c) समिष्ट का
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी
6. प्लैज्मोडियम में अलैंगिक जनन की कौन – सी विधि है ?
(a) द्विखंडन
(b) खंडन
(c) बहुखंडन
(d) मुकुलन
► (c) बहुखंडन

7. निम्नलिखित में से कौन सा जीव विखंडन द्वारा जनन करता है ?
(a) अमीबा
(b) पैरामीशियम
(c) लेस्मानिया
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

Class 10 Science Chapter 8 Notes in Hindi

8. जनन की किस विधि में जीव टुकड़ों में टूट जाता है और ये टुकड़ें वृद्धि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं ?
(a) पुनरुद्धवन (पुनर्जनन)
(b) मुकुलन
(c) खंडन
(d) कायिक प्रवर्धन
► (a) पुनरुद्धवन (पुनर्जनन)

9. स्पाइरोगाइरा में जनन की कौन सी विधि है ?
(a) द्विखंडन
(b) मुकुलन
(c) खंडन
(d) पुनर्जनन
► (c) खंडन

10. हाइड्रा पुनर्जनन की क्षमता वाली कोशिकाओं का उपयोग किसके लिए करते हैं ?
(a) खंडन
(b) द्विखंडन
(c) मुकुलन
(d) कायिक प्रवर्धन
► (c) मुकुलन

11. मुकुलन किस जीव में देखी जा सकती है ?
(a) ब्रायोफिलम
(b) अमीबा
(c) यीस्ट
(d) लेस्मानिया
► (c) यीस्ट

12. कायिक प्रवर्धन द्वारा कौन जनन करता है ?
(a) गन्ना
(b) गुलाब
(c) अंगूर
(d) उपरोक्त सभी
► (d) उपरोक्त सभी

13. किस अलैंगिक जनन विधि में पौधे का पूरा का पूरा शरीर पौधे के किसी भाग जैसे जड़, तना या पत्ते से विकसित होता है?
(a) पुनर्जनन
(b) मुकुलन
(c) कायिक प्रवर्धन
(d) खंडन
► (c) कायिक प्रवर्धन

14. ब्रायोफिलम में कायिक प्रवर्धन किसके द्वारा होता है ?
(a) तने द्वारा
(b) पत्तों द्वारा
(c) जड़ों द्वारा
(d) बीजों द्वारा
► (b) पत्तों द्वारा

Class 10 Science Chapter 8 vvi question

15. आलू में कायिक प्रवर्धन किसके द्वारा होता है ?
(a) पत्तों द्वारा
(b) तने द्वारा
(c) जड़ों द्वारा
(d) फूलों द्वारा
► (b) तने द्वारा

16. निम्नलिखित में से किसमें अधिक विभिन्ताएँ उत्पन्न होती है ?
(a) अलैंगिक जनन द्वारा
(b) कायिक प्रवर्धन द्वारा
(c) लैंगिक जनन द्वारा
(d) (a) और (b) दोनों
► (c) लैंगिक जनन द्वारा

17. राइनोपस में अलैंगिक जनन विधि कौन -सी है ?
(a) खंडन
(b) विखंडन
(c) मुकुलन
(d) बीजाणु समासंध
► (d) बीजाणु समासंध

18. कौन सी जनन कोशिका बड़ी होती है और उसमें भोजन का पर्याप्त भंडार भी होता है ?
(a) नर युग्मक
(b) मादा युग्मक
(c) क और ख दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
► (a) नर युग्मक


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Class 10 Science Chapter 7 Notes in Hindi | नियंत्रण एवं समन्वय

Class 10 Science Chapter 7 Notes in Hindi : covered science Chapter 7 easy language with full details details & concept  इस अद्याय में हमलोग जानेंगे कि –  नियंत्रण एवं समन्वय क्या है किसे कहते है, ग्राही निम्न कितने प्रकार के होते हैं, मस्तिष्क के कितने भाग होते है, और उनके कार्य हैं, पादप क्या है कितने प्रकार के होते है, फाइटोंहार्मोन या पादपहार्मोन क्या है?

Class 10 Science Chapter 7 Notes in Hindi full details

category  Class 10 Science Notes in Hindi
subjects  science
Chapter Name Class 10 control and coordination ( नियंत्रण एवं समन्वय )
content Class 10 Science Chapter 7 Notes in Hindi
class  10th
medium Hindi
Book NCERT
special for Board Exam
type readable and PDF

NCERT class 10 science Chapter 7 notes in Hindi

विज्ञान अद्याय 7 सभी महत्पूर्ण टॉपिक तथा उस से सम्बंधित बातों का चर्चा करेंगे।


विषय – विज्ञान  अध्याय – 7

नियंत्रण एवं समन्वय

control and coordination


परिचय:

संसार के सभी जीव अपने आस-पास होने वाले परिवर्तनों के प्रति-अनुक्रिया करते है | पर्यावरण में प्रत्येक परिवर्तन की अनुक्रिया से एक समुचित गति उत्पन्न होती है | कोई भी गति उस घटना पर निर्भर करती है जो उसे प्रेरित करती है | जैसे- हम गरम वस्तु को छूटे हैं तो हमारा हाथ जलने लगता है और हम तुरंत इसके प्रति अनुक्रिया (respond) करते है |

जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय (Controll and Coordination in Animals):

जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय तंत्रिका तथा पेशी उत्तक द्वारा किया जाता है |

ग्राही (Receptor): तंत्रिका कोशिकाओं के विशिष्ट सिरे जो पर्यावरण से सभी सूचनाओं का पता लगाते हैं ग्राही कहलाते हैं |

ग्राहियों के प्रकार (Types of Receptors):

ग्राही निम्न प्रकार के होते हैं :

(i) प्रकाश ग्राही (Photo receptor) —-> दृष्टि के लिए (आँख)

(ii) श्रावण ग्राही (Phono receptor) —-> सुनने के लिए (कान)

(iii) रस संवेदी ग्राही (Gustatory receptor) —> स्वाद के लिए (जीभ)

(iv) घ्राण ग्राही (Olfactory receptor) —> सूंघने के लिए (नाक)

(v) स्पर्श ग्राही (Thermo receptor) —> ऊष्मा को महसूस करने के लिए (त्वचा)

ये सभी ग्राही हमारे ज्ञानेन्द्रियों (Sense organs) में स्थित होते हैं |

तंत्रिका ऊतक (Norvous Tissues) : तंत्रिका उत्तक तंत्रिका कोशिकाओं या न्यूरॉन के इक संगठित जाल का बना हुआ होता है और यह सूचनाओं के विद्युत आवेग के द्वारा शरीर के एक भाग से दुसरे भाग तक संवहन के लिए विशिष्टीकृत (specialised) हैं |
तंत्रिका कोशिका के भाग (The parts of norvous cells):

(i) द्रुमाकृतिक सिरा (द्रुमिका) Dendrite : जहाँ सूचनाएँ उपार्जित की जाती है |

(ii) द्रुमिका से कोशिकाय तक (From Dendrite to Cytoplasm) : जिससे होकर सूचनाएँ विद्युत आवेग की तरह यात्रा करती हैं |

(iii) एक्सॉन (Axon): जहाँ इस आवेग का परिवर्तन रासायनिक संकेत में किया जाता है जिससे यह आगे संचारित हो सके |

तंत्रिकाओं द्वारा सूचनाओं का संचरण (propagation of informations through nerves):

सभी सूचनाएँ जो हमारे मस्तिष्क तक जो पहुँचाती हैं ये सूचनाएँ एक तंत्रिका कोशिका के द्रुमाकृतिक सिरे द्वारा उपार्जित (aquaired) की जाती है, और एक रासायनिक क्रिया द्वारा एक विद्युत आवेग पैदा करती हैं | यह आवेग द्रुमिका से कोशिकाकाय तक जाता है फिर तब तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन ) में होता हुआ इसके अंतिम सिरे तक पहुँच जाता है | एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग का परिवर्तन रासायनिक संकेत में किया जाता है ताकि यह आगे संचारित हो सके | ये रासायनिक संकेत रिक्त स्थान या सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार ) को पार करते है और अगली तंत्रिका की द्रुमिका में इसी तरह का विद्युत आवेग प्रारंभ करते हैं | इस प्रकार सूचनाएं एक जगह से दूसरी जगह संचारित हो जाती हैं |

सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार) : दो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच में एक रिक्त स्थान पाया जाता है इसे सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार) कहते हैं |
प्रतिवर्ती क्रिया :

किसी उद्दीपन के प्रति, मस्तिष्क के हस्तक्षेप के बिना, अचानक अनुक्रिया, प्रतिवर्ती क्रिया कहलाती है |

ये क्रियाएँ स्वत: होने वाली क्रियाएँ है जो जीव की इच्छा के बिना ही होती है |

उदाहरण:

(i) किसी गर्म वस्तु को छूने से जलने पर तुरंत हाथ हटा लेना |

(ii) खाना देखकर मुँह में पानी का आ जाना

(iii) सुई चुभाने पर हाथ का हट जाना आदि |

प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियंत्रण: सभी प्रतिवर्ती क्रियाएँ मेरुरज्जू के द्वारा नियंत्रित होती है |

ऐच्छिक क्रियाएँ: वे सभी क्रियाएँ जिस पर हमारा नियंत्रण होता है, ऐच्छिक क्रियाएँ कहलाती हैं |

जैसे- बोलना, चलना, लिखना आदि |

ऐच्छिक क्रियाओं का नियंत्रण: ऐच्छिक क्रियाएँ हमारी इच्छा और सोंचने से होती है इसलिए इसका नियंत्रण हमारे सोचने वाला भाग अग्र-मस्तिष्क के द्वारा होता है |

अनैच्छिक क्रियाएँ : वे सभी क्रियाएँ जो स्वत: होती रहती है जिनपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है | अनैच्छिक क्रियाएँ कहलाती है |

जैसे: ह्रदय का धड़कना, साँस का लेना, भोजन का पचना आदि |

अनैच्छिक क्रियाओं का नियंत्रण: अनैच्छिक क्रियाएँ मध्य-मस्तिष्क व पश्च-मस्तिष्क के द्वारा नियंत्रित होती हैं |

प्रतिवर्ती चाप : प्रतिवर्ती क्रियाओं के आगम संकेतों पता लगाने और निर्गम क्रियाओं के करने के लिए संवेदी तंत्रिका कोशिका और प्रेरित तंत्रिका कोशिका मेरूरज्जु के साथ मिलकर एक पथ का निर्माण करती है जिसे प्रतिवर्ती चाप कहते है |
जन्तुओं में प्रतिवर्ती चाप एक दक्ष प्रणाली अथवा जंतुओं में प्रतिवर्ती चाप की उपयोगिता :

अधिकतर जंतुओं में प्रतिवर्ती चाप इसलिए विकसित हुआ है क्योंकि इनके मस्तिष्क के सोचने का प्रक्रम बहुत तेज नहीं है। वास्तव में अधिकांश जंतुओं में सोचने के लिए आवश्यक जटिल न्यूराॅन जाल या तो अल्प है या अनुपस्थित होता है। अतः यह स्पष्ट है कि वास्तविक विचार प्रक्रम की अनुपस्थिति में प्रतिवर्ती चाप का दक्ष कार्य प्रणाली के रूप में विकास हुआ है। यद्यपि जटिल न्यूराॅन जाल के अस्तित्व में आने के बाद भी प्रतिवर्ती चाप तुरंत अनुक्रिया के लिए एक अधिक दक्ष प्रणाली के रूप में कार्य करता है।

अर्थात जन्तुओं में सोंचने की शक्ति बहुत कम या क्षीण होती है जिससें वे तुरन्त अनुक्रिया कर अपना बचाव नही कर सकते है। अतः इस कमी को पुरा करने के लिए अधिकतर जन्तुओं में प्रतिवर्ती चाप एक दक्ष प्रणाली के रूप में कार्य करता है।
मानव मस्तिष्क (Human Brain) : मानव मस्तिष्क तंत्रिका कोशिकाओं से बना तंत्रिका तंत्र (nervous system) का एक बहुत बड़ा भाग है | जो मेरुरज्जु के साथ मिलकर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का मिर्माण करता है |
मेरुरज्जु (Spinal Chord) : मेरुरज्जु तंत्रिका रेशों का एक बेलनाकार बण्डल है जिसके उत्तक मेरुदंड (spine) से होकर मस्तिष्क से लेकर कोक्किक्स (Coccyx) तक गुजरते हैं | यह शरीर के सभी भागों को तंत्रिकाओं से जोड़ता है और मस्तिष्क के साथ मिलकर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का निर्माण करता है
कार्य (Functions):

(i) ये शरीर के सभी भागों से सूचनाएँ प्राप्त करते हैं तथा इसका समाकलन करते हैं |

(ii) ये पेशियों तक सन्देश भेजते हैं |

(iii) मस्तिष्क हमें सोचने की अनुमति तथा सोचने पर आधारित क्रिया करने की अनुमति प्रदान करता है।

(iv) सभी प्रतिवर्ती क्रियाएं मेरुरज्जु के द्वारा नियंत्रित होती हैं |

(v) सभी ऐच्छिक एवं अनैच्छिक क्रियाएँ मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होती हैं |

क्रेनियम (Cranium) : मानव खोपड़ी का वह भाग जो मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें मनुष्य का दिमाग स्थित रहता है |

मस्तिष्क आवरण (Menings) : मस्तिष्क आवरण तीन पतली झिल्लियों से बना एक आवरण है जो मानव मस्तिष्क को आंतरिक अघात से सुरक्षा प्रदान करता हैं | इसके अंदर एक तरल पदार्थ से भरा रहता है जिसे सेरिब्रो स्पाइनल फ्लूड (Cerebro Spinal Fluid) कहते हैं | यह मस्तिष्क से मेरुरज्जु तक फैला रहता है |

CSF (Cerebro Spinal Fluid) सेरिब्रो स्पाइनल फ्लूड : यह मस्तिष्क आवरण के दो परतों के बीच में पाया जाने वाला एक तरल पदार्थ है जो मस्तिष्क को आंतरिक अघात से सुरक्षा प्रदान करता है और मस्तिष्क आवरणशोथ से बचाता है |

मस्तिष्क के भाग और उनके कार्य :

The parts of Brain and their Functions:

1. अग्र मस्तिष्क (Fore Brain) : यह सोंचने वाला मुख्य भाग है। इसमें’ विभिन्न ग्राहियों से संवेदी आवेग प्राप्त करने के क्षेत्र होते हैं । इसमें सुनने, देखने और सूँघने के लिए विशेष भाग होते हैं । यह ऐच्छिक पेशियों के गति को नियंत्रित करता है। इसमें भूख से संबंधित केन्द्र है।

2. मध्य मस्तिष्क (Mid Brain): यह शरीर के सभी अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है।

3. पश्च मस्तिष्क (Hind Brain): यह भी अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है। सभी अनैच्छिक क्रियाएँ जैसे रक्तदाब, लार आना तथा वमन पश्चमस्तिष्क स्थित मेडुला द्वारा नियंत्रित होती हैं।

पश्च मस्तिष्क तीन केन्द्रों से मिलकर बना है |

(i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum): यह ऐच्छिक क्रियाओं की परिशुद्धि तथा शरीर की संस्थिति तथा संतुलन को नियंत्रित करती है | जैसे एक सीधी रेखा में चलना, साइकिल चलाना, एक पेंसिल उठाना इत्यादि |

(ii) पॉन्स (Pons) : यह श्वसन क्रिया के नियमित और नियंत्रित करने में भाग लेता है |

(iii) मेडुला ओब्लांगेटा (Medula Oblongata) : सभी अनैच्छिक क्रियाएँ जैसे रक्तदाब, लार आना तथा वमन पश्चमस्तिष्क स्थित मेडुला द्वारा नियंत्रित होती हैं।
पौधों में नियंत्रण एवं समन्वय
पौधों में नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य पादप हार्मोंस जिसे फाइटोहार्मोंस भी कहा जाता है के द्वारा होता है। विविध पादप हॉर्मोन वृद्धि, विकास तथा पर्यावरण के प्रति अनुक्रिया के समन्वय में सहायता करते हैं।

पादप दो भिन्न प्रकार की गतियाँ दर्शाते हैं-

(1) वृद्धि से मुक्त – ये गतियाँ वृद्धि पर निर्भर नहीं करती है | जैसे – छुई-मुई के पौधे का स्पर्श से सिकुड़ जाना |

(2) वृद्धि पर आश्रित – पौधों में होने वाली ये गतियाँ वे गतियाँ होती है जो पौधों के कायिक भाग में गतियों को दर्शाती है | जैसे – प्रतान की गति, पौधे का प्रकाश की ओर गति और जड़ों का जल की ओर गति आदि |

(1) वृद्धि से मुक्त गति

छुई-मुई के पौधे में गति – जब हम छुई-मुई के पौधों को स्पर्श करते हैं तो अनुक्रिया के फलस्वरूप अपने पत्तियों में गति करता है | यह गति वृद्धि से सम्बंधित नहीं है |

पादपों में उद्दीपन के प्रति तत्काल अनुक्रिया –

पादप स्पर्श की सूचना को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचारित करने के लिए वैद्युत-रसायन साधन का उपयोग भी करते हैं लेकिन जंतुओं की तरह पादप में सूचनाओं के चालन के लिए कोई विशिष्टीकृत ऊतक नहीं होते हैं। पादप कोशिकाओं में जंतु पेशी कोशिकाओं की तरह विशिष्टीकृत प्रोटीन तो नहीं होतीं अपितु वे जल की मात्रा में परिवर्तन करके अपनी आकृति बदल लेती हैं, परिणामस्वरूप फूलने या सिकुड़ने में उनका आकार बदल जाता है।

(2) वृद्धि पर आश्रित गति

(a) प्रतान की गति –

(b) अनुवर्तन

(i) प्रकाशानुवर्तन

(ii) गुरुत्वानुवर्तन

(iii) रसायानानुवर्तन

(iv) जलानुवर्तन

स्रावित होने वाले हाॅर्मोन का समय और मात्रा का नियंत्रण:

स्रावित होने वाले हाॅर्मोन का समय और मात्रा का नियंत्राण पुनर्भरण क्रियाविधि से किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि रुधिर में शर्करा स्तर बढ़ जाता है तो इसे अग्न्याशय की कोशिका संसूचित कर लेती है तथा इसकी अनुक्रिया में अधिक इंसुलिन स्रावित करती है। जब रुधिर में स्तर कम हो जाता है तो इंसुलिन का स्रावण कम हो जाता है।

हार्मोन्स (Harmones) : वे रासायनिक पदार्थ जो जंतुओं या पादपों में नियंत्रण और समन्वय का कार्य करते हैं | हार्मोन्स कहलाते हैं |

जंतुओं में हार्मोन का बनना :

जंतुओं में हार्मोन अंत:स्रावी ग्रंथियों में बनता है |

मनुष्य में अथवा जंतुओं में ग्रंथियां दो प्रकार की होती हैं | जो निम्न हैं –

(1) अंत: स्रावी ग्रंथियाँ :

(2) बाह्य-स्रावी ग्रंथियाँ :

(1) अंत: स्रावी ग्रंथियाँ : नलिकाविहीन ग्रंथियों को अंत: स्रावी ग्रंथियाँ कहते हैं | जैसे – पिनियल ग्रंथि, पिट्यूटरी ग्रंथि, थाइरोइड ग्रंथि, पाराथाइराइड ग्रंथि, थाइमस ग्रंथि, एड्रिनल ग्रंथि, अंडाशय (ओवरी) (मादाओं में) और वृषण (नर में) आदि|

(2) बाह्य-स्रावी ग्रंथि : वे ग्रंन्थियाँ जिनका स्राव नलिकाओं के द्वारा होता है बाह्य-स्रावी ग्रंथि कहलाती हैं | जैसे – यकृत, अग्नाशय और लैक्रिमल ग्रंथि आदि|

फाइटोंहार्मोन या पादपहार्मोन :

वे रसायनिक पदार्थ तो पादपों में नियंत्रण तथा समन्वय का कार्य करते है, फाइटोंहार्मोन या पादप हार्मोन कहलाते है।

ये कितने पांच प्रकार के होते है –
1. ऑक्सीन (Auxins) :
(i) पौधे में कोशिका विवर्धन तथा कोशिका विभेदन को बढावा देते है।
(ii) ऑक्सीन फलों की वृद्धि को बढावा देते है।
(iii) कोशिकाओं की लंबाई में वृद्धि करते है।
2. जिबरेलीन (Gibberllin) :
(i) ऑक्सीन की उपस्थिति में जिबरेलिन पौधे में कोशिका विवर्धन तथा कोशिका विभेदन को बढावा देते है।
(ii) फलों तथा तनों की वृद्धि को बढावा देते है।

3. साइटोकाइनीन ;ब्लजवापदपदेद्ध
पौधे में कोशिका विभाजन को बढावा देते है।
फलों को खिलने में सहायता करता है।

4. ऐब्सिसिक अम्ल (Absesic Acid) :
(i) पौधें में वृद्धि को रोकता/नियंत्रित करता है।
(ii) पौधों में जल ह्रास को नियंत्रित करता है।
(iii) पौधों में प्रोटिन के संश्लेषण को प्रोत्साहित करता है।

5. इथिलीन
यह फलों को पकने के लिए प्रेरित करता है।
मादा पुष्पों की संख्या बढाता है।
तनों को फुलने में सहायता करता है।


Class 10 science chapter 7 Important Objective Question Answer (MCQ)

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01. निम्नलिखित में से कौन-सा पादप हॉर्मोन है?
(a) इंसुलिन
(b) थायरॉक्सिन
(c) एस्ट्रोजन
(d) साइटोकाइनिन
उत्तर :
(d) साइटोकाइनिन |

02. दो तंत्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को कहते हैं|
(a) द्रुमिका
(b) सिनेप्स
(c) एक्सॉन
(d) आवेग
उत्तर :
(b) सिनेप्स |

03. मस्तिष्क उत्तरदायी है
(a) सोचने के लिए
(b) हृदय स्पंदन के लिए
(c) शरीर का संतुलन बनाने के लिए
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर :
(d) उपरोक्त सभी |

4. स्वाद की ग्राहियों को क्या कहते हैं ?
(a) रस संवेदी ग्राही
(b) घ्राणग्राही
(c) ध्वनीग्राही
(d) तापग्राही
► (a) रस संवेदी ग्राही

5. नलिका विहीन ग्रन्थियों को क्या कहते हैं ?
(a) पाचक ग्रन्थियाँ
(b) अंत:स्त्रावी ग्रन्थियाँ
(c) बहि स्त्रावी ग्रन्थियाँ
(d) अश्रु ग्रन्थियाँ
► (b) अंत:स्त्रावी ग्रन्थियाँ

6. कोई भी वस्तु जो तंत्रिका आवेग उत्पन्न करती है उसे क्या कहते हैं ?
(a) प्रतिक्रिया
(b) उद्दीपन
(c) उत्तेजना
(d) (a) और (b) दोनों
► (b) उद्दीपन
7. कोई भी सूचना एक तंत्रिका कोशिका में किसके द्वारा उपार्जित की जाती है ?
(a) तंत्रिकाक्ष
(b) केंद्रक
(c) द्रुमाकृतिक सिरे
(d) (a) और (b) दोनों
► (c) द्रुमाकृतिक सिरे

8. दो तंत्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को क्या कहते हैं ?
(a) दुमिका
(b) सिनेटस
(c) एक्सॉन
(d) आवेग
► (b) सिनेटस

Class 10 Science Chapter 7 in hindi 

9. द्रुमिका से विद्युत आवेग कहाँ जाता है ?
(a) केंद्रक
(b) कोशिकाकाय
(c) तंत्रिकाक्ष
(d) तंत्रिका के अंतिम सिरे पर
► (b) कोशिकाकाय

10. कौन सूचनाओं को विद्युत आवेग के द्वारा शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक संवहन में विशिष्टीकृत करता है ?
(a) न्यूरॉन
(b) पेशी
(c) रक्त
(d) त्वचा
► (a) न्यूरॉन

11. तंत्रिका ऊतक किसका बना होता है ?
(a) तंत्रिका कोशिकाओं का
(b) न्यूरॉन का
(c) पेशी कोशिकाओं का
(d) (a) और (b) दोनों
► (d) (a) और (b) दोनों

12. तंत्रिकाएँ जो सूचना को मस्तिष्क तक लेकर जाती है,उसे क्या कहते हैं ?
(a) संवेदी तंत्रिकाएँ
(b) मोटर तंत्रिकाएँ
(c) मिश्रित तंत्रिकाएँ
(d) (a) और (b) दोनों
► (a) संवेदी तंत्रिकाएँ

13. मस्तिष्क का कौन-सा भाग बुद्धिमत्ता का केंद्र है ?
(a) अनुमस्तिष्क
(b) पोंस
(c) प्रमस्तिष्क
(d) मेंडुला ऑब्लोंगेटा
► (c) प्रमस्तिष्क

14. कौन-सी तंत्रिकाएँ सूचना को मस्तिष्क से प्रभावित अंग तक लेकर जाती है ?
(a) संवेदी तंत्रिकाएँ
(b) मोटर तंत्रिकाएँ
(c) मिश्रित तंत्रिकाएँ
(d) (a) और (b) दोनों
► (b) मोटर तंत्रिकाएँ

15. मस्तिष्क का कौन-सा भाग शरीर के संतुलन को नियंत्रित व समन्वयित करता है ?
(a) प्रमस्तिष्क
(b) अनुमस्तिष्क
(c) मेडुला आब्लोंगेटा
(d) थैलेमस
► (b) अनुमस्तिष्क

Class 10 Science Chapter 7 note in hindi

16. जो प्रक्रम आगम संकेतों को पता लगाने तथा उनके अनुसार निर्गम क्रिया को करने का कार्य करता है, इस तरह के संबंधन को क्या कहते हैं ?
(a) विद्युत चाप
(b) प्रतिवर्ती चाप
(c) मोटर चाप
(d) उपरोक्त सभी
► (b) प्रतिवर्ती चाप

17. प्रतिवर्ती चाप से कौन -सा तंत्रिका ऊतक संबंधित है ?
(a) मस्तिष्क
(b) मेरुरज्जु
(c) मेडुला आब्लोंगेटा
(d) अनुमस्तिष्क
► (b) मेरुरज्जु

18. केंदीय तंत्रिका तंत्र कौन बनाते हैं ?
(a) मस्तिष्क
(b) मेरुरज्जु
(c) मेडुला
(d) (a) और (b) दोनों
► (d) (a) और (b) दोनों

19. केंदीय तंत्रिका तंत्र तथा शरीर के अन्य भागों में संचार को कौन सुगमता प्रदान करता है ?
(a) पश्चमस्तिष्क
(b) परिधीय तंत्रिका तंत्र
(c) पेशीय तंत्र
(d) क और ख दोनों
► (b) परिधीय तंत्रिका तंत्र

20. परिधीय तंत्रिका तंत्र किससे मिलकर बना है ?
(a) कपाल तंत्रिकाओं
(b) मेरु तंत्रिकाओं
(c) पेशीय तंत्रिकाओं
(d) (a) और (b) दोनों
► (d) (a) और (b) दोनों


Class 10 science chapter 7  Important Question Answer

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01. प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच क्या अंतर है?
उत्तर :
प्रतिवर्ती क्रिया मस्तिष्कके मेरुरज्जू हिस्से द्वारा नियंत्रित की जाती है पतन्तु टहलना मस्तिष्क द्वारा सोची समझी क्रिया है | प्रतिवर्ती क्रिया में बहुत कम एमी क्गता है परन्तु टहलना में सुचना को पेशियों तक पहुँचने में काफी समय लगता है |
02. प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है?
उत्तर :
प्रतिवर्ती क्रिया मस्तिष्कके नियंत्रण में नहीं होती है | स्त्रवित प्रतिवर्ती क्रियाएँ मेरुरज्जू द्वारा नियंत्रित की जाती है | मस्तिष्क प्रतिवर्ती क्रिया में होने वाले कार्य की सुचना अपने अंदर एकत्रित कर लेता है |
03. छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से भिन्न है कयोंकि प्रकाश व प्ररोह गति अनुवर्तन गति होती है जो ऑकिस्न हॉर्मोन द्वारा निंयत्रित होती है | परन्तु छुई-मुई पादप की पत्तियों छूने के कारण फैलतीव सिकुड़ती है जो प्रकाश से नियंत्रित नहीं होती है |
04. जलानुवर्तन दर्शाने के लिए एक प्रयोग की अभिकल्पना कीजिए ?
उत्तर :
जलानुवर्तन दर्शाने के लिए प्रयोग – एक पोधा ले उसे गमले में उगाए उस की मिट्टी एक ओर से गीली तथा दूसरी ओर से सुखी होनी चाहिए | कुछ दिनों बाद उसका परिक्षण करने पर हम पाएगे की पौध की जड़े जलीय मिट्टी की ओर गतिशील होती है की इस अभिकल्पना से हम पाते है की जडो में घनात्मक जलानुवर्तन होता है |

05. आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर :
आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह इसलिए दी जाती है कियोंकि शरीर में कार्बोहाइड्रेट ,वसा तथा प्रोटीन के अपचन को थाइरॉइड नियंत्रित करती है | यह ग्रंथि थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन स्त्रावित करती है इस ग्रंथि के लिए आयोडीन की आवश्कता होती है आयोडीन की कमी से घेंघा रोग हो जाता है |

06. हमारे शरीर में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थिति पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हों। क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तर :
ग्राही सवेदनशील अगो में होती है | ये पर्यावरण से सूचनाएँ ग्रहण करते है| इनके द्वारा व्यकित पर्यावरण से स्वयं संतुलित करता है यदि ये उचित तरीके से कार्य न करें तो मस्तिष्क सूचनाएँ ग्रहण नहीँ कर पायेगा या देर से करेगा अतः व्यकित असुरक्षित हो जाएगा |

07 . एक तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना बनाइए तथा इसके कार्यों का वर्णन कीजिए। \
उत्तर :
तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन)तंत्रिका तंत्र की क्रियात्मक व संरचनात्मक इकाई है | यह तीन हिस्सों में बंटी होती है |

द्रुमिका ,
कोशिकाय ,
एक्सॉन
हमारे शरीर में संवेदी तंत्रिका तथा तंत्रिका होती है | संवेदी तंत्रिका ग्राही अंगो से उद्दीपन प्राप्त कर सुचना को मेरुरज्जु तक ले जाती है तथा वाहक मस्तिष्क से सुचना अंगो तक पहुँचती है |

08. पादप में प्रकाशानुवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर :
जड़ प्रकाश के विपरीत मुड़कर अनुक्रिया करती है तथा तने प्रकाश की दिशा में मुड़कर , इसे प्रकाशावर्तन कहते है | पादप में ऑकिस्न हॉर्मोन स्त्रावित होता है | यह सूर्य के प्रकाश में तने के अंधेरमय भाग में आ जाता है और वहाँ की कोशिकोओं को लंबा कर उन्हें प्रकाश की ओर झुका जाता है | इसे घनात्मक प्रकाशावर्तन कहते है | जड़े ऋणात्मक दर्शाती है |


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